06/07/2025
मतदाता सूची पुनरीक्षण बना आम नागरिक के लिए टास्क
इन दिनों चल रहा मतदाता सूची का पुनरीक्षण कार्य आम लोगों को परेशान कर रहा है। एक ओर जहां शिक्षित और युवा वर्ग इसे सहजता से पूरा कर रहा है। तो वहीं दूसरी ओर गरीब, अशिक्षित, वृद्ध और विशेषकर महिलाओं के लिए यह परेशानी खड़ी कर रहा है। नगर व प्रखंड क्षेत्र के विभिन्न वार्डों से मिले लोगों के अनुभव इस बात को साफ तौर पर रेखांकित करते हैं कि यह कार्य अब सिर्फ दस्तावेज जमा करने का नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौती है। जागरूकता की कमी ही असली समस्या है: रवि प्रकाश शर्मा सामान्य वर्ग से आने वाले नगर के वार्ड संख्या 5 निवासी 60 वर्षीय रवि प्रकाश शर्मा ने बताया कि उन्होंने अपने परिवार के सभी सदस्यों का प्रपत्र और आवश्यक दस्तावेज बीएलओ को सौंप दिए हैं।इनके अनुसार इस प्रक्रिया में कोई विशेष परेशानी नहीं है। परंतु लोगों में जागरूकता की भारी कमी है। वृद्ध महिलाओं के लिए जरूर यह कार्य कठिन है। सरकार की कोई दूरगामी योजना हो सकती है: पूर्णेन्दु कुमार सामान्य वर्ग से आने वाले वार्ड संख्या 17 निवासी पूर्णेन्दु कुमार ने इसे सरकार की विकासात्मक सोच से जोड़ा। उन्होंने बताया कि युवा और शिक्षित वर्ग के लिए यह कार्य कठिन नहीं है, लेकिन वृद्ध महिलाओं और विशेषकर पुत्रवधुओं के लिए माता-पिता से जुड़े दस्तावेज को जुटाना एक कठिन कार्य बन गया है। हम गरीबों को क्यों सताया जा रहा है : गुज्जी देवी पिछड़ी जाति से आने वाली खुशहाल टोला निवासी 51 वर्षीय गुज्जी देवी ने कहा कि वर्षों से तो सब कुछ ठीक चल रहा था। अब सरकार को ऐसी क्या जरूरत आ पड़ी कि हम बुजुर्ग महिलाओं को मायके से दस्तावेज लाने की मजबूरी बन गई। उन्होंने कहा कि हम ना तो पढ़े-लिखे हैं और ना घर में कोई मदद करने वाला है। अब सरकार की जो इच्छा है करे, हम तो बेबस हैं। मेरे लिए आसान, पर भाई के लिए मुश्किल: रोहित कुमार पिछड़ी जाति से आने वाले गढटोला निवासी 24 वर्षीय रोहित कुमार ने बताया कि उसने अपना फॉर्म सभी जरूरी दस्तावेजों के साथ तैयार कर दिया है। लेकिन उसका निरक्षर भाई अब भी जूझ रहा है। वह अपना आवासीय प्रमाण पत्र बनवाने में लगा हुआ है। माता पिता का वर्ष 2003 के मतदाता सूची में नाम है ही उसे प्रमाण के रूप में दे देंगे। अब तो बुढ़ापे में भी लगने लगा है डर: कौशल्या देवी अनुसूचित जाति से आने वाली जैतपुर पंचायत के खुशहाल टोला निवासी 65 वर्षीय विधवा कौशल्या देवी आंखों में आंसू के साथ भावुक होकर कहती है कि अब बुढ़ापे में लगता है जैसे सब कुछ छिनने वाला है। माता-पिता मेरे बचपन में ही गुजर गए। उनका कोई कागज पत्तर नहीं है। चाचा ने पाला पोसा और शादी कर दी। अब मायके से कौन क्या लाएगा? लगता है राशन, पेंशन अब सब कुछ छिन जाएगा, ऐसा कहकर वो फफक पड़ीं। क्या करें, पेट देखें या वोट? जो होगा देखा जाएगा: संजीव कुमार अनुसूचित जाति से आने वाले गढ़टोला निवासी 22 वर्षीय संजीव कुमार ने कहा कि वह लेबर मजदूरी करता है। दिन भर की मेहनत के बाद घर आने पर उसे समझ ही नहीं आता कि किस कागज को कहां लगाए। उसने कहा कि अब कागज पत्तर और वोटर कार्ड के चक्कर में मजदूरी छोड़ें? पेट देखें कि वोट? सरकार की इक्षा हम गरीबो को परेशान करने की ही है तो करे, क्या कर सकते हैं। सरल नहीं, संवेदनशील बनानी होगी प्रक्रिया बातचीत में सामने आया कि जहां एक ओर मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया प्रशासनिक दृष्टिकोण से जरूरी हो सकती है। तो वहीं इसकी जमीनी हकीकत कुछ और बयां कर रही है। खासकर बुजुर्ग, महिला, अशिक्षित और श्रमिक वर्ग में इस प्रक्रिया को लेकर डर, भ्रम और आक्रोश है। जरूरी है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया को केवल फार्म भरने तक सीमित न रखकर सामाजिक रूप से सहज बनाया जाए। ताकि लोकतंत्र के सबसे कमजोर वर्ग को भी उसका हक भय के बजाय भरोसे के साथ मिल सके।