Āppan Māṭī

Āppan Māṭī " जागऽ हो बज्जिका के सूतल निफिक्किर!" "

जय बज्जिका। जय बिहार। जय भारत।
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©भागवत अनिमेष झा।

जय बज्जिका!!जय बज्जिकांचल
'संघे शक्ति कलौयुगे'

ुरूज ! ीस...!
�� ( बज्जिका विमर्श ) ��
हमरा सब के हीनता के भाव से उबरे के पsरत । बज्जिका लिखे आ बोलेबाला के लोग हीन दृष्टि से देखइअ। दोसरा तs दोसरा , अप्पन बज्जिका बोलेबाला लोग भी मजाक उरबइअ।
अप्पन घर में बज्जिका के अइसन अपमान ! एगो प्रबुद्ध रचनाकार के मुँह से सुनली : " बज्जिका में किताब छपवा के ठेंगा मिलत ? सुनू ! गोइठा में घीऊ न स

ोखाऊ। सीधे-सीधे राष्ट्रभाषा में लिखू। अपने बन्हिया लिखइले । अच्छा स्कोप रहत हिंदी में। ...सुनू ! अगर जादे लोकभाषा में लिखे के कीड़ा दिमाग में हए , तs मैथिली में लिखू। तनियक मेहनत करब आs परिणाम बन्हिया आएत। "

हम हिंदी , अंग्रेजी , फ्रेंच ,मैथिली , भोजपुरी चाहे बुंदेलखंडी में हाथ-पैर मारू तs बहुत बन्हिया , बाकी अप्पन मातृभाषा बज्जिका में लिखू तs बीस गो बखेरा ! ई कूपमंडूक सोच से हमरा सब के बाहर निकले के पsरत। दोसर बात कि कुछ भाईलोग सन्देह प्रकट कयलन कि अपने तs झाजी ही , तs बज्जिका के लेखक कइसे हो गेली ? ई बज्जिका-प्रेम अचानक कहाँ से उमर पsरल ? हमरा उनका अप्पन खनदान के इतिहास - भूगोल फरिया कs बताबे के परइअ। बताबे के परइअ कि बज्जिकांचल में आई से १५० साल पहिले हम्मर पूर्वज अयलन । .. ई सवाल कोई ग्रियर्सन से न कयलक कि बिहार के हर लोकभाषा आ लोकजीवन के तू काहे अध्ययन कयल ? संकुचित सोच बज्जिका के संकुचित दायरा में सीमित कर के रक्खत। बज्जिका के बकरी के बच्चा के तरह दउरी से मून कs रक्खे के जरूरत न हए। एकरा झाँपू मत ,बाहर निकालू। हम भोजपुरी में भी गीत लिखली , कोई सवाल न कयलक। बज्जिका में लिखब तs सवाल काहे करब ? हम्मर जे क्वालिटी हए , ऊ कोनो भाषा में सामने आएत । कुछ अइसने संकीर्णता के कारण मैथिली कुछ जिला तक सिमट कs रह गेल हs। ई हम्मर टिप्पणी न हए , मैथिली के पैघ चिंतक के मंच से सार्वजनिक चेतावनी के वचन हए।

एगो आउर निवेदन कि नयका पीढ़ी के बज्जिका बोल-बचन आ लेखन से जोरू। एकरा लेल अपडेटेड लेखन के जरूरत हए। नयका पाठक के रुचि के हिसाब से आई के चुनौती से भिड़न्त करे के पsरत।
" कहियो के बात न करू , आजकल के बात करू
कहाँ रुक गेल इन्किलाब , तहकीकात करू। "

जइसे रामजी के लेल सेतुबंध रामेश्वरम बनल रs , तs रामजी गिलहरी के भी प्रशंसा कयलन रs। बज्जिका के बिकास के लेल छोटगर प्रयास के भी सराहना करे के चाही। उत्साह न बढ़बई तs अभियान फ्लॉप कर जाएत। जइसे तुलसी के छोट आ बर पत्ता समान रूप से भगवान शालिग्राम के स्वीकार होइछई ओइसहीं सब लेखन के स्वीकार करू। सबसे अंतिम फैसला तs जनता-जनार्दन कsरत। ओकरा लेल जनता के पास जाए के जरूरत हए। जन-समस्या आ जनांदोलन से जुरे के पsरत। नाखून कटवा कs शहीद बने से काम न चsलत ।

बज्जिका के काम में बहुत्ते विद्वान आ प्रतिभाशाली लोग लगल हतन। हमरा बज्जिका के नया सूर्योदय दिखाई पsर रहल हs। बज्जिका अप्पन समस्त बेरी तोरत। एक दिन पीपर के नयका ललछौंह पत्ता अइसन मोन के हरसित कsरत।बज्जिका एक दिन सृजन के सागर में अप्पन देसी रङ घोरत। हर बज्जिका भाषी गर्व के साथ बज्जिका बोलत। बज्जिका के जननाद से राज-सिंहासन भी डोलत।
" सुन ले रे अन्हरिया ! भेलऊ फरीछ
उगतन सुरूज , जय जगदीस !

25/07/2026

कॉकरोची दोहा

युवावर्ग के मिल सके, शिक्षा आ रोजगार।
मूल इहे उद्देश्य हय, लोकतंत्र के यार।।

युवावर्ग में रोष के, समझे ई सरकार।
इम्तिहान निष्पक्ष हो, ईहे हय दरकार।।

राई से पर्वत बनल, बदलल सबके सोच।
सरकारी अमला हिलल, जय हो हे ककरोच।।

आन्दोलन के आड़ में, गारी के बौछार ।
कौना शिक्षा दे रहल, अपशब्दी हथियार??

आन्दोलन सब शिष्ट हो, हिंसामुक्त विरोध।
तोड़फोड़ कइसे मचल? कर ले कोई शोध।।
© जय राम सिंह (24.07.2026)

24/07/2026

अधूरा थीसिस
(कहानी - जय राम सिंह)

नारायणी अर्थात् गंडक के पूर्वी किछार पर अवस्थित प्रसिद्ध घाट - नाम हय 'कोन्हारा घाट' । कोन्हारा शब्द 'कौन हारा' के अपभ्रंश हय। ईहे घाट पर गज आ ग्राह के लड़ाई भेल रहे। गजराज के पियास लागल रहई आ घड़ियाल के भूख। दुन्नों के शारीरिक ज़रूरत प्राकृतिक रहई। प्राकृतिक ज़रूरत के पूरा करनाई ज़रूरी होइअ, अन्यथा ई हाड़-माँस के मशीन कइसे काम करत? कोन्हारावासी लोग नारायणी के भी गङ्गा मइया मानइछथ काहे कि नारायणी के महिमा गङ्गा माई के महिमा से तनिको उनइस नs हय। तनिके आगे बढ़े पर नारायणी माई गङ्गा माई में विलीन हो जाइछथ। दुनिया में ई एकलौता जगह हय जहाँ दू गो गङ्गा के सङ्गम हय - नारायणी आ गङ्गा के।

सुधाकर चतुर्वेदी नेपलिया छावनी के एगो चबूतरा पर बइठल आगंतुक लोग से बात करइत रहथ। हाजीपुर के आरएन कॉलेज में जब स्नातकोत्तर पढ़ाई के अनुमति मिलल, तs पहिले बैच में दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी रहथ। अलबत्त पढ़ाकू हतन। हिनकर तर्कशक्ति बेजोड़ हय आ ओतने बेजोड़ हय हिनकर ओजस्वी वक्तृत्व-शैली। आजकल पीएचडी में लागल हतन। विषय हय - "आत्मा और परमात्मा का भ्रमजाल" । चार्वाक से ले के प्लेटो, सुकरात, डीसेकरैट्स, मार्क्स, पटनायक ... न मालूम केतना के पढ़ चुकल हतन।

- "जमीन पर सबसे बरियार हाथी आ पानी में घड़ियाल। दुन्नों के क्षेत्र प्रकृति के तरफ से बाँटल हय। अप्पन-अप्पन क्षेत्र में यदि रहल जाए तs शांति हय। गजराज उतर गेल दोसर के क्षेत्र में। गुत्थम-गुत्था शुरु हो गेल। जेक्कर क्षेत्र रहे ऊ भारी पड़े लागल। गजराज के अप्पन औकात के थाह लाग गेल । पूरा धड़ डूब गेल रहे, खाली सूँड़ बच्चल रहे। अंतिम सहारा के इयाद कएलक - 'हारे को हरिनाम' । गजराज बच गेल आ घड़ियाल मारल गेल। लेकिन बड़का प्रश्न रह गेल - कोन हारल? गजराज हारल? कि घड़ियाल हारल? कि प्रकृति के संविधान हारल?"

ताली के गड़गड़ाहट घाट तक पहुँचे लागल। बातचीत शुरु करे के बेर बमुश्किल सात-आठ गो लोग रहे। धीरे-धीरे संख्या पचास-साठ तक पहुँच गेल। सुधाकर चतुर्वेदी अब ई घटना पर अप्पन थीसिस के रङ चढ़ावे लगलन। ".... प्रकृति के संविधान सबसे बड़का संविधान हय.... ई संविधान पर खतरा मँडरा रहल हय... यदि ई प्राकृतिक संविधान नs बच्चल, तs हमरा-तोरा में से कोई नs बच्चत... सब के सब मारल जाएम... बिल्कुल निर्दोष घड़ियाल के तरह.... घड़ियाल मासूमियत के प्रतिनिधि हय आ गजराज स्वार्थजनित क्रूरता के .... भूख के वजन पियास से हमेशा जादे होइअ... अब निर्णय के समय हय - मासूमियत के बचाबे के हय कि स्वार्थजनित क्रूरता के... " लाइन-दर-लाइन ताली के आवाज बढ़इत जाए। अब ई आवाज श्मशानघाट तक पहुँचे लागल।

डोमराज कालीचरण एगो चिता में आग देइत रहथ । बात-बात पर हँस देइत रहथ। एक तरफ परिजन के बिछोह में घरबइआ कनइत रहे, आ दोसर तरफ हर बात पर डोमराज हँसइत रहथ। लेकिन कोई कुछ नs बोले। श्मशान के राजा से ओझरानाई ठीक नs रहे। ताली के आवाज सुनलन। अप्पन दक्षिणा समेट के आवाज के तरफ बढ़लन। हुनका बड़ा अचरज होइत रहे। हजारों साल से कोन्हारा घाट हुनकर वंश के मूल निवास हय। अपना जिनगी में ऊ कोन्हारा घाट पर न मालूम केतना हजार लोग के आग दे के वैकुण्ठवासी बना चुकल रहथ । कोन्हारा घाट पर जिनगी के लगभग सब रङ देख चुकल रहथ। दुर्गा-पूजा के अवसर पर सालों-साल सजइत शास्त्रीय संगीत के महफिल से ले के ऊ पार सोनपुर-मेला के कैबरे-डांस के गंदगी तक .... निम्मन-निम्मन साहसी लोग के पैंट गीला कs देबेवाला सावन-भादों महीना के निस्बद्ध अधरतिया में गङ्गा माई के प्रलयंकर दहाड़ से ले के कार्तिक पूर्णिमा के अथाह जन-समुद्र तक .... कलकत्ता से आबेवाला जहाज-टाइप बड़का-बड़का नाव से ले के कोइलवर से बालू लाबेवाला छोट-छोट नाव तक ... सोनपुर मेला से चोरी-डकैती कs नाव से भागइत चोर से ले के पीछा करइत पुलिस तक .... गङ्गा मइया के किछार पर पनपइत प्रेमालाप से ले के अगिला जनम में मिले के वादा के साथ कएल गेल आत्महत्या तक .... मुख्यघाट पर रोज-रोज होइत मुंडन, जनेऊ, बियाह आदि के जीवंत धुन से ले के श्मशानघाट पर गुँजइत स्वजन-प्रियजन के बिछोह के मरंत धुन तक .... सालों-साल बनइत-बिगड़इत पीपा पुल से ले के विद्युत शवदाहगृह तक...... कोन्हारा घाट के अनगिनत दृश्य डोमराज के आँख में रचल-बसल हय।

डोमराज के देखते सुधाकर हुनका चीन्ह गेल। सुधाकर के वक्तृत्व जारी रहल - एगो आउरो राजा हतन। कोन्हारा घाट के राजा - 'राजा डोमराज' । बूढ़ मरे, जवान मरे, बाल-बुतरू मरे, लेकिन हिनकर हँसी सही-सलामत रहइअ। बइठल-बइठल आमदनी होए तs के नs हँस्सत? हिनको से छुटकारा चाही हमरा सs के। प्रकृति के संविधान पर हिनको से खतरा हय।

वक्तृत्व खतम भेल। खूब ताली बजल। धीरे-धीरे भीड़ छँट गेल। रह गेलन डोमराज आ सुधाकर। "हमरा साथे चलs" - डोमराज हँसइत कहलन।

डोमराज आगे-आगे आ सुधाकर पीछे-पीछे। आपस में कोई बातचीत नs। श्मशानघाट पर पहुँचलन।

- चाय पीबs?
- हम श्मशानघाट पर चाय नs पियsइछी।
- गलती करsइछs, पियल करs, शांति मिलतsओ।

एतने में एगो अर्थी आएल । दुल्हन के जोड़ा में जवान लड़की के लाश रहे । जहर खा लेले रहे । भाई-गोतिया दहाड़ मारके कनइत रहथ। बाबूजी पत्थल बनल बइठल रहथ ।

सुधाकर से बरदास नs भेल। फफके लागल। डोमराज चुपचाप आग देबे में लागल रहथ - न कोई माँग, न रूसनाई, न दक्षिणा के फरमाइश । लड़की के हाथ से चूड़ी उतार के भाई के देलन - "काँच के चूड़ी आग में गल जतsओ, घर में जब-जब देखबs, बहिन के इयाद ताजा हो जतsओ।"

डोमराज हँसsइत सुधाकर के पास गेलन - "देखs, अब ई लड़की के परमशांति मिल गेलई। चिता के आग विलक्षण होइअ। एक तरफ आग के धमक आ दोसर तरफ गङ्गा माई के गोदी, संसार के सब सुख-दुख से प्राणी के ऊपर उठा देइअ। इहे परमशांति हय, इहे निर्वाण हय, इहे मोक्ष हय।"

सुधाकर उठल आ दू चुक्का चाय ले आएल। तनिके देर में एगो आउर लाश अलई - नब्बे साल के बुजुर्ग के लाश। बाल-बच्चा विदेश में हई। गोतिया आग देलकई। सुधाकर के हृदय में विद्रोह जाग गेलई - "ई अनर्थ हय, भरल-पूरल परिवार अछइत मरबइया अप्पन पूत से आग पाबे लेल बिलल्ला हय ? अइसन नालायक संतान से निःसंतान होनाई अच्छा हय। घनघोर कलयुग आ गेल।"

डोमराज भभा के हँस देलन - "देखs बाबू, कलयुग समाज के सोच में हय, हियाँ श्मशान में नs आ सकइअ। हियाँ सत्य के साम्राज्य हय, निर्विवाद रूप से अंतिम सत्य के। कोई झूठ नs बोल सकइअ। ई सत्य परमानंददायक हय, परम विश्रांतिदायक। समानता के दर्शन श्मशान के अतिरिक्त आउर कहीं संभव नs हय। राजा-रंक, अमीर-गरीब, ऊँच-नीच, जात-पाँत आदि के कोई भेद नs देखबs। एक्के लकड़ी आ एक्के आग - एतने हय सब के भाग। समझs कि 'जे जर गेल ऊ तर गेल' । गङ्गा माई के गोदी में सबके लेल जगह हय।"

अब डोमराज के बात में सुधाकर के दम नज़र अबsइत रहे। अप्पन झोरा में से नोटपैड निकाल के कुछ लिखे लागल। एतने में दू गो दोना में मूर्ही लेले डोमराज आ गेलन। दुन्नों गोटे फाँके लगलन ।

चाय, मूर्ही आ बतियान के बीच अन्हार होए लागल रहई। कोन्हारा घाट के सब मंदिर में आरती के घंटा बजे लागल। दुन्नों गोटे मंदिर-मंदिर घूम के आरती के परसादी लेलन। राउंड पूरा हो गेल तs डोमराज एगो पान के गुमटी पर रुकलन। मीठा पत्ता के दू गिलौरी पान बनल। सुधाकर पान नs खाइत रहे। लेकिन ना-नुकुर के सवाले नs रहे। सुधाकर के हिचक श्मशान के आग के प्रताप में भस्म हो गेल रहे। पान के रस जइसे-जइसे देह के नस से होके ब्रह्मरंध्र तक अप्पन मौजूदगी के खबर पहुँचएलक, ओइसे-ओइसे सुधाकर मानव-जीवन के सार्थकता समझे लागल। दुन्नों गोटे वापस श्मशानघाट पर पहुँच गेल रहथ।

- रात के समय हियाँ ठहरे के कोई इंतजाम हय की?

डोमराज फेर से भभा के हँस देलन - "हो सुधाकर बाबू ! अभी तक समझ में नs अलsओ? पूरा संसार से दुत्कारल लोग के हियाँ ठौर मिल जाइअ। तोरा ठौरे के चिंता हो गेलsओ? खा-पियs आ केनहूँ ओलर जा। डेराए के जरूरत नs हय। एक तरफ गङ्गा माई के गोदी के शीतलता आ दोसर तरफ पहरेदार के रूप में साक्षात महाकाल!"

आधा रात तक कोई न कोई लाश जरे के सिलसिला चलsइत रहल। सुधाकर के पपनी अब लथार मारsइत रहsई। एक जगह ओलर गेल।

रात में लघुशंका के लेल नीन खुललई। भयानक निस्बद्ध अन्हरिया रात... श्मशानघाट पर धीरे-धीरे जरइत आग के घूरा.... हरहराइत-घरघराइत-बहइत गङ्गा माई के धार... बीच-बीच में कुक्कुरवृंद के पंचइती.... सुधाकर के हियाओ जवाब देबे लागल। डेग बढ़ाबे के हिम्मत नs भेलई। जहाँ ओलरल रहे, ओहे जगह हल्लुक हो गेल। अब ओक्कर आँख से नीन गायब रहे। एन्ने-ओन्ने नज़र घुमएलक। कुछ लोग घाट के सीढ़ी पर, कुछ लोग मंदिर के चबूतरा पर, तs कुछ लोग टिनही छज्जा के निच्चा दर-दुनिया से बेखबर निश्चिंत होके फोंफ काटइत रहथ। सुधाकर के कुछ इत्मीनान भेल। हिम्मत बटोर के फेर से ओलर गेल।

बिहान हो गेल। सुधाकर घोड़ा बेच के सूतल रहे। डोमराज तब तक आधा दर्जन आत्मा के मोक्ष दिया देले रहथ। सुधाकर पर अब सुरुज भगवान गरमाए लागल रहथ। आँख मलsइत उठल आ सीधे डोमराज के पास पहुँच गेल - "आहो काली भाई, ई भयानक जगह तोरा डर नs लगsइछओ?"

- "डर केकरा नs लगइछई सुधाकर बाबू? हमरो लगइअ, लेकिन ई श्मशान के अन्हार से नs, बल्कि लोग के दिमाग के अन्हार से। हम्मर बेटा के जनम भेल। हम डेरा गेली कि हमरा मरे के बाद एकरा आग कोन देतई? रोज-रोज लाश फूँकइत-फूँकइत समझ में आएल कि जराबे के काम तs आग के हय। हम तs खाली आग धरा के पकड़ा देइछी। हम्मर डर रफ्फू-चक्कर हो गेल।"

सुधाकर धरफरा के उठल आ सीधे घर के तरफ चल देलक।

अब सुधाकर रोज सँझिया के श्मशानघाट पर आबे लागल। धीरे-धीरे दुन्नों में अपनापन बढ़े लागल।

सुधाकर के थीसिस पूरा हो गेल रहे। जमा कs देलक। थीसिस के सिलसिला में कुछ दिन के लेल श्मशानघाट पर ओक्कर आवाजाही बंद हो गेल।

डेढ़ महिन्ना के बाद सुधाकर श्मशानघाट पर आएल - 'डॉ. सुधाकर चतुर्वेदी' । घाट पर कालीचरण के बेटा आग देबे के काम में लागल रहे। पूछे पर पता चलल कि दस दिन पहिले कालीचरण जी के हार्ट-अटैक भेलएन आ ऊ चल देलन। एतना बताबे में कालीचरण के बेटा, मतलब कि नएका डोमराज तीन बेर हँसलक। सुधाकर से नs रहल गेल - "बेटा, तोहर बाबूजी के असमय मृत्यु हो गेलsऊ, आ तूँ हँसsइछे?"

- "सुधाकर बाबू, बाबूजी के कहनाम रहई कि श्मशान में सब कानेवाला लोग मिलइअ, कम से कम एगो हँसेवाला होए के चाही, ताकि श्मशान के दुनिया हँसीविहीन नs हो जाए।"

सुधाकर दुन्नों हाथे अप्पन माथा पकड़ के बइठ गेल। ओकरा समझ में आ गेलई कि ऊ भले ही डॉक्टर बन गेल, लेकिन ओक्कर थीसिस अभियो अधूरा हय।
(समाप्त)
© जय राम सिंह (24.07.2026)

वैशाली में बज्जिका, महोत्सव के ई बात। धन्यवाद सरकार के, सुन्नर हय सौगात।। १वर्षा सिंह डीएम स्वयं, सांस्कृतिक व्यक्तित्व।...
11/07/2026

वैशाली में बज्जिका, महोत्सव के ई बात।
धन्यवाद सरकार के, सुन्नर हय सौगात।। १

वर्षा सिंह डीएम स्वयं, सांस्कृतिक व्यक्तित्व।
जय महोत्सव बज्जिका, जय जय हो नेतृत्व।। २

बज्जिका के गीत हो, चित्रकला साहित्य।।
फिल्म बने सीरियल बने, नवाचार हो नित्य।। ३

कइसे रोजगारोन्मुखी, बने बज्जिका आज।
विद्वज्जन मंथन करथ, आगे बढ़े समाज।। ४

शिक्षा में हो बज्जिका, मनोरंजन के बात।
नौजवान पीढ़ी जुड़े, सामूहिक हो साथ।। ५

अग्रिम हय शुभकामना, पञ्चम में जयगान।
जय जय झंडा बज्जिका, यश के हो अवदान।। ६

© जय राम सिंह (११.०७.२०२६)

26/05/2026

एगो ग़ज़ल देखल जाए।

2122 / 2122

रात बीते के घड़ी में
फूल ले के फुलझरी में

झाँक देलक खूब अरमाँ
दिल बढ़ा के तश्तरी में

जोर जोरू बेच देलक
सेठ जी के परतरी में

प्राण पर आयल बवंडर
पुलिस खातिर मुखबरी में

कान पर घस गेल सेनुर
हाथ ओक्कर हड़बड़ी में

काम कइसे होय पूरा
ध्यान हय जब धरफरी में
© जय राम सिंह (26.05.2026)

19/04/2026

जनगणना आ बज्जिका
(दू गो मुक्तक)

लोग बज्जिका के नासमझी में कह देतन हिन्दी हय।
ज्ञान भूमि ई बज्जिकांचल, कण-कण में आनन्दी हय।
मोहग्रस्त भाई-बहिनी के बतलाबे - समझाबे के,
बागमती हय बज्जि गङ्गा, नारायणी कालिन्दी हय।।

हमरा सब के गाँओ में हर घर अङना में बज्जिका।
अर्चन-वन्दन हर सपना अभ्यर्थना में बज्जिका।
गर्व करे के चाही सब के अप्पन मातृभाषा पर,
आऊ एमरी लिखवाबे के जनगणना में बज्जिका।।
-- जय राम सिंह
🙏🙏🙏🌹

18/04/2026

ग़ज़ल

तोरा जइसन कोई कहाँ खोजू?
कइसे खोजू? कोई कहाँ खोजू?

देखे-परखे के एगो सीमा हय
ओसे आगे कोई कहाँ खोजू?

घर के मलबा से घर बने कइसे
घर हो अज्जर कोई कहाँ खोजू?

हमरा ऊपर हय पाँव दुनिया के
कइसे उठ के कोई कहाँ खोजू?

मिलके बिछुड़ेवला हज़ारों हय
जे न बिछुड़े कोई कहाँ खोजू?

गलती से आदमी से हो गलती
माफ कर दे कोई कहाँ खोजू?
© जय राम सिंह (18.04.2026)

15/03/2026

जनगणना में बज्जिका
(लेख - जय राम सिंह)

अब जबकि तय हो गेल हय कि बज्जिका के गिनती कराबे के लेल कोड संख्या 76 के सहारा लेबे के हय। आ ओकरा बाद OTHERS में 'बज्जिका' या 'BAJJIKA' लिखाबे के हय, तs ई बात के प्रचार-प्रसार बहुत्ते ज़रूरी हय। कुछ काम आसानी से हो सकइअ :-

(1) जागरूक लोग अप्पन-अप्पन गाँव/टोला/शहर के प्राइमरी/मिडिल/हाईस्कूल में जा के बज्जिकांचल के रहबइआ शिक्षक लोग से सकरवा लथ कि ई जिम्मेदारी उठएतन । यदि शिक्षक लोग सकार लेतन तs ई काम बहुत आगे बढ़ जाएत।

अप्रैल महिन्ना में अप्पन दस दिन के प्रवास के दौरान अप्पन गाँव आ आसपास के दस गो स्कूल/कॉलेज में जाके शिक्षक लोग आ छात्र लोग से मिल के ई बात पहुँचाबे के हम्मर निश्चय हय।

(2) स्थानीय गायक लोग आ अन्य कलापार्टी के लोग के कहल जाए कि अप्पन-अप्पन कार्यक्रम में बज्जिका जागरण गीत के प्रमुखता दथ। बज्जिका जागरण गीत के रिकॉर्ड कs के यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स आदि पर धड़ाधड़ पोस्ट कएल जाए। जेतना जादे लोग देखत ओतना जादे जागृति आएत।

(3) बज्जिकांचल में अवस्थित प्रिंटिंग प्रेस वाला लोग सs में से यदि कुच्छो ई बात के समझ जाएत तs स्थानीय बस/ट्रक/टेम्पो आदि पर साटे के लेल पम्फलेट छाप के दे सकइअ। यदि ई काम हो गेल तs जनजागृति खूब हो जाएत।

(4) बज्जिका के नामी-गिरामी कवि लोग जइसे अखौरी साहेब, ज्वाला बाबू, शारदा बाबू, विद्या जी, रणजीत बाबू, मणिभूषण बाबू, हेमा जी आदि लोग के लिखल नारा जगह-जगह प्रदर्शित कएल जाए।
कुछ नारा द्रष्टव्य हय :-

(क) श्री अखौरी चन्द्रशेखर
अबकी चुकब तs दस साल भुकबs!
भइआ हो जगइजा, बज्जिका लिखइजा !!

(ख) - श्री विगन रौनियार
बज्जिका माय के अँचरा
शीतल शांत मनोरम हए
दुनिया में सबसे न्यारा
एक्कर रूप अनूपम हए

(ग) डॉ. विद्या चौधरी
बज्जिका माय के सिखाएल भाषा हय।

(घ) श्री ईश्वर करुण
बोलs बज्जिका, खोलs बज्जिका
जे जे बोले ओक्कर जिनगी तर जाए
जे न बोले ओक्कर भाषा मर जाए।

(ङ) हरिनारायण सिंह हरि
बज्जिभूमि के मीठ बज्जिका भाषा हय
माई के ई आशा हय परिभाषा हय

(च) श्री कौशल किशोर शर्मा
सेवा में समर्पित सब दिन
जेकरा ला पर'किरती हय
सबसे सुन्नर सबसे निम्मन बज्जिकांचल के धरती हय

(छ) श्री रत्नानंद झा 'छोटन'
बज्जिका अप्पन माटी के सुगंध हए।
एकरा जोगाऊ, सजाऊ आ जन-जन तक पहुंचाऊ।।

(ज) श्री मणिभूषण प्रसाद सिंह अकेला
अप्पन डफली अप्पन राग के
बेसुर भाओ भुलाएल जाओ
बेमार परल बज्जिका मइआ के
रोग-बलाए भगाएल जाओ
अप्पन सेवा भाओ से हुनकर
बिगरल दशा सुधारल जाओ ।

एही तरह से आउरो बहुत तरीका हो सकइअ जेसे एमरी के जनगणना में बज्जिका के संदर्भ में वांछित परिणाम आ सकइअ।

(5) बज्जिकांचल के सिनेमाघर, मल्टीप्लेक्स आदि के कहल जाए कि फिल्म के इंटरवल के दौरान बज्जिका-जागरण से संबंधित स्लाइड /वीडियो /गीत आदि चलाएल जाए। नौजवान लोग के ई काम से जोड़े के ई कारगर तरीका होएत। वैशाली के तs डीएम साहिबा श्रीमती वर्षा सिंह स्वयं बज्जिकाप्रेमी हतन। ई सुयोग के लाभ उठाएल जा सकइअ। देखादेखी बज्जिकांचल के अन्य जिलाधिकारी लोग के भी आँख खुल जाएत।

जय बज्जिका 🙏🙏🙏🌹

सब बज्जिकाभाषी लोग से आग्रह हय कि ई पत्र में देल गेल संदेश के पढ़ के आगामी जनगणना में अप्पन मातृभाषा बज्जिका के प्रविष्ट...
11/03/2026

सब बज्जिकाभाषी लोग से आग्रह हय कि ई पत्र में देल गेल संदेश के पढ़ के आगामी जनगणना में अप्पन मातृभाषा बज्जिका के प्रविष्टि कराएल जाए। जय बज्जिका 🙏🙏🙏🌹

10/02/2026

नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल 2025 में जय राम सिंह के संबोधन सुनल जाए। ई वीडियो क्लिप आयोजन समिति के इंस्टाग्राम पेज से साभार लेल गेल हय। साथ में मंचासीन हतन प्रसिद्ध मगही साहित्यकार श्री उमेश्वर प्रसाद उमेश (बीच में) आउर डॉ. एम जे वारसी, डीन, भाषा विज्ञान संकाय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय। जय बज्जिका 🙏🙏🙏🌹

साहित्यिक महाकुंभ के यात्रा(यात्रा-वृत्तांत - जय राम सिंह)अविभाजित बिहार के भौगोलिक मानचित्र अद्भुत रहे । प्रकृतिप्रदत्त...
13/01/2026

साहित्यिक महाकुंभ के यात्रा
(यात्रा-वृत्तांत - जय राम सिंह)

अविभाजित बिहार के भौगोलिक मानचित्र अद्भुत रहे । प्रकृतिप्रदत्त कोई रचना या संरचना अइसन नs रहे जे बिहार में नs होए । पूरा उत्तरी बिहार मैदानी इलाका, गङ्गा माई आ हुनकर बहिनपा नदी सs के कृपा से लहलहाइत रहे । दक्खिनी बिहार में छोटानागपुर के पठार रहे । घनघोर से घनघोर जङ्गल, जलप्रपात, घाटी, वन्यजीव, तरह-तरह के अनमोल खनिज के अनगिनत खदान सs के बीच से सोन, दामोदर, स्वर्णरेखा जइसन नदी के हरहराइत-बहइत देखनाई अपने-आप में अलौकिक अनुभव होइत रहे । उत्तरी बिहार में जहाँ मानव-सभ्यता विकसित होइत रहे, हुअईँ दक्खिनी बिहार में प्राकृतिक सभ्यता परवान चढ़इत रहे ।

उत्तरी आ दक्खिनी बिहार के मिलाबे के काम मागधी क्षेत्र करइत रहे । अइसे समझल जाए कि मगध में मानव-सभ्यता आ प्राकृतिक सभ्यता के सङ्गम होइत रहे । सङ्गम केकरो होए, नदी-नदी के होए, पहाड़-पठार के होए, मानव-मानव के होए अथवा मानव-प्रकृति के होए, हमेशा कल्याणकारी आ सिरजनकारी होइअ । एही कारण हय कि ई क्षेत्र के हवा लगते सिद्धार्थ नाम के कोई आदमी बुद्धत्व प्राप्त कs के 'गौतम बुद्ध' बन जाइछन आ वर्द्धमान नाम के आदमी बुद्धत्व प्राप्त कs के 'महावीर' बन जाइछन ।

वृंदावन में यमुना नदी के किछार पर एगो जामुन के विशाल पेड़ रहे । ऊ पेड़ भगवान श्रीकृष्ण के बचपन में हुनकर खूब सेवा कएलक । भगवान ऊ पेड़ के छँहिरा में खूब खेलथ आ मन करे तs पक्कल-पक्कल मीठ-मीठ जामुन खाथ । जामुन के पेड़ द्वारा भगवान के अद्भुत सेवा से ब्रह्माजी प्रसन्न हो गेलन । पेड़ के सामने प्रकट होके कहलन कि तूँ भगवान के जेतना सेवा कएलs ओसे हम बहुत खुश हती, वर माङs । जामुन के पेड़ कथी वर माङत ? हाथ जोड़ लेलक आ ब्रह्मोजी के खूब पक्कल-पक्कल मिठगर जामुन खियएलक । ब्रह्माजी आउर प्रसन्न हो गेलन । जाइत-जाइत अपना ओरी से ऊ पेड़ के एगो वरदान दे देलन । वरदान रहे कि जे कोई ऊ पेड़ के छँहिरा में आएत, ऊ कवि हो जाएत, जब तक छँहिरा में रहत तब तक ओक्कर कवित्व शक्ति जाग्रत रहत ।

एक दिन एगो नाविक अप्पन नाव खेबइत-खेबइत ऊ जामुन के पेड़ के छँहिरा में पहुँच गेल । वरदान के प्रभाव के कारण अचानक ऊ नाविक में कवित्व शक्ति जाग्रत हो गेल । ओकरा मुँह से संस्कृत में कविता निकले लागलः-

जम्बूफलानि पक्वानि पतंति ते यमुनाजले
तानि मत्स्यानि न खादंति ......................

एतना कहइते-कहइते नाविक लग्गी मार देलक आ नाव सहित जामुन के पेड़ के छँहिरा से बाहर आ गेल । छँहिरा से बाहर अबइते ओक्कर कवित्व शक्ति बिला गेल । अब ऊ करौटिन उपाय कs के रह गेल लेकिन ‘खादंति’ के आगे कुच्छो नs कह पएलक आ ओक्कर कविता अधूरे रह गेल । खींझ के ऊ कहे लागल कि “तानि मत्स्यानि न खादंति.. आगे डुबुर डुबुर डुबुर...” जइसे पानी में लग्गी मारे से बुलबुल्ला फूट के बोलइअ ओइसे ।

कहे के मतलब हय कि मगध ज्ञान के भूमि हय । एहे मगध में अवस्थित हय एगो ऐतिहासिक नगरी जेक्कर नाम हय राजगीर । एक्कर पुरनका नाम राजगृह हय काहे कि कभी ई मगध साम्राज्य के राजधानी कहल जाइत रहे । राजगीर सनातन धर्म, बौद्ध धर्म आ जैन धर्म, तीनों के लेल तीर्थ हय । पटना से लगभग 125 किमी दक्खिन-पूर्व में अनेक पहाड़ी आउर सघन जङ्गल के बीच बसल राजगीर नs केवल एगो प्रसिद्ध धार्मिक तीर्थस्थल हय, बल्कि एक सुन्दर हेल्थ रेसॉर्ट आ क्रीड़ा-नगरी के रूप में भी लोकप्रिय हय । चारों तरफ सुरम्य पहाड़ी से घिरल राजगीर आजकल बिहार के सबसे लोकप्रिय पर्यटन-स्थल मानल जाइअ । सरकारो हियाँ के विकास पर पूरा ध्यान दे रहल हय । पर्यटक लोग के आकर्षण आ सुविधा के लेल बहुत काम कएल गेल हय । राजगीर जनाई अब पहिले से जादे आसान हय । अब ट्रेन से या सड़क से, कौनो तरह से आसानी से राजगीर जाएल जा सकइअ । ठहरे के लेल महँङा-सस्ता, हर तरह के होटल आ गेस्ट-हाउस उपलब्ध हय ।

इहे राजगीर में दिनांक 21.12.2025 से ले के दिनांक 25.12.2025 तक नालंदा साहित्य महोत्सव मनाएल गेल । ई महोत्सव के निदेशक रहथ आईएएस अधिकारी श्री गङ्गा कुमार जी । गङ्गा कुमार जी स्वयं भारतीय साहित्य आ संस्कृति के प्रबल ध्वजवाहक मानल जाइछन । हुनकर अदम्य मेहनत से देश भर के 92 नामी-गिरामी विभूति लोग के पदार्पण पाँच दिवसीय नालंदा साहित्य महोत्सव में भेल । प्रमुख वक्ता के रूप में पद्म-विभूषण सोनल मानसिंह, पद्मश्री शोभना नारायण, डॉ. शशि थरूर, डॉ. सिद्धार्थ सिंह, डॉ. अमिताभ कान्त आदि रहथ । नालंदा साहित्य महोत्सव में बिहार के क्षेत्रीय भाषा जइसे बज्जिका, मैथिली, अंगिका, मगही आ भोजपुरी पर आधारित सत्र के भी व्यवस्था कएल गेल रहे ।

एक दिन हमरा बज्जिका के जुझारू सेवक शोधार्थी श्री अभय कुमार के फोन आएल कि नालंदा साहित्य महोत्सव में वक्ता के रूप में भागीदारी के लेल हमरो नामांकित कएल गेल हय । अभय जी एहो बतएलन कि बज्जिका से दू गो वक्ता रहतन । आदरणीया डॉ. विद्या चौधरी जी के नाम सुन के मन गद्गद हो गेल । महोत्सव के दिन जइसे-जइसे नजदीक आएल, तब पता चलल कि गङ्गा कुमार जी केतना बारीकी से ई महोत्सव के ताना-बाना बिनले रहथ । भारतीय मनीषा में उपलब्ध एक से बढ़के एक विद्वान अतिथि वक्ता लोग के सकार लेनाई बड़का काम रहे । ऊ लोग के आबे-जाए के व्यवस्था, राजगीर में ठहरे के व्यवस्था, खान-पान के व्यवस्था से ले के कार्यक्रम स्थल के बारीक से बारीक चीज पर नज़र रखइत अद्भुत व्यवस्था कएल गेल रहे । हर व्यवस्था के लेल योग्य लोग के टीम बनाएल गेल रहे जेक्कर सीधे निगरानी स्वयं गङ्गा कुमार जी करइत रहथ । जे वक्ता बिहार के बाहर से आबे के रहथ, हुनकर स्वागत पटना एयरपोर्टे पर प्रोटोकॉल के टीम करे लेल तइयार रहे । फेर राजगीर तक ले जाए के लेल हर वक्ता के लेल उचित गाड़ी के व्यवस्था लॉजिस्टिक टीम के हाथ में रहे । होटल में अतिथि लोग के देखभाल के लेल हॉस्पिटैलिटी के टीम तइयार रहे । कार्यक्रम स्थल के लेल राजगीर में स्थित राजगीर कन्वेंशन सेंटर के चयन कएल गेल रहे । हमरा समझ से एतना भव्य, सुनियोजित, सर्वसुविधासंपन्न कन्वेंशन सेंटर पूरा बिहार में एकलौता इहे हय । कन्वेंशन सेंटर पर स्वागत, यातायात, भोजन-जलपान, प्रदर्शनी, सुरक्षा आदि से लेके इवेंट-मैनेजमेंट तक हर व्यवस्था बारीकी से कएल गेल रहे ।

हमरा मुंबई से जाए के रहे । समय से हवाई जहाज के टिकट भेज देल गेल रहे । अप्पन पेशेगत आ पारिवारिक व्यस्तता के कारण होटल में रुके के समय हमरा पास नs रहे, अन्यता ओकरो व्यवस्था कs देल गेल रहे । आदरणीया विद्या चौधरी जी आ हम्मर सत्र एक्के दिन अर्थात् 22.12.2025 के दिन रहे । विद्या जी के सत्र लंच से पहिले आ हम्मर सत्र लंच के बाद रहे । पटना से सबेरे आठ बजे आयोजन-समिति द्वारा देल गेल गाड़ी से राजगीर के यात्रा प्रारंभ भेल ।

मैट्रिक परीक्षा पास कएला के बाद एक बेर हम राजगीर गेल रही । मन में ऊ समय के छवि ताजा होए लागल । आशंका रहे कि राजगीर पहुँचे में कम से कम चार घंटा तs लागबे करत । एही खातिर जब ड्राइवर कहलक कि डेढ़ घंटा लागत, तs हमरा विश्वास नs भेल । लेकिन ड़्राइवर के पास आज के अनुभव रहे आ हमरा पास पैंतीस साल पहिले के । पटना के गोला रोड से निकल के जब गाड़ी मरीन ड़्राइव पर सरपट भागे लागल, तs हमरा अप्पन राज्य बिहार के ढ़ाँचागत विकास पर गर्व होए लागल । लगभग बीस मिनट में मरीन ड्राइव पार कs गेली । आगे कच्ची दरगाह-बिदुपुर पुल के एप्रोच रोड से होइत बख्तियारपुर के हाईवे पर गाड़ी दउरे लागल । अगला आधा घंटा में बख्तियारपुर आ गेल । दिसंबर के महिन्ना आ रोड के किनारे गरम—गरम चाय बनइत देख के चाय पिए के लेल जिउ ललचाए लागल । चायोपरांत यात्रा फेर से शुरु भेल । राँची जाएवाला हाईवे के तs शक्ल-सूरत सब बदल गेल रहे । लाजवाब फोर लेन रोड देख के बुझाए लागल कि बिहार के लोग वर्तमान राज्य-प्रशासन के काहे एतना पसंद करइछन । ड्राइवर ठीके कहइत रहे । डेढ़-दू घंटा में गाड़ी राजगीर कन्वेंशन सेंटर के अहाता में घुस गेल रहे । तत्काल अतिथि-वक्ता वाला पास मिल गेल । ओही समय डॉ. शशि थरूर जी के सत्र चलइत रहे । उत्सुकतावश हुनकर सत्र सुने के लेल चल गेली । हुनका साक्षात सुनला के बाद महसूस भेल कि काहे थरूर साहेब एतना प्रसिद्ध हतन । थरूर साहेब के सत्र के बाद आदरणीया विद्या जी के सत्र शुरु भेल । दर्शक-दीर्घा में बज्जिका के अदम्य योद्धा आदरणीय रामनरेश शर्मा सर के साथ हमहूँ रही । सत्र खूब बन्हिया चलल । विद्या जी बज्जिका के समर्थन में एक से बढ़के एक तथ्यात्मक तर्क देके पूरा हॉल के प्रशंसा बटोर लेलन । सत्र के समाप्ति के बाद बज्जिका पत्रिका पहरुआ के प्रति भी श्रोतावृंद में बाँटल गेल । बज्जिका पत्रिका देख के हुआँ उपस्थित लोग खूब गद्गद भेलन । पता चलल कि आयोजक लोग ऊ क्षेत्र के स्कूल-कॉलेज के छात्र लोग के ई साहित्य महोत्सव में बोलएले रहे । ई बहुत्ते सुखद बात लागल । काहे कि इंटरनेट आ एआई के ज़माना में अगिला पीढ़ी के साहित्य से जोड़नाई बहुत्ते ज़रूरी हय । बज्जिकांचल में रहेवाला कए गो छात्र-छात्रा लोग के देख के मन जुड़ा गेल । ओमें से कए गो छात्र तs अप्पन बज्जिका में लिखल कुछ लेख-कविता वगैरह भी देखएलक ।

भोजन के अवकाश के बाद सत्र के सिलसिला फेर से शुरु भेल । पहिले सत्र हम्मर रहे । हम्मर सत्र में सह-वक्ता के भूमिका में रहथ मगही के जानल-मानल विद्वान श्री उमेश्वर प्रसाद उमेश जी । प्रश्नकर्ता के भूमिका में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भाषा-विज्ञान संकाय के डीन डॉ. एम जे वारसी साहेब रहथ । सत्र के विषय रहे The Lost Love : Challenges and opportunities to preserve Bajjika, Magahi & Angika in Modern Bihar. Besides, strategies to revive these lesser-known regional languages. प्रारंभिक परिचय के बाद वारसी साहेब सवाल पूछे के सिलसिला शुरु कएलन । हम निश्चय कs लेले रही कि बज्जिके में बोलम । मगही भूमि पर बज्जिका में बात करनाई रोमांचित करेवाला अनुभव रहे । बज्जिका के असर के अंदाजा ई बात से लगाएल जा सकइअ कि पैंतालीस मिनट के पूरा सत्र ताली से गड़गड़ाइत रहल ।

बाद के सत्र में भारतीय सिनेमा के सबसे मजगूत स्तंभ में से एक श्री आदूर गोपालकृष्णन के सत्र रहे । हुनकर दर्शन मिलनाई आ हुनका सुननाई अपने-आप में एगो अनुभव रहे । ई सत्र के बाद भोजपुरी के नामचीन गीतकार श्री मनोज भावुक जी, प्रसिद्ध सिने अभिनेता संजय मिश्रा जी आ भोजपुरी के प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक श्री विनोद शर्मा जी के सत्र रहे । ऑडिटोरियम में जब पद्म-विभूषण आ पद्मश्री से सम्मानित लोग बइठल रहथ, तब की श्रोता आ की वक्ता, सब के ऊर्जस्विता अल्लग स्तर के हो गेल । हम्मर वापसी के फ्लाइट ओहे रात में नौ बजे के रहे । कुहरा के डर अप्पन जगह बनल रहे । समय से निकलनाई ज़रूरी रहे, अन्यथा फ्लाइट छूट जाए के जोखिम रहे । मन करे कि आउरो रुकल जाए, लेकिन मन मारके चले के पड़ल । हुआँ रुक नs पइली जेक्कर बहुत्ते निराशा हय ।

नालंदा साहित्य महोत्सव के समाचार देश के राष्ट्रीय समाचार चैनल आ समाचार-पत्र सs में प्रमुखता से कवर कएल गेल । बिहार के सरजमीं पर अइसन ऐतिहासिक सारस्वत आयोजन के लेल आयोजक लोग के केतना मेहनत करे के पड़ल होइत ? संभव हय कि ई साहित्य महोत्सव से भारत में साहित्यिक आ सांस्कृतिक जागरण के महाशंख साहित्य के ई महाकुंभ में फुँका गेल होए ।
© जय राम सिंह (02.01.2026)

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842001

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