24/07/2026
अधूरा थीसिस
(कहानी - जय राम सिंह)
नारायणी अर्थात् गंडक के पूर्वी किछार पर अवस्थित प्रसिद्ध घाट - नाम हय 'कोन्हारा घाट' । कोन्हारा शब्द 'कौन हारा' के अपभ्रंश हय। ईहे घाट पर गज आ ग्राह के लड़ाई भेल रहे। गजराज के पियास लागल रहई आ घड़ियाल के भूख। दुन्नों के शारीरिक ज़रूरत प्राकृतिक रहई। प्राकृतिक ज़रूरत के पूरा करनाई ज़रूरी होइअ, अन्यथा ई हाड़-माँस के मशीन कइसे काम करत? कोन्हारावासी लोग नारायणी के भी गङ्गा मइया मानइछथ काहे कि नारायणी के महिमा गङ्गा माई के महिमा से तनिको उनइस नs हय। तनिके आगे बढ़े पर नारायणी माई गङ्गा माई में विलीन हो जाइछथ। दुनिया में ई एकलौता जगह हय जहाँ दू गो गङ्गा के सङ्गम हय - नारायणी आ गङ्गा के।
सुधाकर चतुर्वेदी नेपलिया छावनी के एगो चबूतरा पर बइठल आगंतुक लोग से बात करइत रहथ। हाजीपुर के आरएन कॉलेज में जब स्नातकोत्तर पढ़ाई के अनुमति मिलल, तs पहिले बैच में दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी रहथ। अलबत्त पढ़ाकू हतन। हिनकर तर्कशक्ति बेजोड़ हय आ ओतने बेजोड़ हय हिनकर ओजस्वी वक्तृत्व-शैली। आजकल पीएचडी में लागल हतन। विषय हय - "आत्मा और परमात्मा का भ्रमजाल" । चार्वाक से ले के प्लेटो, सुकरात, डीसेकरैट्स, मार्क्स, पटनायक ... न मालूम केतना के पढ़ चुकल हतन।
- "जमीन पर सबसे बरियार हाथी आ पानी में घड़ियाल। दुन्नों के क्षेत्र प्रकृति के तरफ से बाँटल हय। अप्पन-अप्पन क्षेत्र में यदि रहल जाए तs शांति हय। गजराज उतर गेल दोसर के क्षेत्र में। गुत्थम-गुत्था शुरु हो गेल। जेक्कर क्षेत्र रहे ऊ भारी पड़े लागल। गजराज के अप्पन औकात के थाह लाग गेल । पूरा धड़ डूब गेल रहे, खाली सूँड़ बच्चल रहे। अंतिम सहारा के इयाद कएलक - 'हारे को हरिनाम' । गजराज बच गेल आ घड़ियाल मारल गेल। लेकिन बड़का प्रश्न रह गेल - कोन हारल? गजराज हारल? कि घड़ियाल हारल? कि प्रकृति के संविधान हारल?"
ताली के गड़गड़ाहट घाट तक पहुँचे लागल। बातचीत शुरु करे के बेर बमुश्किल सात-आठ गो लोग रहे। धीरे-धीरे संख्या पचास-साठ तक पहुँच गेल। सुधाकर चतुर्वेदी अब ई घटना पर अप्पन थीसिस के रङ चढ़ावे लगलन। ".... प्रकृति के संविधान सबसे बड़का संविधान हय.... ई संविधान पर खतरा मँडरा रहल हय... यदि ई प्राकृतिक संविधान नs बच्चल, तs हमरा-तोरा में से कोई नs बच्चत... सब के सब मारल जाएम... बिल्कुल निर्दोष घड़ियाल के तरह.... घड़ियाल मासूमियत के प्रतिनिधि हय आ गजराज स्वार्थजनित क्रूरता के .... भूख के वजन पियास से हमेशा जादे होइअ... अब निर्णय के समय हय - मासूमियत के बचाबे के हय कि स्वार्थजनित क्रूरता के... " लाइन-दर-लाइन ताली के आवाज बढ़इत जाए। अब ई आवाज श्मशानघाट तक पहुँचे लागल।
डोमराज कालीचरण एगो चिता में आग देइत रहथ । बात-बात पर हँस देइत रहथ। एक तरफ परिजन के बिछोह में घरबइआ कनइत रहे, आ दोसर तरफ हर बात पर डोमराज हँसइत रहथ। लेकिन कोई कुछ नs बोले। श्मशान के राजा से ओझरानाई ठीक नs रहे। ताली के आवाज सुनलन। अप्पन दक्षिणा समेट के आवाज के तरफ बढ़लन। हुनका बड़ा अचरज होइत रहे। हजारों साल से कोन्हारा घाट हुनकर वंश के मूल निवास हय। अपना जिनगी में ऊ कोन्हारा घाट पर न मालूम केतना हजार लोग के आग दे के वैकुण्ठवासी बना चुकल रहथ । कोन्हारा घाट पर जिनगी के लगभग सब रङ देख चुकल रहथ। दुर्गा-पूजा के अवसर पर सालों-साल सजइत शास्त्रीय संगीत के महफिल से ले के ऊ पार सोनपुर-मेला के कैबरे-डांस के गंदगी तक .... निम्मन-निम्मन साहसी लोग के पैंट गीला कs देबेवाला सावन-भादों महीना के निस्बद्ध अधरतिया में गङ्गा माई के प्रलयंकर दहाड़ से ले के कार्तिक पूर्णिमा के अथाह जन-समुद्र तक .... कलकत्ता से आबेवाला जहाज-टाइप बड़का-बड़का नाव से ले के कोइलवर से बालू लाबेवाला छोट-छोट नाव तक ... सोनपुर मेला से चोरी-डकैती कs नाव से भागइत चोर से ले के पीछा करइत पुलिस तक .... गङ्गा मइया के किछार पर पनपइत प्रेमालाप से ले के अगिला जनम में मिले के वादा के साथ कएल गेल आत्महत्या तक .... मुख्यघाट पर रोज-रोज होइत मुंडन, जनेऊ, बियाह आदि के जीवंत धुन से ले के श्मशानघाट पर गुँजइत स्वजन-प्रियजन के बिछोह के मरंत धुन तक .... सालों-साल बनइत-बिगड़इत पीपा पुल से ले के विद्युत शवदाहगृह तक...... कोन्हारा घाट के अनगिनत दृश्य डोमराज के आँख में रचल-बसल हय।
डोमराज के देखते सुधाकर हुनका चीन्ह गेल। सुधाकर के वक्तृत्व जारी रहल - एगो आउरो राजा हतन। कोन्हारा घाट के राजा - 'राजा डोमराज' । बूढ़ मरे, जवान मरे, बाल-बुतरू मरे, लेकिन हिनकर हँसी सही-सलामत रहइअ। बइठल-बइठल आमदनी होए तs के नs हँस्सत? हिनको से छुटकारा चाही हमरा सs के। प्रकृति के संविधान पर हिनको से खतरा हय।
वक्तृत्व खतम भेल। खूब ताली बजल। धीरे-धीरे भीड़ छँट गेल। रह गेलन डोमराज आ सुधाकर। "हमरा साथे चलs" - डोमराज हँसइत कहलन।
डोमराज आगे-आगे आ सुधाकर पीछे-पीछे। आपस में कोई बातचीत नs। श्मशानघाट पर पहुँचलन।
- चाय पीबs?
- हम श्मशानघाट पर चाय नs पियsइछी।
- गलती करsइछs, पियल करs, शांति मिलतsओ।
एतने में एगो अर्थी आएल । दुल्हन के जोड़ा में जवान लड़की के लाश रहे । जहर खा लेले रहे । भाई-गोतिया दहाड़ मारके कनइत रहथ। बाबूजी पत्थल बनल बइठल रहथ ।
सुधाकर से बरदास नs भेल। फफके लागल। डोमराज चुपचाप आग देबे में लागल रहथ - न कोई माँग, न रूसनाई, न दक्षिणा के फरमाइश । लड़की के हाथ से चूड़ी उतार के भाई के देलन - "काँच के चूड़ी आग में गल जतsओ, घर में जब-जब देखबs, बहिन के इयाद ताजा हो जतsओ।"
डोमराज हँसsइत सुधाकर के पास गेलन - "देखs, अब ई लड़की के परमशांति मिल गेलई। चिता के आग विलक्षण होइअ। एक तरफ आग के धमक आ दोसर तरफ गङ्गा माई के गोदी, संसार के सब सुख-दुख से प्राणी के ऊपर उठा देइअ। इहे परमशांति हय, इहे निर्वाण हय, इहे मोक्ष हय।"
सुधाकर उठल आ दू चुक्का चाय ले आएल। तनिके देर में एगो आउर लाश अलई - नब्बे साल के बुजुर्ग के लाश। बाल-बच्चा विदेश में हई। गोतिया आग देलकई। सुधाकर के हृदय में विद्रोह जाग गेलई - "ई अनर्थ हय, भरल-पूरल परिवार अछइत मरबइया अप्पन पूत से आग पाबे लेल बिलल्ला हय ? अइसन नालायक संतान से निःसंतान होनाई अच्छा हय। घनघोर कलयुग आ गेल।"
डोमराज भभा के हँस देलन - "देखs बाबू, कलयुग समाज के सोच में हय, हियाँ श्मशान में नs आ सकइअ। हियाँ सत्य के साम्राज्य हय, निर्विवाद रूप से अंतिम सत्य के। कोई झूठ नs बोल सकइअ। ई सत्य परमानंददायक हय, परम विश्रांतिदायक। समानता के दर्शन श्मशान के अतिरिक्त आउर कहीं संभव नs हय। राजा-रंक, अमीर-गरीब, ऊँच-नीच, जात-पाँत आदि के कोई भेद नs देखबs। एक्के लकड़ी आ एक्के आग - एतने हय सब के भाग। समझs कि 'जे जर गेल ऊ तर गेल' । गङ्गा माई के गोदी में सबके लेल जगह हय।"
अब डोमराज के बात में सुधाकर के दम नज़र अबsइत रहे। अप्पन झोरा में से नोटपैड निकाल के कुछ लिखे लागल। एतने में दू गो दोना में मूर्ही लेले डोमराज आ गेलन। दुन्नों गोटे फाँके लगलन ।
चाय, मूर्ही आ बतियान के बीच अन्हार होए लागल रहई। कोन्हारा घाट के सब मंदिर में आरती के घंटा बजे लागल। दुन्नों गोटे मंदिर-मंदिर घूम के आरती के परसादी लेलन। राउंड पूरा हो गेल तs डोमराज एगो पान के गुमटी पर रुकलन। मीठा पत्ता के दू गिलौरी पान बनल। सुधाकर पान नs खाइत रहे। लेकिन ना-नुकुर के सवाले नs रहे। सुधाकर के हिचक श्मशान के आग के प्रताप में भस्म हो गेल रहे। पान के रस जइसे-जइसे देह के नस से होके ब्रह्मरंध्र तक अप्पन मौजूदगी के खबर पहुँचएलक, ओइसे-ओइसे सुधाकर मानव-जीवन के सार्थकता समझे लागल। दुन्नों गोटे वापस श्मशानघाट पर पहुँच गेल रहथ।
- रात के समय हियाँ ठहरे के कोई इंतजाम हय की?
डोमराज फेर से भभा के हँस देलन - "हो सुधाकर बाबू ! अभी तक समझ में नs अलsओ? पूरा संसार से दुत्कारल लोग के हियाँ ठौर मिल जाइअ। तोरा ठौरे के चिंता हो गेलsओ? खा-पियs आ केनहूँ ओलर जा। डेराए के जरूरत नs हय। एक तरफ गङ्गा माई के गोदी के शीतलता आ दोसर तरफ पहरेदार के रूप में साक्षात महाकाल!"
आधा रात तक कोई न कोई लाश जरे के सिलसिला चलsइत रहल। सुधाकर के पपनी अब लथार मारsइत रहsई। एक जगह ओलर गेल।
रात में लघुशंका के लेल नीन खुललई। भयानक निस्बद्ध अन्हरिया रात... श्मशानघाट पर धीरे-धीरे जरइत आग के घूरा.... हरहराइत-घरघराइत-बहइत गङ्गा माई के धार... बीच-बीच में कुक्कुरवृंद के पंचइती.... सुधाकर के हियाओ जवाब देबे लागल। डेग बढ़ाबे के हिम्मत नs भेलई। जहाँ ओलरल रहे, ओहे जगह हल्लुक हो गेल। अब ओक्कर आँख से नीन गायब रहे। एन्ने-ओन्ने नज़र घुमएलक। कुछ लोग घाट के सीढ़ी पर, कुछ लोग मंदिर के चबूतरा पर, तs कुछ लोग टिनही छज्जा के निच्चा दर-दुनिया से बेखबर निश्चिंत होके फोंफ काटइत रहथ। सुधाकर के कुछ इत्मीनान भेल। हिम्मत बटोर के फेर से ओलर गेल।
बिहान हो गेल। सुधाकर घोड़ा बेच के सूतल रहे। डोमराज तब तक आधा दर्जन आत्मा के मोक्ष दिया देले रहथ। सुधाकर पर अब सुरुज भगवान गरमाए लागल रहथ। आँख मलsइत उठल आ सीधे डोमराज के पास पहुँच गेल - "आहो काली भाई, ई भयानक जगह तोरा डर नs लगsइछओ?"
- "डर केकरा नs लगइछई सुधाकर बाबू? हमरो लगइअ, लेकिन ई श्मशान के अन्हार से नs, बल्कि लोग के दिमाग के अन्हार से। हम्मर बेटा के जनम भेल। हम डेरा गेली कि हमरा मरे के बाद एकरा आग कोन देतई? रोज-रोज लाश फूँकइत-फूँकइत समझ में आएल कि जराबे के काम तs आग के हय। हम तs खाली आग धरा के पकड़ा देइछी। हम्मर डर रफ्फू-चक्कर हो गेल।"
सुधाकर धरफरा के उठल आ सीधे घर के तरफ चल देलक।
अब सुधाकर रोज सँझिया के श्मशानघाट पर आबे लागल। धीरे-धीरे दुन्नों में अपनापन बढ़े लागल।
सुधाकर के थीसिस पूरा हो गेल रहे। जमा कs देलक। थीसिस के सिलसिला में कुछ दिन के लेल श्मशानघाट पर ओक्कर आवाजाही बंद हो गेल।
डेढ़ महिन्ना के बाद सुधाकर श्मशानघाट पर आएल - 'डॉ. सुधाकर चतुर्वेदी' । घाट पर कालीचरण के बेटा आग देबे के काम में लागल रहे। पूछे पर पता चलल कि दस दिन पहिले कालीचरण जी के हार्ट-अटैक भेलएन आ ऊ चल देलन। एतना बताबे में कालीचरण के बेटा, मतलब कि नएका डोमराज तीन बेर हँसलक। सुधाकर से नs रहल गेल - "बेटा, तोहर बाबूजी के असमय मृत्यु हो गेलsऊ, आ तूँ हँसsइछे?"
- "सुधाकर बाबू, बाबूजी के कहनाम रहई कि श्मशान में सब कानेवाला लोग मिलइअ, कम से कम एगो हँसेवाला होए के चाही, ताकि श्मशान के दुनिया हँसीविहीन नs हो जाए।"
सुधाकर दुन्नों हाथे अप्पन माथा पकड़ के बइठ गेल। ओकरा समझ में आ गेलई कि ऊ भले ही डॉक्टर बन गेल, लेकिन ओक्कर थीसिस अभियो अधूरा हय।
(समाप्त)
© जय राम सिंह (24.07.2026)