Āppan Māṭī

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Āppan Māṭī " जागऽ हो बज्जिका के सूतल निफिक्किर!" "

जय बज्जिका। जय बिहार। जय भारत।
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©भागवत अनिमेष झा।

जय बज्जिका!!जय बज्जिकांचल
'संघे शक्ति कलौयुगे'

ुरूज ! ीस...!
�� ( बज्जिका विमर्श ) ��
हमरा सब के हीनता के भाव से उबरे के पsरत । बज्जिका लिखे आ बोलेबाला के लोग हीन दृष्टि से देखइअ। दोसरा तs दोसरा , अप्पन बज्जिका बोलेबाला लोग भी मजाक उरबइअ।
अप्पन घर में बज्जिका के अइसन अपमान ! एगो प्रबुद्ध रचनाकार के मुँह से सुनली : " बज्जिका में किताब छपवा के ठेंगा मिलत ? सुनू ! गोइठा में घीऊ न सोखाऊ। सीधे-सीधे राष्ट्रभाषा में लिखू। अपने बन्हिया लिखइले । अच्छा स्कोप रहत हिंदी में। ...सुनू ! अगर जादे लोकभाषा में लिखे के कीड़ा दिमाग में हए , तs मैथिली में लिखू। तनियक मेहनत करब आs परिणाम बन्हिया आएत। "

हम हिंदी , अंग्रेजी , फ्रेंच ,मैथिली , भोजपुरी चाहे बुंदेलखंडी में हाथ-पैर मारू तs बहुत बन्हिया , बाकी अप्पन मातृभाषा बज्जिका में लिखू तs बीस गो बखेरा ! ई कूपमंडूक सोच से हमरा सब के बाहर निकले के पsरत। दोसर बात कि कुछ भाईलोग सन्देह प्रकट कयलन कि अपने तs झाजी ही , तs बज्जिका के लेखक कइसे हो गेली ? ई बज्जिका-प्रेम अचानक कहाँ से उमर पsरल ? हमरा उनका अप्पन खनदान के इतिहास - भूगोल फरिया कs बताबे के परइअ। बताबे के परइअ कि बज्जिकांचल में आई से १५० साल पहिले हम्मर पूर्वज अयलन । .. ई सवाल कोई ग्रियर्सन से न कयलक कि बिहार के हर लोकभाषा आ लोकजीवन के तू काहे अध्ययन कयल ? संकुचित सोच बज्जिका के संकुचित दायरा में सीमित कर के रक्खत। बज्जिका के बकरी के बच्चा के तरह दउरी से मून कs रक्खे के जरूरत न हए। एकरा झाँपू मत ,बाहर निकालू। हम भोजपुरी में भी गीत लिखली , कोई सवाल न कयलक। बज्जिका में लिखब तs सवाल काहे करब ? हम्मर जे क्वालिटी हए , ऊ कोनो भाषा में सामने आएत । कुछ अइसने संकीर्णता के कारण मैथिली कुछ जिला तक सिमट कs रह गेल हs। ई हम्मर टिप्पणी न हए , मैथिली के पैघ चिंतक के मंच से सार्वजनिक चेतावनी के वचन हए।

एगो आउर निवेदन कि नयका पीढ़ी के बज्जिका बोल-बचन आ लेखन से जोरू। एकरा लेल अपडेटेड लेखन के जरूरत हए। नयका पाठक के रुचि के हिसाब से आई के चुनौती से भिड़न्त करे के पsरत।
" कहियो के बात न करू , आजकल के बात करू
कहाँ रुक गेल इन्किलाब , तहकीकात करू। "

जइसे रामजी के लेल सेतुबंध रामेश्वरम बनल रs , तs रामजी गिलहरी के भी प्रशंसा कयलन रs। बज्जिका के बिकास के लेल छोटगर प्रयास के भी सराहना करे के चाही। उत्साह न बढ़बई तs अभियान फ्लॉप कर जाएत। जइसे तुलसी के छोट आ बर पत्ता समान रूप से भगवान शालिग्राम के स्वीकार होइछई ओइसहीं सब लेखन के स्वीकार करू। सबसे अंतिम फैसला तs जनता-जनार्दन कsरत। ओकरा लेल जनता के पास जाए के जरूरत हए। जन-समस्या आ जनांदोलन से जुरे के पsरत। नाखून कटवा कs शहीद बने से काम न चsलत ।

बज्जिका के काम में बहुत्ते विद्वान आ प्रतिभाशाली लोग लगल हतन। हमरा बज्जिका के नया सूर्योदय दिखाई पsर रहल हs। बज्जिका अप्पन समस्त बेरी तोरत। एक दिन पीपर के नयका ललछौंह पत्ता अइसन मोन के हरसित कsरत।बज्जिका एक दिन सृजन के सागर में अप्पन देसी रङ घोरत। हर बज्जिका भाषी गर्व के साथ बज्जिका बोलत। बज्जिका के जननाद से राज-सिंहासन भी डोलत।
" सुन ले रे अन्हरिया ! भेलऊ फरीछ
उगतन सुरूज , जय जगदीस !

11/09/2026

गुलाब आ कादो
(लघुकथा – जय राम सिंह)

एक दिन गोलू के बाबूजी आ पटिदारी के चच्चा के बीच कौनो बात पर हुज्जत होइत रहे । दुन्नों तरफ से गारी के बौछार होइत रहे । शायद कौनो ज़मीन-जथा के मामला रहई । अवसर देख के गोलुओ गारी देबे में अप्पन हाथ साफ कs लेलक । ओसारा पर बइठल गोलू के बूढ़ दादी ई सब दृश्य देखइत रहथ ।

कुछ देर में झगड़ा शांत हो गेल । सब अप्पन-अप्पन काम के तरफ चल देलन । गोलू के दादी धीरे से गोलू के अपना पास बोलएलन आ अपना साथे पीछे बारी में ले गेलन । बारी में जाके दादी एगो गुलाब के फूल तोड़ लेलन आ फूल के कियारी में से तनिका कादो उठा लेलन । गोलू के एगो तर्हत्थी पर गुलाब रगड़ देलन आ दोसर पर कादो । गोलुआ भड़क गेल – “ई कथी कएले दाई ? एगो हाथ गमका देले ओ दोसर घिना देले ?” बड़ा प्यार से गोलू के माथा पर हाथ फेरइत दादी कहलsथिन – “बउआ, मुँह से निकलल बोलियो तs अइसने होइछई । निम्मन बोलs तs वातावरण सुगंधित हो जतsओ, आ गारी बोलs तs जुबान घिना जतsओ ।“

ऊ दिन के बाद से गोलू कभी केकरो गारी नs देलक ।
© जय राम सिंह (11.09.2026)

10/09/2026

चउरचन
(लेख - जय राम सिंह)

ऋग्वेद के पुरुष सूक्त (दसवाँ मंडल, सूक्त 90, मंत्र 13) आ यजुर्वेद (अध्याय 31, मंत्र 12) में एगो ऋचा हयः-

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत ।
श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत॥

अर्थात् विराट परमात्मा के मन से चंद्रमा उत्पन्न भेल, हुनकर आँख से सूर्य, कान से वायु-प्राण आउर मुंह से अग्नि उत्पन्न भेल । धरती पर उपलब्ध जीवन पर चन्द्रमा के बहुत जादे प्रभाव पड़इअ । भारतीय ज्योतिषशास्त्र में चंद्रमा के मन, शांति, भावना आउर औषधि के देवता मानल गेल हय । तन, मन आ चित्त के सौंदर्य चन्द्रमा के दशा से निर्धारित होइअ । भारतीय संस्कृति में चन्द्रमा के महत्ता के अभूतपूर्व प्रतिष्ठापना देल गेल हय ।

बज्जि संस्कृति मूलतः प्राकृतिक संस्कृति हय । प्राकृतिक संस्कृति मतलब सहज संस्कृति, जहाँ कुच्छो बनावटी नs हो । तथाकथित पढ़ल-लिखल लोग इहे सहज संस्कृति के देहाती अथवा ठेठ संस्कृति कह देइछन । जादे सभ्य भाषा में एकरा लोक-संस्कृति कहल जाइअ । पेड़-पौधा, नदी-पहाड़, ताल-तालाब, माल-मवेशी आदि सब बज्जि संस्कृति के अहम हिस्सा हय । जीव-जीव में ईश्वर, बूँद-बूँद में मकरंद, पत्ता-पत्ता में विधाता आ कंकड़-कंकड़ में शंकर के अस्तित्व के दर्शन करनाई प्राकृतिक संस्कृति हय । जहाँ प्रकृति हय उहाँ प्रेम हय, श्रद्धा हय, विश्वास हय आ समर्पण हय । इहे पहचान हय बज्जि संस्कृति के । प्राकृतिक संस्कृति के सबसे बड़का नमूना छठ पूजा हय । छठ पूजा के प्रसिद्धि अब देश-काल के सीमा के तोड़ के विश्व-व्यापी हो गेल हय । पूरा विश्व ई सांस्कृतिक गूढ़ार्थ के आगे अब नत-मस्तक हय । एक तरफ स्वार्थी संसार हय जहाँ सिर्फ उदय के पूजा होइअ, सत्कार होइअ, लेकिन हुएँ अप्पन बज्जि संस्कृति हय जहाँ अस्तो के पूजा ओतने श्रद्धा-भाव से कएल जाइअ । प्रतीक देखल जाए कि अस्ताचलगामी सूर्य के पूजा उदित हो रहल सूर्य से पहिले कएल जाइअ । एक्कर सांकेतिक अर्थ हय कि वर्तमान के चमकदार बनाबे में भूतकाल के बलिदान के प्रति श्रद्धा कहियो कम नs होए के चाही ।

इहे कड़ी में एगो आउरो प्राकृतिक उत्सव हय जेक्कर नाम हय – चउरचन । ई पर्व के चौरचन, चउरचन्ना, चौथचन, गणेश-चतुर्थी, कलंक-चतुर्थी आदि कए गो नाम से भी जानल जाइअ । ई पर्व गणेश आ चन्द्रमा के लेल समर्पित होइअ । पर्व के दिन बन्हिया से अङ्ना के नीप-पोत के अमनिया बनाएल जाइअ । रात भेला पर अङ्ना में चउरेट्ठा (चाउर के घोल) से गौरी-गणेश के चित्र उकेरल जाइअ । ओकरा से सटा के केरा के सउँस पत्ता पर घर में जेतना समाङ आ माल-मवेशी हय, ओक्कर गिनती के हिसाब से दही के छछिया रक्खल जाइअ । ओकरा पीछे ओहे गिनती के हिसाब से दलही पूड़ी पर गुड़ के खीर रख के नेओज रक्खल जाइअ । सबसे पीछे फल-पकवान रक्खल जाइअ । चार घड़ी के बाद जब चन्द्रमा के उदय होइअ तब दुन्नों हाथ से थरिया में छछिया, नेओज आ फल-पकवान रख के आदर से चन्द्रमा के दर्शन कएल जाइअ । पबुनइतिन मने-मन चन्द्रमा से प्रार्थना करइछन कि हे चन्द्रमा, हम्मर घर-परिवार में सब शुभ होए, समृद्धि बढ़े । एकरा बाद पूरा परिवार एक साथ बइठ के चउरचन के प्रसादी पबइअ । छठ के तरह चउरचन में भी कौनो शास्त्रीय विधि अथवा मंत्र-तंत्र के ज़रूरत नs होइअ । मन के श्रद्धा जब घनीभूत हो गेल, समझू जे ऊ पबुनी के महामंत्र हो गेल । माने कि पूजक आ पूजित के बीच में कोई दोसर एजेंसी के स्कोप नs हय ।

चउरचन पर्व के पीछे एगो पौराणिक कथा भी हय । एक दिन गणेश जी अप्पन सवारी मूसा पर सवार होके कैलाश के तरफ जाइत रहन । रस्ता में हुनका एगो साँप मिललएन । साँप के देख के मूसा के हद्दस हो गेलइ आ ऊ डेरा के काँपे लागल । इहे क्रम में ओक्कर संतुलन गड़बड़ा गेल आ गणेश जी गिर पड़लन । गणेश जी के गिरइत देख के आकाश में चन्द्रमा के हँसी छूट गेलई । चन्द्रमा के हँसइत देख के गणेश जी कुपित हो गेलन । चन्द्रमा के श्राप दे देलथिन – आजुक तिथि (भादों के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी) के जे कोई तोरा देखत ओकरा कोई न कोई झूठ-मूठ के कलंक लाग जतई । चन्द्रमा के अप्पन गलती पर ग्लानि होए लगलई । ऊ गणेश जी के माफी माङे लागल । गणेश जी परम ज्ञानी आ दयालु हतन । अप्पन श्राप के वरदान में बदल देलथिन । चन्द्रमा के आशीर्वाद देइत कहलथिन जे आजुक तिथि के विधिपूर्वक पूजा कs के दही, फल-पकवान के साथ जे तोहर दर्शन करत, ओक्कर सब मनोकामना पूरा हो जतई । तब से चौरचन पर्व के रात में चन्द्रमा विधिपूर्वक चन्द्रमा-दर्शन कएल जा रहल हए । ई से जुड़ल एगो आउर कथा हय । द्वापर युग रहे । भगवान श्रीकृष्ण के गणेश जी के श्राप के कथा शायद मालूम नs रहल होएत । भादों के शुक्ल चतुर्थी के दिन भूलवश ऊ चन्द्रदर्शन कs लेलन । श्रापवश हुनका स्यमंतक मणि चोरी के कलंक लाग गेल । कलंक धोए के लेल ऊ कथी-कथी नs कएलन । मणि के खोज में जाम्बवंत से लड़हूँ के पड़लएन आ जाम्बवती से बियाहो करे के पड़लएन । ओहे दौरान रुक्मिणी अप्पन पति के कलंक से मुक्ति के लेल भादों शुक्ल चतुर्थी के दिन विधि-विधान से चन्द्रदर्शन कएलन । फलस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण के स्यमंतक मणि चोराबे के कलंक से मुक्ति मिल गेल ।

अब ई पर्व के प्राकृतिक-वैज्ञानिक पक्ष देखल जाए । धरती पर जीवन आ प्रकृति के बीच के संतुलन के बरकरार रक्खे में चन्द्रमा के महत्वपूर्ण भूमिका हय । चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण महासागर के पानी में हिलोर उठइत रहइअ आ ऑक्सीजन सहित अन्य पोषक तत्व समुद्र में फइलइत रहइअ । दुनिया में अनेक तरह के जीव के प्रजाति (जइसे कि कोरल रीफ या मूंगा) हय जे अप्पन भोजन आ प्रजनन के समय के चुनाव चन्द्रमा के रोशनी, कला के स्थिति आ ज्वार-भाटा के चक्र के अनुसार करइअ । चन्द्रमा धरती के ओक्कर धुरी पर 23.5 डिग्री पर स्थिर कs के रखइअ । यदि ई झुकाव में तनिको हलचल हो जाए तs ओक्कर परिणाम कल्पनातीत हय । इहे झुकाव के कारण मौसम-चक्र बनइअ । चन्द्रमा आउर धरती के आपसी गुरुत्वीय संबंध के कारण धरती के घूर्णन-गति नियंत्रित रहइअ, अन्यथा धरती के घूर्णन-गति बेतहाशा बढ़ जाए के खतरा होएत । अइसन स्थिति में एक दिन के मियाद सिकुड़ के 6 से 8 घंटा तक हो जाएत । बेहद विनाशकारी हवा आ अन्हर चले से धरती पर सब कुछ उजड़ सकइअ । जइसे जानवर के लेल पागुर करनाई ज़रूरी होइअ, ओइसहीं रात के समय चन्द्रमा के शीतल रोशनी में धरती के वनस्पति-लोक के लेल भी पागुर करनाई अत्यंत ज़रूरी होइअ ।

भारतीय ज्योतिषशास्त्र में चंद्रमा के मन, शांति, भावना आउर औषधि के देवता मानल गेल हय । तन, मन आ चित्त के सौंदर्य चन्द्रमा के दशा से निर्धारित होइअ ।
भारतीय संस्कृति, विशेषकर बज्जिकांचल के संस्कृति के विशेषता हय कि हियाँ के हर गतिविधि के केन्द्र में प्रकृति-प्रेम हय । कहईँ पर्व के रूप में, तs कहईँ रीति-रेवाज के रूप में । गतिविधि कुच्छो होए, फोकस हमेशा प्रकृति पर रहइअ ।
© जय राम सिंह (10.09.2026)

21/08/2026

एन्ने हुज्जत, ओन्ने नेह
(लघुकथा – जय राम सिंह)

किशोर के घरे दू गो पालतू कुत्ता रहे । एक के नाम सोनू आ दोसर के नाम मोनू रहे । सोनू लैब्राडोर नस्ल के करिया कुत्ता रहे तs मोनू जर्मन शेफर्ड नस्ल के उज्जर कुत्ता रहे । एक दिन किशोर एगो बिस्कुट के पैकेट लेले सोनू आ मोनू के बोलाबे लागल । ऊ समय मोनू ओक्कर विधवा माई के हाथ से कुच्छो खाइत रहे । सोनू दउरल आ गेल । किशोर आधा पैकेट बिस्कुट सोनू के देलक । सोनू पुँछरी हिलsबइत खाए लागल । ओतने में मोनुओ आ गेल । ओकरो आधा पैकेट बिस्कुट मिललई । मोनुओ खाए लागल । तब तक सोनू के बिस्कुट खतम हो गेलई । ऊ निचिंत होके बइठ गेल । मोनू खाइत रहल । बाद में मोनुओ के बिस्कुट खतम भेलई, त ओहो बइठ गेल ।

एतने में किशोर के छोटका भाई विभोर आ गेलई । दुन्नों भाई में माई के पेंशन के हिस्सेदारी पर हुज्जत होए लगलई । विभोर के कहनाम रहई कि माई के मन भले ही किशोर के परिवार के साथ रहे के हई, लेकिन पेंशन में आधा-आधा करे के होतsओ । किशोर के कहनाम रहई कि माई के डॉक्टर-दवाई के खर्चा काट के आधा-आधा होएत । गरमाहट बढ़े लगलई । तनिके देर में हाथापाई आ पटका-पटकी होए लगलई । माय आ बड़की कनियाँ के चिकरला पर थोर-थाम भेलई । दुन्नों कुत्ता ओहे जगह बइठल एक-दूसरा के गाल चाटइत आ निहारइत रह गेल ।
© 21.08.2026

25/07/2026

कॉकरोची दोहा

युवावर्ग के मिल सके, शिक्षा आ रोजगार।
मूल इहे उद्देश्य हय, लोकतंत्र के यार।।

युवावर्ग में रोष के, समझे ई सरकार।
इम्तिहान निष्पक्ष हो, ईहे हय दरकार।।

राई से पर्वत बनल, बदलल सबके सोच।
सरकारी अमला हिलल, जय हो हे ककरोच।।

आन्दोलन के आड़ में, गारी के बौछार ।
कौना शिक्षा दे रहल, अपशब्दी हथियार??

आन्दोलन सब शिष्ट हो, हिंसामुक्त विरोध।
तोड़फोड़ कइसे मचल? कर ले कोई शोध।।
© जय राम सिंह (24.07.2026)

24/07/2026

अधूरा थीसिस
(कहानी - जय राम सिंह)

नारायणी अर्थात् गंडक के पूर्वी किछार पर अवस्थित प्रसिद्ध घाट - नाम हय 'कोन्हारा घाट' । कोन्हारा शब्द 'कौन हारा' के अपभ्रंश हय। ईहे घाट पर गज आ ग्राह के लड़ाई भेल रहे। गजराज के पियास लागल रहई आ घड़ियाल के भूख। दुन्नों के शारीरिक ज़रूरत प्राकृतिक रहई। प्राकृतिक ज़रूरत के पूरा करनाई ज़रूरी होइअ, अन्यथा ई हाड़-माँस के मशीन कइसे काम करत? कोन्हारावासी लोग नारायणी के भी गङ्गा मइया मानइछथ काहे कि नारायणी के महिमा गङ्गा माई के महिमा से तनिको उनइस नs हय। तनिके आगे बढ़े पर नारायणी माई गङ्गा माई में विलीन हो जाइछथ। दुनिया में ई एकलौता जगह हय जहाँ दू गो गङ्गा के सङ्गम हय - नारायणी आ गङ्गा के।

सुधाकर चतुर्वेदी नेपलिया छावनी के एगो चबूतरा पर बइठल आगंतुक लोग से बात करइत रहथ। हाजीपुर के आरएन कॉलेज में जब स्नातकोत्तर पढ़ाई के अनुमति मिलल, तs पहिले बैच में दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी रहथ। अलबत्त पढ़ाकू हतन। हिनकर तर्कशक्ति बेजोड़ हय आ ओतने बेजोड़ हय हिनकर ओजस्वी वक्तृत्व-शैली। आजकल पीएचडी में लागल हतन। विषय हय - "आत्मा और परमात्मा का भ्रमजाल" । चार्वाक से ले के प्लेटो, सुकरात, डीसेकरैट्स, मार्क्स, पटनायक ... न मालूम केतना के पढ़ चुकल हतन।

- "जमीन पर सबसे बरियार हाथी आ पानी में घड़ियाल। दुन्नों के क्षेत्र प्रकृति के तरफ से बाँटल हय। अप्पन-अप्पन क्षेत्र में यदि रहल जाए तs शांति हय। गजराज उतर गेल दोसर के क्षेत्र में। गुत्थम-गुत्था शुरु हो गेल। जेक्कर क्षेत्र रहे ऊ भारी पड़े लागल। गजराज के अप्पन औकात के थाह लाग गेल । पूरा धड़ डूब गेल रहे, खाली सूँड़ बच्चल रहे। अंतिम सहारा के इयाद कएलक - 'हारे को हरिनाम' । गजराज बच गेल आ घड़ियाल मारल गेल। लेकिन बड़का प्रश्न रह गेल - कोन हारल? गजराज हारल? कि घड़ियाल हारल? कि प्रकृति के संविधान हारल?"

ताली के गड़गड़ाहट घाट तक पहुँचे लागल। बातचीत शुरु करे के बेर बमुश्किल सात-आठ गो लोग रहे। धीरे-धीरे संख्या पचास-साठ तक पहुँच गेल। सुधाकर चतुर्वेदी अब ई घटना पर अप्पन थीसिस के रङ चढ़ावे लगलन। ".... प्रकृति के संविधान सबसे बड़का संविधान हय.... ई संविधान पर खतरा मँडरा रहल हय... यदि ई प्राकृतिक संविधान नs बच्चल, तs हमरा-तोरा में से कोई नs बच्चत... सब के सब मारल जाएम... बिल्कुल निर्दोष घड़ियाल के तरह.... घड़ियाल मासूमियत के प्रतिनिधि हय आ गजराज स्वार्थजनित क्रूरता के .... भूख के वजन पियास से हमेशा जादे होइअ... अब निर्णय के समय हय - मासूमियत के बचाबे के हय कि स्वार्थजनित क्रूरता के... " लाइन-दर-लाइन ताली के आवाज बढ़इत जाए। अब ई आवाज श्मशानघाट तक पहुँचे लागल।

डोमराज कालीचरण एगो चिता में आग देइत रहथ । बात-बात पर हँस देइत रहथ। एक तरफ परिजन के बिछोह में घरबइआ कनइत रहे, आ दोसर तरफ हर बात पर डोमराज हँसइत रहथ। लेकिन कोई कुछ नs बोले। श्मशान के राजा से ओझरानाई ठीक नs रहे। ताली के आवाज सुनलन। अप्पन दक्षिणा समेट के आवाज के तरफ बढ़लन। हुनका बड़ा अचरज होइत रहे। हजारों साल से कोन्हारा घाट हुनकर वंश के मूल निवास हय। अपना जिनगी में ऊ कोन्हारा घाट पर न मालूम केतना हजार लोग के आग दे के वैकुण्ठवासी बना चुकल रहथ । कोन्हारा घाट पर जिनगी के लगभग सब रङ देख चुकल रहथ। दुर्गा-पूजा के अवसर पर सालों-साल सजइत शास्त्रीय संगीत के महफिल से ले के ऊ पार सोनपुर-मेला के कैबरे-डांस के गंदगी तक .... निम्मन-निम्मन साहसी लोग के पैंट गीला कs देबेवाला सावन-भादों महीना के निस्बद्ध अधरतिया में गङ्गा माई के प्रलयंकर दहाड़ से ले के कार्तिक पूर्णिमा के अथाह जन-समुद्र तक .... कलकत्ता से आबेवाला जहाज-टाइप बड़का-बड़का नाव से ले के कोइलवर से बालू लाबेवाला छोट-छोट नाव तक ... सोनपुर मेला से चोरी-डकैती कs नाव से भागइत चोर से ले के पीछा करइत पुलिस तक .... गङ्गा मइया के किछार पर पनपइत प्रेमालाप से ले के अगिला जनम में मिले के वादा के साथ कएल गेल आत्महत्या तक .... मुख्यघाट पर रोज-रोज होइत मुंडन, जनेऊ, बियाह आदि के जीवंत धुन से ले के श्मशानघाट पर गुँजइत स्वजन-प्रियजन के बिछोह के मरंत धुन तक .... सालों-साल बनइत-बिगड़इत पीपा पुल से ले के विद्युत शवदाहगृह तक...... कोन्हारा घाट के अनगिनत दृश्य डोमराज के आँख में रचल-बसल हय।

डोमराज के देखते सुधाकर हुनका चीन्ह गेल। सुधाकर के वक्तृत्व जारी रहल - एगो आउरो राजा हतन। कोन्हारा घाट के राजा - 'राजा डोमराज' । बूढ़ मरे, जवान मरे, बाल-बुतरू मरे, लेकिन हिनकर हँसी सही-सलामत रहइअ। बइठल-बइठल आमदनी होए तs के नs हँस्सत? हिनको से छुटकारा चाही हमरा सs के। प्रकृति के संविधान पर हिनको से खतरा हय।

वक्तृत्व खतम भेल। खूब ताली बजल। धीरे-धीरे भीड़ छँट गेल। रह गेलन डोमराज आ सुधाकर। "हमरा साथे चलs" - डोमराज हँसइत कहलन।

डोमराज आगे-आगे आ सुधाकर पीछे-पीछे। आपस में कोई बातचीत नs। श्मशानघाट पर पहुँचलन।

- चाय पीबs?
- हम श्मशानघाट पर चाय नs पियsइछी।
- गलती करsइछs, पियल करs, शांति मिलतsओ।

एतने में एगो अर्थी आएल । दुल्हन के जोड़ा में जवान लड़की के लाश रहे । जहर खा लेले रहे । भाई-गोतिया दहाड़ मारके कनइत रहथ। बाबूजी पत्थल बनल बइठल रहथ ।

सुधाकर से बरदास नs भेल। फफके लागल। डोमराज चुपचाप आग देबे में लागल रहथ - न कोई माँग, न रूसनाई, न दक्षिणा के फरमाइश । लड़की के हाथ से चूड़ी उतार के भाई के देलन - "काँच के चूड़ी आग में गल जतsओ, घर में जब-जब देखबs, बहिन के इयाद ताजा हो जतsओ।"

डोमराज हँसsइत सुधाकर के पास गेलन - "देखs, अब ई लड़की के परमशांति मिल गेलई। चिता के आग विलक्षण होइअ। एक तरफ आग के धमक आ दोसर तरफ गङ्गा माई के गोदी, संसार के सब सुख-दुख से प्राणी के ऊपर उठा देइअ। इहे परमशांति हय, इहे निर्वाण हय, इहे मोक्ष हय।"

सुधाकर उठल आ दू चुक्का चाय ले आएल। तनिके देर में एगो आउर लाश अलई - नब्बे साल के बुजुर्ग के लाश। बाल-बच्चा विदेश में हई। गोतिया आग देलकई। सुधाकर के हृदय में विद्रोह जाग गेलई - "ई अनर्थ हय, भरल-पूरल परिवार अछइत मरबइया अप्पन पूत से आग पाबे लेल बिलल्ला हय ? अइसन नालायक संतान से निःसंतान होनाई अच्छा हय। घनघोर कलयुग आ गेल।"

डोमराज भभा के हँस देलन - "देखs बाबू, कलयुग समाज के सोच में हय, हियाँ श्मशान में नs आ सकइअ। हियाँ सत्य के साम्राज्य हय, निर्विवाद रूप से अंतिम सत्य के। कोई झूठ नs बोल सकइअ। ई सत्य परमानंददायक हय, परम विश्रांतिदायक। समानता के दर्शन श्मशान के अतिरिक्त आउर कहीं संभव नs हय। राजा-रंक, अमीर-गरीब, ऊँच-नीच, जात-पाँत आदि के कोई भेद नs देखबs। एक्के लकड़ी आ एक्के आग - एतने हय सब के भाग। समझs कि 'जे जर गेल ऊ तर गेल' । गङ्गा माई के गोदी में सबके लेल जगह हय।"

अब डोमराज के बात में सुधाकर के दम नज़र अबsइत रहे। अप्पन झोरा में से नोटपैड निकाल के कुछ लिखे लागल। एतने में दू गो दोना में मूर्ही लेले डोमराज आ गेलन। दुन्नों गोटे फाँके लगलन ।

चाय, मूर्ही आ बतियान के बीच अन्हार होए लागल रहई। कोन्हारा घाट के सब मंदिर में आरती के घंटा बजे लागल। दुन्नों गोटे मंदिर-मंदिर घूम के आरती के परसादी लेलन। राउंड पूरा हो गेल तs डोमराज एगो पान के गुमटी पर रुकलन। मीठा पत्ता के दू गिलौरी पान बनल। सुधाकर पान नs खाइत रहे। लेकिन ना-नुकुर के सवाले नs रहे। सुधाकर के हिचक श्मशान के आग के प्रताप में भस्म हो गेल रहे। पान के रस जइसे-जइसे देह के नस से होके ब्रह्मरंध्र तक अप्पन मौजूदगी के खबर पहुँचएलक, ओइसे-ओइसे सुधाकर मानव-जीवन के सार्थकता समझे लागल। दुन्नों गोटे वापस श्मशानघाट पर पहुँच गेल रहथ।

- रात के समय हियाँ ठहरे के कोई इंतजाम हय की?

डोमराज फेर से भभा के हँस देलन - "हो सुधाकर बाबू ! अभी तक समझ में नs अलsओ? पूरा संसार से दुत्कारल लोग के हियाँ ठौर मिल जाइअ। तोरा ठौरे के चिंता हो गेलsओ? खा-पियs आ केनहूँ ओलर जा। डेराए के जरूरत नs हय। एक तरफ गङ्गा माई के गोदी के शीतलता आ दोसर तरफ पहरेदार के रूप में साक्षात महाकाल!"

आधा रात तक कोई न कोई लाश जरे के सिलसिला चलsइत रहल। सुधाकर के पपनी अब लथार मारsइत रहsई। एक जगह ओलर गेल।

रात में लघुशंका के लेल नीन खुललई। भयानक निस्बद्ध अन्हरिया रात... श्मशानघाट पर धीरे-धीरे जरइत आग के घूरा.... हरहराइत-घरघराइत-बहइत गङ्गा माई के धार... बीच-बीच में कुक्कुरवृंद के पंचइती.... सुधाकर के हियाओ जवाब देबे लागल। डेग बढ़ाबे के हिम्मत नs भेलई। जहाँ ओलरल रहे, ओहे जगह हल्लुक हो गेल। अब ओक्कर आँख से नीन गायब रहे। एन्ने-ओन्ने नज़र घुमएलक। कुछ लोग घाट के सीढ़ी पर, कुछ लोग मंदिर के चबूतरा पर, तs कुछ लोग टिनही छज्जा के निच्चा दर-दुनिया से बेखबर निश्चिंत होके फोंफ काटइत रहथ। सुधाकर के कुछ इत्मीनान भेल। हिम्मत बटोर के फेर से ओलर गेल।

बिहान हो गेल। सुधाकर घोड़ा बेच के सूतल रहे। डोमराज तब तक आधा दर्जन आत्मा के मोक्ष दिया देले रहथ। सुधाकर पर अब सुरुज भगवान गरमाए लागल रहथ। आँख मलsइत उठल आ सीधे डोमराज के पास पहुँच गेल - "आहो काली भाई, ई भयानक जगह तोरा डर नs लगsइछओ?"

- "डर केकरा नs लगइछई सुधाकर बाबू? हमरो लगइअ, लेकिन ई श्मशान के अन्हार से नs, बल्कि लोग के दिमाग के अन्हार से। हम्मर बेटा के जनम भेल। हम डेरा गेली कि हमरा मरे के बाद एकरा आग कोन देतई? रोज-रोज लाश फूँकइत-फूँकइत समझ में आएल कि जराबे के काम तs आग के हय। हम तs खाली आग धरा के पकड़ा देइछी। हम्मर डर रफ्फू-चक्कर हो गेल।"

सुधाकर धरफरा के उठल आ सीधे घर के तरफ चल देलक।

अब सुधाकर रोज सँझिया के श्मशानघाट पर आबे लागल। धीरे-धीरे दुन्नों में अपनापन बढ़े लागल।

सुधाकर के थीसिस पूरा हो गेल रहे। जमा कs देलक। थीसिस के सिलसिला में कुछ दिन के लेल श्मशानघाट पर ओक्कर आवाजाही बंद हो गेल।

डेढ़ महिन्ना के बाद सुधाकर श्मशानघाट पर आएल - 'डॉ. सुधाकर चतुर्वेदी' । घाट पर कालीचरण के बेटा आग देबे के काम में लागल रहे। पूछे पर पता चलल कि दस दिन पहिले कालीचरण जी के हार्ट-अटैक भेलएन आ ऊ चल देलन। एतना बताबे में कालीचरण के बेटा, मतलब कि नएका डोमराज तीन बेर हँसलक। सुधाकर से नs रहल गेल - "बेटा, तोहर बाबूजी के असमय मृत्यु हो गेलsऊ, आ तूँ हँसsइछे?"

- "सुधाकर बाबू, बाबूजी के कहनाम रहई कि श्मशान में सब कानेवाला लोग मिलइअ, कम से कम एगो हँसेवाला होए के चाही, ताकि श्मशान के दुनिया हँसीविहीन नs हो जाए।"

सुधाकर दुन्नों हाथे अप्पन माथा पकड़ के बइठ गेल। ओकरा समझ में आ गेलई कि ऊ भले ही डॉक्टर बन गेल, लेकिन ओक्कर थीसिस अभियो अधूरा हय।
(समाप्त)
© जय राम सिंह (24.07.2026)

वैशाली में बज्जिका, महोत्सव के ई बात। धन्यवाद सरकार के, सुन्नर हय सौगात।। १वर्षा सिंह डीएम स्वयं, सांस्कृतिक व्यक्तित्व।...
11/07/2026

वैशाली में बज्जिका, महोत्सव के ई बात।
धन्यवाद सरकार के, सुन्नर हय सौगात।। १

वर्षा सिंह डीएम स्वयं, सांस्कृतिक व्यक्तित्व।
जय महोत्सव बज्जिका, जय जय हो नेतृत्व।। २

बज्जिका के गीत हो, चित्रकला साहित्य।।
फिल्म बने सीरियल बने, नवाचार हो नित्य।। ३

कइसे रोजगारोन्मुखी, बने बज्जिका आज।
विद्वज्जन मंथन करथ, आगे बढ़े समाज।। ४

शिक्षा में हो बज्जिका, मनोरंजन के बात।
नौजवान पीढ़ी जुड़े, सामूहिक हो साथ।। ५

अग्रिम हय शुभकामना, पञ्चम में जयगान।
जय जय झंडा बज्जिका, यश के हो अवदान।। ६

© जय राम सिंह (११.०७.२०२६)

26/05/2026

एगो ग़ज़ल देखल जाए।

2122 / 2122

रात बीते के घड़ी में
फूल ले के फुलझरी में

झाँक देलक खूब अरमाँ
दिल बढ़ा के तश्तरी में

जोर जोरू बेच देलक
सेठ जी के परतरी में

प्राण पर आयल बवंडर
पुलिस खातिर मुखबरी में

कान पर घस गेल सेनुर
हाथ ओक्कर हड़बड़ी में

काम कइसे होय पूरा
ध्यान हय जब धरफरी में
© जय राम सिंह (26.05.2026)

19/04/2026

जनगणना आ बज्जिका
(दू गो मुक्तक)

लोग बज्जिका के नासमझी में कह देतन हिन्दी हय।
ज्ञान भूमि ई बज्जिकांचल, कण-कण में आनन्दी हय।
मोहग्रस्त भाई-बहिनी के बतलाबे - समझाबे के,
बागमती हय बज्जि गङ्गा, नारायणी कालिन्दी हय।।

हमरा सब के गाँओ में हर घर अङना में बज्जिका।
अर्चन-वन्दन हर सपना अभ्यर्थना में बज्जिका।
गर्व करे के चाही सब के अप्पन मातृभाषा पर,
आऊ एमरी लिखवाबे के जनगणना में बज्जिका।।
-- जय राम सिंह
🙏🙏🙏🌹

18/04/2026

ग़ज़ल

तोरा जइसन कोई कहाँ खोजू?
कइसे खोजू? कोई कहाँ खोजू?

देखे-परखे के एगो सीमा हय
ओसे आगे कोई कहाँ खोजू?

घर के मलबा से घर बने कइसे
घर हो अज्जर कोई कहाँ खोजू?

हमरा ऊपर हय पाँव दुनिया के
कइसे उठ के कोई कहाँ खोजू?

मिलके बिछुड़ेवला हज़ारों हय
जे न बिछुड़े कोई कहाँ खोजू?

गलती से आदमी से हो गलती
माफ कर दे कोई कहाँ खोजू?
© जय राम सिंह (18.04.2026)

15/03/2026

जनगणना में बज्जिका
(लेख - जय राम सिंह)

अब जबकि तय हो गेल हय कि बज्जिका के गिनती कराबे के लेल कोड संख्या 76 के सहारा लेबे के हय। आ ओकरा बाद OTHERS में 'बज्जिका' या 'BAJJIKA' लिखाबे के हय, तs ई बात के प्रचार-प्रसार बहुत्ते ज़रूरी हय। कुछ काम आसानी से हो सकइअ :-

(1) जागरूक लोग अप्पन-अप्पन गाँव/टोला/शहर के प्राइमरी/मिडिल/हाईस्कूल में जा के बज्जिकांचल के रहबइआ शिक्षक लोग से सकरवा लथ कि ई जिम्मेदारी उठएतन । यदि शिक्षक लोग सकार लेतन तs ई काम बहुत आगे बढ़ जाएत।

अप्रैल महिन्ना में अप्पन दस दिन के प्रवास के दौरान अप्पन गाँव आ आसपास के दस गो स्कूल/कॉलेज में जाके शिक्षक लोग आ छात्र लोग से मिल के ई बात पहुँचाबे के हम्मर निश्चय हय।

(2) स्थानीय गायक लोग आ अन्य कलापार्टी के लोग के कहल जाए कि अप्पन-अप्पन कार्यक्रम में बज्जिका जागरण गीत के प्रमुखता दथ। बज्जिका जागरण गीत के रिकॉर्ड कs के यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स आदि पर धड़ाधड़ पोस्ट कएल जाए। जेतना जादे लोग देखत ओतना जादे जागृति आएत।

(3) बज्जिकांचल में अवस्थित प्रिंटिंग प्रेस वाला लोग सs में से यदि कुच्छो ई बात के समझ जाएत तs स्थानीय बस/ट्रक/टेम्पो आदि पर साटे के लेल पम्फलेट छाप के दे सकइअ। यदि ई काम हो गेल तs जनजागृति खूब हो जाएत।

(4) बज्जिका के नामी-गिरामी कवि लोग जइसे अखौरी साहेब, ज्वाला बाबू, शारदा बाबू, विद्या जी, रणजीत बाबू, मणिभूषण बाबू, हेमा जी आदि लोग के लिखल नारा जगह-जगह प्रदर्शित कएल जाए।
कुछ नारा द्रष्टव्य हय :-

(क) श्री अखौरी चन्द्रशेखर
अबकी चुकब तs दस साल भुकबs!
भइआ हो जगइजा, बज्जिका लिखइजा !!

(ख) - श्री विगन रौनियार
बज्जिका माय के अँचरा
शीतल शांत मनोरम हए
दुनिया में सबसे न्यारा
एक्कर रूप अनूपम हए

(ग) डॉ. विद्या चौधरी
बज्जिका माय के सिखाएल भाषा हय।

(घ) श्री ईश्वर करुण
बोलs बज्जिका, खोलs बज्जिका
जे जे बोले ओक्कर जिनगी तर जाए
जे न बोले ओक्कर भाषा मर जाए।

(ङ) हरिनारायण सिंह हरि
बज्जिभूमि के मीठ बज्जिका भाषा हय
माई के ई आशा हय परिभाषा हय

(च) श्री कौशल किशोर शर्मा
सेवा में समर्पित सब दिन
जेकरा ला पर'किरती हय
सबसे सुन्नर सबसे निम्मन बज्जिकांचल के धरती हय

(छ) श्री रत्नानंद झा 'छोटन'
बज्जिका अप्पन माटी के सुगंध हए।
एकरा जोगाऊ, सजाऊ आ जन-जन तक पहुंचाऊ।।

(ज) श्री मणिभूषण प्रसाद सिंह अकेला
अप्पन डफली अप्पन राग के
बेसुर भाओ भुलाएल जाओ
बेमार परल बज्जिका मइआ के
रोग-बलाए भगाएल जाओ
अप्पन सेवा भाओ से हुनकर
बिगरल दशा सुधारल जाओ ।

एही तरह से आउरो बहुत तरीका हो सकइअ जेसे एमरी के जनगणना में बज्जिका के संदर्भ में वांछित परिणाम आ सकइअ।

(5) बज्जिकांचल के सिनेमाघर, मल्टीप्लेक्स आदि के कहल जाए कि फिल्म के इंटरवल के दौरान बज्जिका-जागरण से संबंधित स्लाइड /वीडियो /गीत आदि चलाएल जाए। नौजवान लोग के ई काम से जोड़े के ई कारगर तरीका होएत। वैशाली के तs डीएम साहिबा श्रीमती वर्षा सिंह स्वयं बज्जिकाप्रेमी हतन। ई सुयोग के लाभ उठाएल जा सकइअ। देखादेखी बज्जिकांचल के अन्य जिलाधिकारी लोग के भी आँख खुल जाएत।

जय बज्जिका 🙏🙏🙏🌹

Address

Muzaffarpur
842001

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