23/08/2026
लखनऊ का नवाब नसीरुद्दीन हैदर तबीयत से बड़ा लीचड़ किस्म का शख़्स था जिसे भिशतन, मेहतरानी , धोबिन औरतें पसंद आती थी। क़िस्मत की बात नसीरुद्दीन को औलाद किसी से नसीब ना हुई थी। लिहाज़ा इस बात से वो बहुत चिड़चिड़ा रहता था।
इत्तेफाक से महल में काम करने वाली एक कनीज़ सुखचैन से नवाब की आँखें लड़ गई। सुखचैन केवल नाम की सुखचैन थी- परले दर्ज की भद्दी थुलथुल और कर्कश औरत। किंतु नवाब तो नवाब था- दिल आया गधी पे तो परी क्या चीज़ है। नवाब ने सुखचैन कनीज़ को अपनी सोहबत में शामिल कर लिया।
कुछ दिन बाद सुखचैन ने महल में एलान किया कि वो हमल से है, उसके पेट में नवाब का बच्चा है। नवाब ख़ुशी से बावला हो गया। सुखचैन को तमाम सुविधाएं मुहैया करवाई। सुखचैन अब और कर्कश हो गई। महल में अर्दली , सिपाही , अन्य कनीज़ आदि से और बेसुर कर्कश स्वर में बात करने लगी। बात बात पे झगड़ना और चिल्लाना सुखचैन का शग़ल हो गया।
नवाब सुखचैन के तमाम नखरे चीख चिल्लाहट सहता रहा। जब चार महीने हुए तो शाही हकीम सुखचैन का मुआइना करने आए। साथ में खूसट दाइयाँ भी आई। उन्होंने सुखचैन का मुआइना कर बताया- ये पेट से नहीं है, बेहिसाब गोश्त खा खा कर और थुलथुला गई है, गुबरीली हो चुकी है। सुखचैन को मुफ़्त खाने की इतनी आदत हो चुकी थी कि उसने पेट की गैस को नवाब का कमाल मान लिया।
इसके बाद सुखचैन महल में कभी ना दिखी- ना जाने आसमान खा गया या फिर ज़मीन निगल गई!
और फिर दो सौ साल बाद अचानक सुखचैन ने सोशल मीडिया पे अपने वीडियो से बतला दिया- वो आज भी थुलथुल कर्कशा है जिसे बात कहने करने का शऊर नहीं है!
आज की ये सुखचैन ना जाने किस नवाब के भरोसे है!