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30/11/2024

यह कहानी गाजियाबाद की महिला बाइक मैकेनिक पूनम कश्यप की है। शायद ही कोई कंपनी की बाइक या स्कूटी हो, जिसे पूनम ने ठीक न किया हो। इसीलिए उन्हें 'बाइक दीदी' के नाम से जाना जाता है। बाइक दीदी की इस प्रेरणादायक कहानी को पढ़कर आप भी उन्हें सलाम करना चाहेंगे।
जब पूनम के पति बोन टीबी के कारण बिस्तर पर आ गए, तो उन्होंने आत्मनिर्भर बनने का निर्णय लिया। पति की सहायता से उन्होंने औजार उठाए और बाइक तथा स्कूटी की मरम्मत करने लगीं। आज शायद ही कोई कंपनी की बाइक हो, जिसे पूनम ने ठीक करके सड़क पर चलने लायक न बनाया हो। इस कार्य के माध्यम से वह न केवल अपनी बेटियों की शिक्षा का खर्च उठा रही हैं, बल्कि पति के इलाज के लिए लिए गए कर्ज को भी चुकता कर रही हैं।

10/10/2024

भारत देश ने आज अपना असली कोहिनूर खो दिया है। 86 वर्ष की उम्र में रतन टाटा जी ने आज अपने जीवन की अंतिम सांस ली है। उनके गुजरने की खबर से पूरे देश में शोक का माहौल है। कुछ दिन पहले ही उन्होंने सोशल मीडिया पर यह जानकारी दी थी कि उनकी हालत में तेजी से सुधार हो रहा है लेकिन इस आकस्मिक खबर ने हर किसी को चकित कर दिया है। भारत को औद्योगिक क्षेत्र में आगे बढ़ाने में रतन टाटा का महत्वपूर्ण योगदान था उनके जैसा उद्योगपति सदियों में एक बार आता है जो इससे पहले राष्ट्र को सर्वोपरि मानता है। रतन टाटा जी हमारे दिल में सदैव जिंदा रहेंगे। ओम शांति।

04/02/2024

हमारे जमाने में साइकिल तीन चरणों में सीखी जाती थी ,
पहला चरण - कैंची
दूसरा चरण - डंडा
तीसरा चरण - गद्दी ...
*तब साइकिल की ऊंचाई 24 इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साइकिल से गद्दी चलाना मुनासिब नहीं होता था।*
*"कैंची" वो कला होती थी जहां हम साइकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे*।
और जब हम ऐसे चलाते थे तो अपना सीना तान कर टेढ़ा होकर हैंडिल के पीछे से चेहरा बाहर निकाल लेते थे, और *"क्लींङ क्लींङ" करके घंटी इसलिए बजाते थे ताकी लोग बाग़ देख सकें की लड़का साईकिल दौड़ा रहा है* ।
*आज की पीढ़ी इस "एडवेंचर" से महरूम है उन्हे नही पता की आठ दस साल की उमर में 24 इंच की साइकिल चलाना "जहाज" उड़ाने जैसा होता था*।
हमने ना जाने कितने दफे अपने *घुटने और मुंह तोड़वाए है* और गज़ब की बात ये है कि *तब दर्द भी नही होता था,* गिरने के बाद चारो तरफ देख कर चुपचाप खड़े हो जाते थे अपना हाफ कच्छा पोंछते हुए।
अब तकनीकी ने बहुत तरक्क़ी कर ली है पांच साल के होते ही बच्चे साइकिल चलाने लगते हैं वो भी बिना गिरे। दो दो फिट की साइकिल आ गयी है, और *अमीरों के बच्चे तो अब सीधे गाड़ी चलाते हैं छोटी छोटी बाइक उपलब्ध हैं बाज़ार में* ।
मगर आज के बच्चे कभी नहीं समझ पाएंगे कि उस छोटी सी उम्र में बड़ी साइकिल पर संतुलन बनाना जीवन की पहली सीख होती थी! *"जिम्मेदारियों" की पहली कड़ी होती थी जहां आपको यह जिम्मेदारी दे दी जाती थी कि अब आप गेहूं पिसाने लायक हो गये हैं* ।
*इधर से चक्की तक साइकिल ढुगराते हुए जाइए और उधर से कैंची चलाते हुए घर वापस आइए* !
और यकीन मानिए इस जिम्मेदारी को निभाने में खुशियां भी बड़ी गजब की होती थी।
और ये भी सच है की *हमारे बाद "कैंची" प्रथा विलुप्त हो गयी* ।
हम लोग की दुनिया की आखिरी पीढ़ी हैं जिसने साइकिल चलाना तीन चरणों में सीखा !
*पहला चरण कैंची*
*दूसरा चरण डंडा*
*तीसरा चरण गद्दी।*
● *हम वो आखरी पीढ़ी हैं*, जिन्होंने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है।
● *हम वो आखरी लोग हैं*, जिन्होंने बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ पम्परागत खेल, गिल्ली-डंडा, छुपा-छिपी, खो-खो, कबड्डी, कंचे जैसे खेल खेले हैं

22/01/2024

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