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केंद्रीय बजट से यूपी को नई रफ्तार
04/02/2026

केंद्रीय बजट से यूपी को नई रफ्तार

केंद्र सरकार के आम बजट ने उत्तर प्रदेश के विकास को एक नई गति देने के संकेत दिए हैं। बजट में आधुनिक कनेक्टिविटी, बड़े .....

गाँधी जी जीवित होते तो आज 156 साल के होते।  वे बहुत गहराई से याद किए गए। उन्होंने विश्व इतिहास में हस्तक्षेप किया और काल...
02/02/2026

गाँधी जी जीवित होते तो आज 156 साल के होते। वे बहुत गहराई से याद किए गए। उन्होंने विश्व इतिहास में हस्तक्षेप किया और काल की अखण्ड सत्ता को प्रभावित किया। काल है भी अखण्ड सत्ता। सारी घटनाएं समय के भीतर होती हैं। अथर्ववेद (19.53-54) में भृगु कहते हैं “काल-अश्व विश्व-रथ का संवाहक है। काल ही पिता है, वही आगे पुुत्र होता है। काल में प्राण हैं, मन हैं, सारे नाम हैं, काल की अनुकूलता ही आनंद है। काल स्वयंभू है। काल के द्वारा ही भूत और भविष्य पैदा हुए हैं आदि आदि।” समय पकड़ में नहीं आता। घटनाएं घटती हैं, घटना अतीत है। अतीत की घटनाओं का यथातथ्य संकलन इतिहास है। प्राचीन राष्ट्र की घटनाएं करोड़ों की संख्या में होती हैं। भारत ऐसा ही राष्ट्र है। मूलभूत प्रश्न है कि घटनाओं के संकलन में संकलनकर्ता की रुचि क्या है? रुचि क्यों है? कुछेक विद्वान् युद्ध प्रिय होते हैं, वे युद्धों का इतिवृत्त संकलित करते हैं। कुछ विद्वान् प्रकृति प्रेमी होते हैं, वे प्राकृतिक परिवर्तनों के संकलन को इतिवृत्त का विषय बनाते हैं। माक्र्सवादी सोंच के विद्वान् उत्पादन पद्धति की विवरणी का संकलन करते हैं। इतिहास अतीत का दर्पण होता है लेकिन इतिहास लेखन या संकलन की कोई भी शैली प्राचीन समाज या राष्ट्र का सम्पूर्ण विवरण नहीं हो सकती। जैसे समुद्री लहरों की गणना असंभव होती है वैसे ही इतिहास संकलन का काम भी बड़ा जटिल है। इसलिए इतिहास का रूप, स्वरूप और इतिहास खोजना बहुत कठिन काम है।

भारत में ‘इतिहास के इतिहास’ पर बहसें चलती हैं। यूरोपीय विद्वान भारत पर इतिहास की उपेक्षा का आरोप लगाते हैं। मैक्समूलर ने लिखा, “हिन्दू दार्शनिकों की एक जाति थी। उनका संघर्ष विचारों का संघर्ष था। उनका अतीत सृष्टि की समस्या थी, उनका भविष्य अस्तित्व का प्रश्न था। यह कहना सही है कि विश्व के राजनैतिक इतिहास में भारत का कोई स्थान नहीं है।” मैक्समूलर को वैदिक और पौराणिक सहित प्राचीन इतिहास में राज्यव्यवस्था नहीं दिखाई पड़ती। एलफिन्सटन को सिकंदर के हमले के पूर्व किसी भी घटना का निश्चित समय नहीं दिखाई पड़ता। उन्होंने 1839 में लिखा, “भारतीय इतिहास में सिकंदर के आक्रमण के पूर्व किसी सार्वजनिक घटना की तिथि निश्चित नहीं की जा सकती है।” विटरनिट्ज यहां काव्य, नायकत्व और इतिहास का घालमेल देखते हैं। अलबेरूनी के आरोप ज्यादा सख्त है कि “हिन्दू चीजों (घटनाओं) के ऐतिहासिक क्रम पर अधिक ध्यान नहीं देते। वे अपने सम्राटों के काल क्रमानुसार उत्तराधिकार के वर्णन में लापरवाह है।”

गांधी जी को यह सब खासा बुरा लगा था। राष्ट्रबोध की वास्तविक शर्त सच्चा इतिहास बोध है। गणित, ज्योतिष, चिकित्सा आदि के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियां विश्वख्यात थीं। भारत ने इतिहास संकलन की अपनी विशेष परम्परा विकसित की थी लेकिन यूरोपीय तर्ज के इतिहासविद् भारत को इतिहासविहीन बता रहे हैं। गांधी जी राजाओं के विवरण को सच्चा इतिहास नहीं मानते थे। उन्होंने हिन्द स्वराज में लिखा “इतिहास जिस अंग्रेजी शब्द (हिस्ट्री) का तरजुमा है और जिस शब्द का अर्थ बादशाहों या राजाओं की तवारीख होता है। हिस्ट्री में दुनिया के कोलाहल की ही कहानी मिलेगी। राजा लोग कैसे खेलते थे? कैसे खून करते थे? कैसे वैर करते थे, यह सब हिस्ट्री में मिलता है।” गांधी जी ने यूरोपीय इतिहास की अंतर्वस्तु को ठीक ही सिर्फ खूनखराबे का संग्रह बताया है।

अतीत और वर्तमान दो नहीं हैं, वर्तमान अतीत का ही विस्तार है। अतीत निर्जीव सत्ता नहीं है, वर्तमान बीते प्राणवान समय का ही चेहरा है। इसलिए पुराने समय के पर्वत, वन उपवन, पशु, पक्षी और ग्रहदशा तथा गीत, नृत्य भी वर्तमान काल में किसी न किसी रूप में मौजूद रहते ही हैं। इतिहास और वर्तमान का सम्बंध अविच्छिन्न है। इतिहास में मनुष्य के कर्म अनुभव होते हैं। भूलें चूकें और जय पराजय होती हैं। मनुष्य उनसे सीखता है। वर्तमान की वस्तुनिष्ठ व्याख्या का उपकरण भी इतिहास ही है। इतिहास मनुष्य जीवन की प्रयोगशाला है। समाज इसी प्रयोगशाला के निष्कर्षो के अनुुसार सही, गलत, करणीय या अकरणीय और अनुकरणीय कार्यो-विचारों की सूची बनाता हैं। इसलिए इतिहास संकलन का काम वैज्ञानिक जैसा है लेकिन दोनों के लक्ष्य में आधारभूत अन्तर हैं। विज्ञान प्रकृति का विश्लेषण करता है, उसके निष्कर्ष अंतिम नहीं होते। प्रकृति विराट है, यहां अनंत रहस्य हैं। विज्ञान द्वारा जाना गया कोई भी तथ्य सम्पूर्ण या अंतिम सत्य नहीं होता। इतिहास ‘हो चुके’ का विवरण है। अतीत में अब कुछ भी नया होने की संभावना नहीं है। जो हो गया, उसी का तथ्यगत संकलन इतिहास है।

गांधी जी इतिहास निर्माता थे लेकिन स्वयं एक अच्छे इतिहास लेखक भी थे। अनेक विद्वानों ने गांधी जी की लिखी “दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास” पुस्तक की प्रशंसा की है। गांधी जी की इस किताब का पहला अध्याय है ‘भूगोल’। इतिहास की घटनांए एक खास भू क्षेत्र पर घटित होती हैं। भू क्षेत्र का रूप स्वरूप स्थायी नहीं रहता। उत्पादन के साधनों में भी परिवर्तन होते हैं। इसलिए इतिहास के सम्यक् अध्ययन में भूगोल की महत्ता है। वैदिक कवि भी अपने परिवेश, नदियों, पर्वतों का दिल खोल कर वर्णन करते थे। साथ में तत्कालीन अर्थव्यवस्था का काव्य बिम्ब भी खींचते थे। गांधी जी ने भी दक्षिण अफ्रीका के तत्कालीन अर्थतंत्र का वर्णन किया-दक्षिण अफ्रीका के गाय और बैल हिन्दुस्तान के गाय-बैलों से से अधिक बड़े और मजबूत होते हैं।” दक्षिण अफ्रीका में अंगूर हैं, अन्य मीठे फल हैं आम भी हैं लेकिन गांधी जी के अनुसार आमों की गुठलियां हिन्दुस्तानी ही ले गये थे। गांधी जी ने इतिहास लेखन में भाषा को भी प्रमुख स्थान दिया है। माक्र्सवादी चिन्तक डाॅ0 रामविलास शर्मा ने याद दिलाया है “जो लोग नस्लवादी दृष्टि से इतिहास लिखते हैं उनके लिए अफ्रीका का इतिहास काले आदमियों का इतिहास है। गांधी जी का दृष्टिकोण इससे भिन्न है। वह काले आदमियों में उनकी भाषाओं और जातियों की पहचान करते हैं।”
अध्ययन के सभी विषयानुशासन मनुष्य के गढ़े हैं, मनुष्य के लिए हैं। वृहत्तर मानवता का लोकमंगल ही सभी विषयों के ज्ञान का लक्ष्य है। इतिहास में लोकमंगल साधने का कर्मयोग और व्यवहार शास्त्र पसरा हुआ है। स्वाभाविक ही इतिहास लेखन, संकलन और अध्ययन का कार्य लोकमंगल के लक्ष्य से जुड़ा होना चाहिए। मूलभूत प्रश्न यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप की इतिहास देखने की प्राचीन दृष्टि क्या थी? क्या मिथकीय ही थी? क्या तथ्यों को झुठलाने की लत थी? क्या महाकाव्यों पुराणों और उसके भी पहले रचे गए वैदिक साहित्य के नायक काल्पनिक ही हैं? पूर्वजों की ऐसी ही इतिहास दृष्टि क्यों थी?

आधुनिक इतिहासकारों का एक वर्ग इतिहास में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को सही और जरूरी मानता है। इस दृष्टिकोण से वैदिक साहित्य-इतिहास में क्या खामियां हैं? क्या माक्र्सवादी इतिहास लेखन ही वैज्ञानिक है? इस तरह तो कार्ल माक्र्स के पहले का समूचा इतिहास लेखन अवैज्ञानिक होगा? ऐसी प्रश्नावली बड़ी हो सकती है। मसलन क्या पुरातात्विक साक्ष्य ही प्रमाण है? शब्द अनुभूति श्रुति स्मृति क्यों बकवास हंै? उसी कालखण्ड का प्रेमपूर्ण समाज क्यों महत्वपूर्ण नहीं है?


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गाँधी जी जीवित होते तो आज 156 साल के होते। वे बहुत गहराई से याद किए गए। उन्होंने विश्व इतिहास में हस्तक्षेप किया और का...

महान साधक थे रामकृष्ण परमहंसभारत के एक महान संत, आध्यात्मिक गुरु एवं विचारक थे। इन्होंने सभी धर्मों की एकता पर जोर दिया।...
02/02/2026

महान साधक थे रामकृष्ण परमहंस

भारत के एक महान संत, आध्यात्मिक गुरु एवं विचारक थे। इन्होंने सभी धर्मों की एकता पर जोर दिया। उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। अतः ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधना और भक्ति का जीवन बिताया। स्वामी रामकृष्ण मानवता के पुजारी थे। साधना के फलस्वरूप वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संसार के सभी धर्म सच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं। वे ईश्वर तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न साधन मात्र हैं। 19 वीं शताब्दी में श्री रामकृष्ण परमहंस एक रहस्यमयी और महान योगी पुरुष थे। जिन्होंने काफी सरल शब्दों में अध्यात्मिक बातो को सामान्य लोगो के सामने रखा। जिस समय हिन्दू धर्म बड़े संकट में फंसा हुआ था उस समय श्री रामकृष्ण परमहंस ने हिन्दू धर्मं में एक नयी उम्मीद जगाई।

रामकृष्ण के जीवन में अनेक गुरु आये पर अन्तिम गुरुओं का उनके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा। एक थी भैरवी जिन्होने उन्हे अपने कापालिक तंत्र की साधना करायी और दूसरे थे श्री तोतापुरी उनके अन्तिम गुरु। गंगा के तट पर दक्षिणेश्वर के प्रसिद्व मंदिर में रहकर रामकृष्ण मां काली की पूजा किया करते थे। गंगा नदी के दूसरे किनारे रहने वाली भैरवी को अनुभुति हुई कि एक महान संस्कारी व्यक्ति रामकृष्ण को उसकी दीक्षा की आवश्यकता हैं। गंगा पार कर वो रामकृष्ण के पास आयी तथा उन्हंे कापालिक दीक्षा लेने को कहा।
रामकृष्ण ने भैरवी द्वारा बतायी पद्धति से लगातार साधना कर मात्र तीन दिनों में ही सम्पूर्ण क्रिया में निपुण हो गये।

रामकृष्ण के अन्तिम गुरु तोतापुरी थे जो सिद्ध तांत्रिक तथा हठ योगी थे। उन्होने रामकृष्ण को दीक्षा दी। रामकृष्ण को दीक्षा दी गई परमशिव के निराकार रुप के साथ पूर्ण संयोग की। पर आजीवन तो उन्होने मां काली की आराधना की थी। वे जब भी ध्यान करते तो मां काली उनके ध्यान में आ जाती और वे भावविभोर हो जाते। जिससे निराकार का ध्यान उनसे नहीं हो पाता था।
तोतापुरी ध्यान सिद्ध योगी थे। उनको अनुभव हुआ कि रामकृष्ण के ध्यान में मां काली प्रतिष्ठित हैं। उन्होने शक्ति सम्पात के द्वारा रामकृष्ण को निराकार ध्यान में प्रतिष्ठित करने के लिये बगल में पड़े एक शीशे के टुकड़े को उठाया और उसका रामकृष्ण के आज्ञाचक्र पर आघात किया जिससे रामकृष्ण को अनुभव हुआ कि उनके ध्यान की मां काली चूर्ण-विचूर्ण हो गई हैं और वे निराकार परमशिव में पूरी तरह समाहित हो चुके हैं। वे समाधिस्थ हो गये। ये उनकी पहली समाधी थी जो तीन दिन चली। तोतापुरी ने रामकृष्ण की समाधी टूटने पर कहा। मैं पिछले 40 वर्षो से समाधि पर बैठा हूं पर इतनी लम्बी समाधी मुझे कभी नही लगी। श्री रामकृष्ण परमहंस का जन्म पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में कामारपुकुर नामक गांव में 18 फरवरी 1836 को एक निर्धन निष्ठावान ब्राहमण परिवार में हुआ था।

इनके जन्म पर ही ज्योतिषियों ने रामकृष्ण के महान भविष्य की घोषणा कर दी थी। ज्योतिषियों की भविष्यवाणी सुन इनकी माता चन्द्रा देवी तथा पिता खुदिराम अत्यन्त प्रसन्न हुए। इनको बचपन में गदाधर नाम से पुकारा जाता था। पांच वर्ष की उम्र में ही वो अदभुत प्रतिभा और स्मरणशक्ति का परिचय देने लगे। अपने पूर्वजों के नाम व देवी- देवताओं की स्तुतियां, रामायण, महाभारत की कथायें इन्हे कंठस्थ याद हो गई थी। 1843 में इनके पिता का देहांत हो गया तो परिवार का पूरा भार इनके बड़े भाई रामकुमार पर आ पड़ा था। रामकृष्ण जब नौ वर्ष के हुए इनके यज्ञोपवीत संस्कार का समय निकट आया। उस समय एक विचित्र घटना हुई। ब्राह्मण परिवार की परम्परा थी कि नवदिक्षित को इस संस्कार के पश्चात अपने किसी सम्बंधी या किसी ब्राह्मण से पहली शिक्षा प्राप्त करनी होती थी। एक लुहारिन जिसने रामकृष्ण की जन्म से ही परिचर्या की थी। बहुत पहले ही उनसे प्रार्थना कर रखी थी कि वह अपनी पहली भिक्षा उसके पास से प्राप्त करे।

लुहारिन के सच्चे प्रेम से प्रेरित हो बालक रामकृष्ण ने वचन दे दिया था। अतः यज्ञोपवीत के पश्चात घर वालों के लगातार विरोध के बावजूद इन्होने ब्राह्मण परिवार में प्रचलित प्रथा का उल्लंघन कर अपना वचन पूरा किया और अपनी पहली भिक्षा उस लुहारिन से प्राप्त की। यह घटना सामान्य नही थी। सत्य के प्रति प्रेम तथा इतनी कम उम्र में सामाजिक प्रथा के इस प्रकार उपर उठ जाना रामकृष्ण की आध्यात्मिक क्षमता और दूरदर्शिता को ही प्रकट करता है।

रामकृष्ण का मन पढ़ाई में न लगता देख इनके बड़े भाई इन्हे अपने साथ कलकत्ता ले आये और अपने पास दक्षिणेश्वर में रख लिया। यहां का शांत एवं सुरम्य वातावरण रामकृष्ण को अपने अनुकूल लगा। 1858 में इनका विवाह शारदा देवी नामक पांच वर्षीय कन्या के साथ सम्पन्न हुआ। जब शारदा देवी ने अपने अठारहवें वर्ष मे पदार्पण किया तब श्री रामकृष्ण ने दक्षिणेश्वर के अपने कमरे में उनकी षोड़शी देवी के रुप में आराधना की। यही शारदा देवी रामकृष्ण संघ में माताजी के नाम से परिचित हैं।रामकृष्ण परमहंस के पास जो कोई भी जाता वह उनकी सरलता, निश्चलता, भोलेपन और त्याग से इतना अभिभूत हो जाता कि अपना सारा पांडित्य भूलकर उनके पैरों पर गिर पड़ता था। गहन से गहन दार्शनिक सवालों के जवाब भी वे अपनी सरल भाषा में इस तरह देते कि सुनने वाला तत्काल ही उनका मुरीद हो जाता। इसलिए दुनियाभर की तमाम आधुनिक विद्या, विज्ञान और दर्शनशास्त्र पढ़े महान लोग भी जब दक्षिणेश्वर के इस निरक्षर परमहंस के पास आते तो अपनी सारी विद्वता भूलकर उसे अपना गुरु मान लेते थे। इनके प्रमुख शिष्यों में स्वामी विवेकानन्द, दुर्गाचरण नाग, स्वामी अद्भुतानंद, स्वामी ब्रह्मानंदन, स्वामी अद्यतानन्द, स्वामी शिवानन्द, स्वामी प्रेमानन्द, स्वामी योगानन्द थे। श्री रामकृष्ण के जीवन के अन्तिम वर्ष कारुण रस से भरे थे। 15 अगस्त 1886 को अपने भक्तों और स्नेहितों को दुख के सागर में डुबाकर वे इस लोक में महाप्रयाण कर गये।

रामकृष्ण परमहंस महान योगी, उच्चकोटि के साधक व विचारक थे। सेवा पथ को ईश्वरीय, प्रशस्त मानकर अनेकता में एकता का दर्शन करते थे। सेवा से समाज की सुरक्षा चाहते थे। रामकृष्ण का सारा जीवन अध्यात्म-साधना के प्रयोगों में बीता। वे लगातार कई घंटों तक समाधि में लीन हो जाते थे। चौबीस घंटे में बीस-बीस घंटों तक वे उनसे मिलनेवाले लोगों का दुख-दर्द सुनते और उसका समाधान भी बताते।स्वामी रामकृष्ण परमहंस के भोले प्रयोगवाद में वेदांत, इस्लाम और ईसाइयत सब एक रूप हो गए थे। निरक्षर और पागल तक कहे जाने वाले रामकृष्ण परमहंस ने अपने जीवन से दिखाया था कि धर्म किसी मंदिर, गिरजाघर, विचारधारा, ग्रंथ या पंथ का बंधक नहीं है। रामकृष्ण परमहंस मुख्यतः आध्यात्मिक आंदोलन के प्रणेता थे। जिन्होंने देश में राष्ट्रवाद की भावना को आगे बढ़ाया। उनकी शिक्षा जातिवाद एवं धार्मिक पक्षपात को नकारती हैं।

विभिन्न धर्मों के माध्यम से रामकृष्ण के रहस्यमय अनुभवों ने उन्हें यह सिखाने के लिए प्रेरित किया कि विभिन्न धर्म पूर्ण ज्ञान और आनंद तक पहुँचने के अलग-अलग साधन हैं और विभिन्न धर्म पूर्ण सत्य की समग्रता को व्यक्त नहीं कर सकते हैं लेकिन इसके पहलुओं को व्यक्त कर सकते हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिये उनके परम् शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने एक मई 1897 को बेलुड़ में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इस मिशन की स्थापना के केंद्र में वेदान्त दर्शन का प्रचार-प्रसार है। रामकृष्ण मिशन के उद्देश्य मानवता के सर्वांगीण कल्याण के लिए काम करना, विशेष रूप से गरीबों और दलितों के उत्थान के लिए।

ध्वज समारोह में भावुक हुए योगीध्वजारोहण एक यज्ञ की पूर्णाहुति नहीं बल्कि एक नए युग का शुभारंभ है।यह केवल एकपताका नहीं, उ...
26/11/2025

ध्वज समारोह में भावुक हुए योगी
ध्वजारोहण एक यज्ञ की पूर्णाहुति नहीं बल्कि एक नए युग का शुभारंभ है।
यह केवल एक
पताका नहीं, उस आत्मबल का
प्रतीक है, जिसने हर युग में अधर्म के अंधकार को चीरकर धर्म के प्रकाश
को अक्षुण्ण रखा।

बच्चों को बेसिक संस्कार देना उनके पूरे व्यक्तित्व की नींव तैयार करता है। नीचे वे मुख्य संस्कार दिए गए हैं जो हर बच्चे को...
20/11/2025

बच्चों को बेसिक संस्कार देना उनके पूरे व्यक्तित्व की नींव तैयार करता है। नीचे वे मुख्य संस्कार दिए गए हैं जो हर बच्चे को सिखाए जा सकते हैं—साधारण, रोज़मर्रा की भाषा में:

1. सम्मान (Respect)
बड़ों, छोटे-बड़ों और सभी से विनम्रता से बात करना
किसी की बात बीच में न काटना
दूसरों की भावनाओं का आदर करना

2. नम्रता और धन्यवाद कहना
“कृपया”, “धन्यवाद”, “माफ़ कीजिए” जैसे शब्दों का उपयोग
किसी की मदद मिलने पर कृतज्ञता जताना

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values

बच्चों को बेसिक संस्कार देना उनके पूरे व्यक्तित्व की नींव तैयार करता है। नीचे वे मुख्य संस्कार दिए गए हैं जो हर बच.....

महाभारत के युद्ध के समय की एक कथा आती है। एक व्यक्ति ब्रुवाहन का उल्लेख आता है, जिसे आज तक टेसू महाराज बनाकर प्रतिवर्ष प...
13/11/2025

महाभारत के युद्ध के समय की एक कथा आती है। एक व्यक्ति ब्रुवाहन का उल्लेख आता है, जिसे आज तक टेसू महाराज बनाकर प्रतिवर्ष पूजा जाता है। वह हाथ में धनुष-बाण लिये युद्ध क्षेत्र की ओर जा रहा था। श्रीकृष्ण वेश बदले हुए उसके पास पहुँचे। उन्होंने पूछा, किधर जा रहे हो? जवाब मिला, युद्ध क्षेत्र की ओर। उन्होंने प्रश्न किया, धनुष-बाण क्यों लिये हुए हो?

जब वक्त आएगा तब मैं भी युद्ध में भाग लूँगा।
श्रीकृष्ण ने फिर पूछा, किस पक्ष की ओर से लड़ोगे ?
जो पक्ष कमजोर होकर हारने लगेगा, उसकी सहायता करूँगा। धनुष-बाण से क्या होगा?
इसमें ऐसी शक्ति है कि एक तीर चलाने से वृक्ष के सब पत्तों में छेद हो सकता है।

कृष्ण इससे घबराए। सोचने लगे कि यह तो बहुत शक्तिशाली शत्रु साबित होगा। आखिर उन्होंने एक युक्ति निकाली। उससे बोले, तुम इतने शूरवीर हो, माँगने पर कुछ दान दोगे?
टेसू महाराज बोले, माँगो, क्या माँगते हो?
कृष्ण ने कहा, पहले वचन दो कि जो माँगूँगा वह दोगे।

उन्होंने वचन दे दिया। श्रीकृष्ण ने उनका सिर माँग लिया। टेसू ने आह भरी। कृष्ण बोले, अब क्या प्रतिज्ञा पूरी करने में दुःख हो रहा है? उसने कहा, और तो कोई दुःख नहीं। बस, मैं युद्ध का तमाशा देखना चाहता था, इसलिए कुछ बुरा लगा। अंत में उसका सिर काटकर एक ऊँची जगह रख दिया गया, ताकि युद्ध को देख सके।

दूसरा युग वह है, जब ईसा मसीह से तीन सौ वर्ष पूर्व सिकंदर ने अपनी यूनानी सेना लेकर भारतवर्ष पर आक्रमण किया। एक जगह पर उसने हिंदू योगियों को देखा। उसने उन्हें बुला भेजा। जवाब मिला कि मिलने की कोई आवश्यकता नहीं। सिपाहियों ने तलवारें दिखाकर धमकी दी। वे चुपचाप बैठे रहे। सिकंदर के मन में बहुत तीव्र इच्छा हुई कि वह ज्ञान सिखाने के लिए किसी दार्शनिक को साथ ले जाए। बहुतेरा यत्न किया, कोई साथ जाने के लिए तैयार न होता था। अंत में कालानूस नामक एक व्यक्ति साथ चल पड़ा। ईरान की सीमा पर पहुँचकर उसने सिकंदर से प्रार्थना की कि मेरे लिए चिता तैयार की जाए, मैं इस शरीर को जला देना चाहता हूँ। सिकंदर ने पूछा, क्या बात है ? उसने कहा, मेरी अवस्था अब अस्सी वर्ष से अधिक हो गई। मुझे कभी ज्वर या कोई रोग नहीं हुआ। अब मुझे बुखार आया है, जिससे यह शरीर अपवित्र हो गया है और मैं इसे त्याग देना चाहता हूँ। सिकंदर ने सब प्रकार से यत्न किया और उसे समझाया कि अपना विचार बदल दे। परंतु जब वह नहीं माना तो चिता तैयार की गई। उसके हाथ में रत्न थे, जिन्हें वह चारों तरफ फेंकता जाता था। वह सीधा जाकर चिता पर चढ़ गया और उसे आग लगा दी।

कई शताब्दियाँ और बीत गईं। वैदिक धर्म को बौद्ध मत ने पीछे हटा दिया। एक राजा की लड़की रो रही थी और कह रही थी, क्या करूँ? किधर जाऊँ ? कौन धर्म की रक्षा करेगा? कुमारिल भट्ट नामक एक ब्राह्मण पास से गुजर रहा था। यह सुनकर वह बोला, हे राजपुत्री ! मत रो। धर्म को क्या डर है, जब कुमारिल भट्ट पृथ्वी पर जीवित है! कुमारिल भट्ट को बौद्धों के विरुद्ध कार्य करना था। वह उनके विद्यालय में दाखिल हो गए और उनके मत का अच्छी प्रकार अध्ययन किया। उसके पश्चात् उन्होंने अपना जीवन उनके मजहब के खंडन और वेद की रक्षा में लगा दिया। आचार्य कुमारिल भट्ट और शंकराचार्य दो बड़े नाम हैं, जिनके विषय में कहा जाता है कि उनके विद्याबल और प्रचार के द्वारा बौद्ध मत इस देश से एक प्रकार से निकाल दिया गया। आचार्य कुमारिल भट्ट के मन में सदा एक बात का दुःख रहता था कि उन्होंने बौद्धों को गुरु बनाकर एक प्रकार का धोखा किया। अपनी आत्मा के इस धब्बे को धोने के लिए वे प्रायश्चित्त करना चाहते थे। अपना कार्य पूर्ण करने के बाद उन्होंने यह निश्चय किया कि धान के भूसे में जलकर प्राण दे दें। चावल के छिलके एकत्र किए, ढेर में बैठकर आग लगा दी। इस प्रकार उन्होंने शरीर को जला दिया, ताकि आत्मा पर धब्बा न रहे।

और शताब्दियाँ बीत गईं। औरंगजेब का समय आया। हिंदू लोग अन्याय से तंग आ गए। कश्मीर के ब्राह्मणों पर अत्याचार और अन्याय की सीमा न रही। वे गुरु तेग बहादुर के पास सहायता के लिए गए। धन्य हैं वे परिवार, जिन्होंने सभी कष्ट झेले, किंतु सारा कश्मीर मुसलमान हो जाने के बावजूद यज्ञोपवीत और टीके की लाज रखी। गुरुजी ने कहा कि किसी महापुरुष के बलिदान से यह अन्याय दूर होगा। तेगबहादुर बोले-

बंधन पड़े और बल गयो कछु न होत उपाय।
कहो नानक अब ओट हर तुम ही हो सहाय।
इस पर गुरु गोविंद सिंह बोल उठे-
बंधन टूटे और बल हो यह सब ही होत उपाय।
सब कुछ तुमरे हाथ हैं तुम ही हो सहाय।

बादशाह के पास सूचना पहुँची कि एक गुरु को मुसलमान बना लेने से सब हिंदू मुसलमान हो जाएँगे। बादशाह ने गुरु को बुलवा भेजा। गुरु तेगबहादुर पहले ही उधर चल पड़े थे। लगभग पाँच सौ शिष्य (सिख) उनके साथ थे। कुछ दूर जाकर उन्होंने सबको लौटा दिया, केवल पाँच-सात रह गए। वे आगरा में पकड़े गए और दिल्ली में कैद कर दिए गए। उनके साथ एक ब्राह्मण भाई मतिदास थे। उनके पूर्वज बाबा परागा गुरु हरिगोविंद की सेना में जत्थेदार थे। बादशाह ने काजी लोग गुरु के पास भेजे। वे गुरु से प्रश्न करते थे, जिस पर मतिदास को कुछ जोश सा आ गया। उसने गुरु से कहा, यदि आप आज्ञा दें तो एक क्षण में बादशाही का नाश कर दूँ! यह खबर बादशाह के पास पहुँची। बादशाह ने हुक्म दिया कि उस व्यक्ति के सिर पर आरा रखकर चीर दिया जाए। सिर पर आरा रखा गया। धीरे-धीरे शरीर के दो टुकड़े होने लगे। दोनों भागों से ब्रह्म नाम की आवाज निकलती थी। उनकी आत्मा ब्रह्म में लीन हो गई। उनके लिए राजपाट की शोभा क्षण भर में नष्ट हो गई। यह एक ब्राह्मण था, जिसका दिल्ली नगर में सबसे पहला बलिदान हुआ।-समाप्त (हिफी)

प्राचीन समय में बिन्दुसर तीर्थ में महिपाल नामक एक वणिक रहता था। वह धर्म-कर्म तथा देवताओं का विरोध करता था । एक वार सूर्य...
27/10/2025

प्राचीन समय में बिन्दुसर तीर्थ में महिपाल नामक एक वणिक रहता था। वह धर्म-कर्म तथा देवताओं का विरोध करता था । एक वार सूर्य नारायण की प्रतिमा के सामने खड़े होकर उसने मल-मूत्र का त्याग किया, जिसके फल स्वरूप उसकी दोनों आखें नष्ट हो गई । एक दिन यह वणिक जीवन से उब कर गंगा जी में कूद कर प्राण देने का निश्चय कर चल पड़ा। रास्ते में उसे ऋषि राज नारद जी मिले और पूछे -कहिये सेठ जी कहां जल्दी जल्दी भागे जा रहे हो ? अन्धा सेठ रो पड़ा और कहा

https://hindustansamacharnews.com/suryashashthi-fast-which-fulfills-all-wishes-on-27th-october/

  महर्षि पाराशर ज्योतिष संस्थान “ट्रस्ट”के ज्योतिषाचार्य पं. राकेश पाण्डेय ने बताया कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सर....

16/01/2025

संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत
चन्द्रोदय रात्रि 08:50 के वाद अर्घ दान

यह व्रत माघ कृष्ण पक्ष चतुर्थी को किया जाता है। इस वार संकष्टी गणेश चतुर्थी तिथि के दिन शुक्रवार का दिन मघा नक्षत्र दिवा 1:05 तक पश्चात् पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र भोग करेगी। सौभाग्य योग मिल रहा है अतः यह व्रत सर्वमंगलकारी है । इसी दिन बुद्धि- विद्या वारिधि गणेश तथा चन्द्रमा की पूजा करनी चाहिए । दिन भर व्रत रहने के बाद सायं काल चन्द्र दर्शन होने पर दूध का अर्घ देकर चन्द्रमा की बिधिवत पूजा की जाती है ।गौरी -गणेश की स्थापना करके पूजन करके तथा वर्ष भर उन्हें घर में रखा जाता है ।
नैवेद्य सामग्री,तिल,ईख,गंजी,अमरूद,गुड तथा घी से चन्दमा एवं गणेश जी को भोग लगाया जाता है । यह नैवेद्य रात्रि भर डलिया इत्यादि से ढंककर यथावत रख दिया जाता है, जिसे पहार कहते है ।
पुत्रवती मातायें पुत्र तथा पति की सुख समृद्धि के लिए व्रत रहती है। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उस ढंके हुए पहार को पुत्र ही खोलता है तथा भाई-बन्धुओं में वितरित करना चाहिए, जिससे आपस में प्रेम भावना स्थापित होता हैं ॥🌸🕉️🌺🌺🌹

16/01/2025

2013 के महाकुंभ में 82 लाख श्रद्धालुओं ने किया था स्नान, संत हुए थे नाराज, इस बार 3.50 करोड़ ने लगायी श्रद्धा की डुबकी, सभी संतुष्ट 🌺🌸🔱🕉️

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