16/04/2020
मौर्य साम्राज्य में भारत का GDP 31% था। यानि पूरी दुनिया में 100 रुपये का प्रोडक्शन होता था तो उसमे अकेले भारत का 31% प्रोडक्शन था। इसका मतलब है कि मौर्य के समय में भारत दुनिया में सबसे बड़ी महासत्ता थी। (अमर्त्य सेन ने 'दा आईडिया ऑफ़ जस्टिस' )
भारत को विश्व गुरु बनाने वाले मे काल्पनिक चाणक्य का कोई योगदान नहीं है यह कार्य चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने दम पर किया था ।
*_देश के आन बान शान, अद्वितीय प्रतिभा, विलक्षण बुद्धिबल, बाहुबल संपन्न, अपने दम पर यवनो के विशाल साम्राज्य को ध्वस्त करके भारत की विजय पताका फहराने वाले, भारत के सभी राजवंशो को एकीकृत कर राष्ट्र का निर्माण करने वाले, विशालतम हृदय संपन्न, राजतन्त्र में जनतंत्र का एहसास कराने वाले, प्राचीन भारतीय सभ्यता के उन्नायक, जम्बूद्वीप व अखण्ड भारत के राष्ट्रपितामह, स्वाभिमानी पुरुषार्थ व व्यक्तित्व के धनी, राष्ट्रीय एकता व अखण्डता के संस्थापक मोरिय कुलश्रेष्ठ, प्रथम चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के 2365वें जन्मदिन की हार्दिक बधाई 🙏..
अब सच क्या है जानिए...
अर्थशास्त्र ग्रन्थ(छोटा मनुस्मृति)लिखा गया है 1909 ई.मे ...(शाम शास्त्री, गणपति शास्त्री, यदुवीर शास्त्री आदि द्वारा)मौर्यकाल मे तो संस्कृत भाषा ही नही था....
अर्थशास्त्र संस्कृत का एक ग्रन्थ है। इसमें राज्यव्यवस्था, कृषि, न्याय एवं राजनीति के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया है। अपने तरह का (राज्य-प्रबन्धन विषयक) ग्रन्थ है। इसकी शैली उपदेशात्मक और सलाहात्मक (instructional) है।
इसके रचनाकार का व्यक्तिनाम विष्णुगुप्त, गोत्रनाम कौटिल्य (कुटिल से व्युत्पत्र) और स्थानीय नाम चाणक्य था। ऐसा कहा जाता हैं ...
ऐसा कहा जाता हैं ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है कि यह ग्रंथ लुप्त हो चुका था। 1904 ई. में तंजोर के एक पंडित ने भट्टस्वामी के अपूर्ण भाष्य के साथ अर्थशास्त्र का हस्तलेख मैसूर राज्य पुस्तकालय के अध्यक्ष आर. शाम शास्त्री को दिया। शास्त्री ने पहले इसका अंशत: अंग्रेजी भाषांतर 1905 ई. में "इंडियन ऐंटिक्वेरी" तथा "मैसूर रिव्यू" (1906-1909) में प्रकाशित किया। इसके पश्चात् इस ग्रंथ के दो हस्तलेख म्यूनिख लाइब्रेरी में प्राप्त हुए और एक संभवत: कलकत्ता में। तदनंतर शाम शास्त्री, गणपति शास्त्री, यदुवीर शास्त्री आदि द्वारा अर्थशास्त्र के कई संस्करण प्रकाशित हुए। शाम शास्त्री द्वारा अंग्रेजी भाषांतर का चतुर्थ संस्करण (1929 ई.) है।
1909 के बाद कई लोगो ने इसके पाठ, भाषांतर, व्याख्या और विवेचन कार्य किया है। शाम शास्त्री और गणपति शास्त्री का उल्लेख किया जा चुका है। इनके अतिरिक्त यूरोपीय विद्वानों में हर्मान जाकोबी (ऑन दि अथॉरिटी ऑव कौटिलीय, इं.ए., 1918), ए. हिलेब्रांड्ट, डॉ॰ जॉली, प्रो॰ए.बी. कीथ (ज.रा.ए.सी.) आदि के नाम लिए जा सकते हैं। अन्य भारतीय विद्वानों में डॉ॰ नरेन्द्रनाथ ला (स्टडीज इन ऐंशेंट हिंदू पॉलिटी, 1914), श्री प्रमथनाथ बनर्जी (पब्लिक ऐडमिनिस्ट्रेशन इन ऐंशेंट इंडिया), डॉ॰ काशीप्रसाद जायसवाल (हिंदू पॉलिटी), प्रो॰ विनयकुमार सरकार (दि पाज़िटिव बैकग्राउंड ऑव् हिंदू सोशियोलॉजी), प्रो॰ नारायणचंद्र वंद्योपाध्याय, डॉ॰ प्राणनाथ विद्यालंकांर आदि के नाम उल्लेखनीय है
अर्थशास्त्र(1909) पुस्तक के प्रकाशन के साथ ही भारत तथा पाश्चात्य देशों में हलचल-सी मच गई क्योंकि इसमें शासन-विज्ञान के उन तत्त्वों का वर्णन पाया गया, जिनके सम्बन्ध में भारतीयों को सर्वथा अनभिज्ञ समझा जाता था। पाश्चात्य विद्वान फ्लीट, जौली ने इस पुस्तक को एक ‘ महत्त्वपूर्ण’ ग्रंथ बतलाया ।
ग्रंथ के अंत में दिए चाणक्यसूत्र (15.1) में अर्थशास्त्र की परिभाषा इस प्रकार हुई है :
मनुष्यों की वृत्ति को अर्थ कहते हैं। मनुष्यों से संयुक्त भूमि ही अर्थ है। उसकी प्राप्ति तथा पालन के उपायों की विवेचना करनेवाले शास्त्र को अर्थशास्त्र कहते हैं।
इन अधिकरणों के अनेक उपविभाग (15 अधिकरण, 150 अध्याय, 180 उपविभाग तथा 6,000 श्लोक) हैं।
अपने पूर्व अर्थशास्त्रों की रचना की बात स्वयं कौटिल्य ने भी स्वीकार किया है। अपने 'अर्थशास्त्र' में कई सन्दर्भों में उसने आचार्य वृहस्पति, भारद्वाज, शुक्राचार्य, पराशर, पिशुन, विशालाक्ष आदि आचार्यों का उल्लेख किया है। कौटिल्य के पूर्व अनेक आचार्यों के ग्रंथों का नामकरण दंडनीति के रूप में किया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कौटिल्य के पूर्व शास्त्र दंडनीति कहे जाते थे और वे अर्थशास्त्र के समरूप होते थे।
इस संबंध में ऐसे विद्वानों की अच्छी-खासी संख्या है जो यह मानते हैं कि कौटिल्य 'अर्थशास्त्र' का रचनाकार नहीं था। ऐसे विद्वानों में पाश्चात्य विद्वानों के साथ ही भारतीय की संख्या ज्यादा है। स्टेन, जॉली, विंटरनीज व कीथ इस प्रकार के विचार के प्रतिपादक हैं। भारतीय विद्वान आर. जी. भण्डारकर , Rajendra Prasad Singh ने भी इसका समर्थन किया है। भंडारकर ने कहा है कि पतंजलि ने महाभाष्य में कौटिल्य का उल्लेख नहीं किया है। 'अर्थशास्त्र' के रचयिता के रूप में कौटिल्य को नहीं मान्यता देनेवालों ने अपने मत के समर्थन में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये हैं—
(१) 'अर्थशास्त्र' में मौर्य साम्राज्य या पाटलिपुत्र का कहीं कोई जिक्र नहीं मिलता है। यदि चन्द्रगुप्त का मंत्री कौटिल्य अर्थशास्त्र का रचनाकार होता तो 'अर्थशास्त्र' में उसका कहीं-न-कहीं कुछ जिक्र करता ही।
(२) इस संबंध में यह कहा जाता है कि 'अर्थशास्त्र' की विषय-वस्तु जिस प्रकार की है, उससे यह नहीं प्रतीत होता है कि इसका रचनाकार कोई व्यावहारिक राजनीतिज्ञ होगा। निःसन्देह कोई शास्त्रीय पंडित ने ही इसकी रचना की होगी।
(३) चन्द्रगुप्त मौर्य का मंत्री कौटिल्य यदि 'अर्थशास्त्र' का रचनाकार होता तो उसके सूत्र एवं उक्तियाँ बड़े राज्यों के संबंध में होते, परन्तु 'अर्थशास्त्र' के उद्धरण एवं उक्तियाँ लघु एवं मध्यम राज्यों के लिये सम्बोधित हैं। अतः स्पष्ट है कि 'अर्थशास्त्र' का रचनाकार कौटिल्य नहीं था।
डॉ॰ बेनी प्रसाद के अनुसार 'अर्थशास्त्र' में जिस आकार या स्वरूप के राज्य का जिक्र किया गया है, निःसन्देह वह मौर्य, कलिंग या आंध्र साम्राज्य के आधार से मेल नहीं खाता है।
(४) विंटरनीज ने कहा है कि मेगास्थनीज ने, जो लम्बे अरसे तक चन्द्रगुप्त के दरबार में रहा और जिसने अपनी पुस्तक 'इंडिका' में चन्द्रगुप्त के दरबार के संबंध में बहुत कुछ लिखा है, कौटिल्य के बारे में कुछ नहीं लिखा है और न ही उसकी पुस्तक 'अर्थशास्त्र' की कहीं कोई चर्चा की है। यदि 'अर्थशास्त्र' जैसे विख्यात शास्त्र का लेखक कौटिल्य चन्द्रगुप्त का मंत्री होता तो मेगास्थनीज की 'इंडिका' में उसका जिक्र अवश्य किया जाता।
(५) मेगास्थनीज और कौटिल्य के कई विवरणों में मेल नहीं खाता। उदाहरण के लिए मेगास्थनीज के अनुसार उस समय भारतीय रासायनिक प्रक्रिया से अवगत नहीं थे, भारतवासियों को केवल पाँच धातुओं की जानकारी थी, जबकि 'अर्थशास्त्र' में इन सबों का वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त प्रशासकीय संरचना, उद्योग-व्यवस्था, वित्त-व्यवस्था आदि के संबंध में भी मेगास्थनीज और 'अर्थशास्त्र' का लेखक चन्द्रगुप्त मौर्य का मंत्री कौटिल्य नहीं हो सकता है।
कोई ब्राह्मण कभी भी शाक्यकुल का पुरोहित या सलाहकार नहीं रहा । शाक्य परिषद में सिर्फ शाक्य इकठ्ठे होते थे, परिषद में कभी किसी ब्राह्मण की उपस्थिति नहीं रही।
शाक्य कोलिय गणराज्य का सबसे बड़ा उत्सव खेती की शुरुआत के लिए होता था, जिसमें कोई भी वैदिक या ब्राह्मणी क्रिया-कलाप नही होता था।
चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य भी खुद जैन धर्मानुयायी थे जो श्रमण परम्परा और नास्तिक परम्परा में है। चंद्रगुप्त के समकालीन ऐतिहसिक स्रोतों में कहीं भी वैदिक यज्ञों के जैसे अश्वमेध, राजसूय आदि के संपन्न करने का कोई प्रमाण नही है ।
अलेक्जेंडर और मौर्यकालीन विचारक डायोडोरस सिलिकस, प्लुटार्च, जस्टिन, पोम्पियस ट्रोगस, ऐपियन, स्ट्रैबो, प्लिनी जैसे प्रख्यात ग्रिक इतिहासकारों की किताबों में चाणक्य, कौटिल्य या विष्णुगुप्त का नाम कहीं पर भी नहीं मिलता हैं। इन इतिहासकारों ने लिखा है कि, चंद्रगुप्त खुद के बलबूते पर विजयी हुआ था। चंद्रगुप्त मौर्य के ग्रिक सलाहकार मैगस्थनीज ने भी अपनी किताब इंडिका मे चाणक्य का नाम तक नहीं लिया है। अलेक्जेंडर तक्षशिला महाविद्यालय में दस आचार्यों से मिला था लेकिन उनमें किसी का भी नाम चाणक्य नहीं है।
मौर्यों के शिलालेख लिखने वाले विद्वान का नाम "चपड़",था, चाणक्य नहीं।
इससे साबित होता है कि, चाणक्य, कौटिल्य या विष्णुगुप्त एक काल्पनिक पात्र हैं।
काल्पनिक पात्र चाणक्य का निर्माण मध्ययुगीन कथा 'चाणक्य-चंद्रगुप्त कथा' के रूप में लिखकर ब्राह्मणवादिओ ने चंद्रगुप्त मौर्य के जीवन में चाणक्य को घुसाया है।
चंद्रगुप्त मौर्य के पुत्र बिंदुसार मौर्य भी स्वयं आजीवक सम्प्रदाय के अनुयायी थे। आजीवक भी ब्राह्मणेतर परम्परा के होते थे अर्थात इस सम्प्रदाय का ब्राह्मणों से कोई लेना देना नही था। जब दादा और पिता ब्राह्मणेतर परम्परा के अनुयायी हैं, तो अशोक के शैव या हिन्दू होने की बात तर्क से परे है। कुछ लोगों द्वारा ऐसा भ्रम फैलाया गया है कि सम्राट अशोक शैव सम्प्रदाय को मानते थे।
श्रमण परम्परा में कई पंथ है। बाद में मौर्य सम्राट अशोक बौद्ध धम्म की शरण में आये ।
इससे साबित होता है कि, चाणक्य, कौटिल्य या विष्णुगुप्त एक काल्पनिक पात्र हैं बिल्कुल ईसके तरह ..चाणक्य को ईसी तरह सलिमा मे दिखाया जाता हैं😄
DrJawahar Singh