25/01/2020
*मत चूको चौहान*
वसन्त पञ्चमी का शौर्य
*चार बांस, चौबीस गज, अंगुल अष्ठ प्रमाण!*
*ता उपर सुल्तान है, मत चूको चौहान!!*
वसन्त पञ्चमी का दिन हमें "हिन्दशिरोमणि पृथ्वीराज चौहान" की भी याद दिलाता है। उन्होंने विदेशी इस्लामिक आक्रमणकारी मोहम्मद गोरी को 16 बार पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया, पर जब सत्रहवीं बार वे पराजित हुए, तो मोहम्मद गोरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ बन्दी बनाकर काबुल अफगानिस्तान ले गया और वहाँ उनकी आंखें फोड़ दी।
पृथ्वीराज का राजकवि चन्द बरदाई पृथ्वीराज से मिलने के लिए काबुल पहुंचा। वहां पर कैद खाने में पृथ्वीराज की दयनीय हालत देखकर चन्द्रवरदाई के हृदय को गहरा आघात लगा और उसने गोरी से बदला लेने की योजना बनाई।
चन्द्रवरदाई ने गोरी को बताया कि हमारे राजा एक प्रतापी सम्राट हैं और इन्हें शब्दभेदी बाण (आवाज की दिशा में लक्ष्य को भेदनाद्ध चलाने में पारंगत हैं, यदि आप चाहें तो इनके शब्दभेदी बाण से लोहे के सात तवे बेधने का प्रदर्शन आप स्वयं भी देख सकते हैं।
इस पर गोरी तैयार हो गया और उसके राज्य में सभी प्रमुख ओहदेदारों को इस कार्यक्रम को देखने हेतु आमन्त्रित किया।
पृथ्वीराज और चन्द्रवरदाई ने पहले ही इस पूरे कार्यक्रम की गुप्त मन्त्रणा कर ली थी कि उन्हें क्या करना है। निश्चित तिथि को दरबार लगा और गोरी एक ऊंचे स्थान पर अपने मन्त्रियों के साथ बैठ गया।
चन्द्रवरदाई के निर्देशानुसार लोहे के सात बड़े-बड़े तवे निश्चित दिशा और दूरी पर लगवाए गए। चूँकि पृथ्वीराज की आँखे निकाल दी गई थी और वे अन्धे थे, अतः उनको कैद एवं बेड़ियों से आजाद कर बैठने के निश्चित स्थान पर लाया गया और उनके हाथों में धनुष बाण थमाया गया।
इसके बाद चन्द्रवरदाई ने पृथ्वीराज के वीर गाथाओं का गुणगान करते हुए बिरूदावली गाई तथा गोरी के बैठने के स्थान को इस प्रकार चिन्हित कर पृथ्वीराज को अवगत करवाया
‘‘चार बांस, चैबीस गज, अंगुल अष्ठ प्रमाण,
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।’’
अर्थात् चार बांस, चैबीस गज और आठ अंगुल जितनी दूरी के ऊपर सुल्तान बैठा है, इसलिए चौहान चूकना नहीं, अपने लक्ष्य को हासिल करो।
इस सन्देश से पृथ्वीराज को गोरी की वास्तविक स्थिति का आंकलन हो गया। तब चन्द्रवरदाई ने गौरी से कहा कि पृथ्वीराज आपके बन्दी हैं, इसलिए आप इन्हें आदेश दें, तब ही यह आपकी आज्ञा प्राप्त कर अपने शब्द भेदी बाण का प्रदर्शन करेंगे।
इस पर ज्यों ही गौरी ने पृथ्वीराज को प्रदर्शन की आज्ञा का आदेश दिया, पृथ्वीराज को गोरी की दिशा मालूम हो गई और उन्होंने तुरन्त बिना एक पल की भी देरी किये अपने एक ही बाण से गोरी को मार गिराया।
गोरी उपर्युक्त कथित ऊंचाई से नीचे गिरा और उसके प्राण पंखेरू उड़ गए। चारों और भगदड़ और हा-हाकार मच गया, इस बीच पृथ्वीराज और चन्द्रवरदाई ने पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार एक-दूसरे को
कटार मार कर अपने प्राण त्याग दिये।
*"आत्मबलिदान की यह घटना भी 1192 ई. वसन्त पञ्चमी वाले दिन ही हुई थी।"*
*ये गौरवगाथा अपने बच्चों को अवश्य सुनाएं*