Āppan Māṭī

Āppan Māṭī " जागऽ हो बज्जिका के सूतल निफिक्किर!" "

जय बज्जिका। जय बिहार। जय भारत।
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©भागवत अनिमेष झा।

जय बज्जिका!!जय बज्जिकांचल
'संघे शक्ति कलौयुगे'

ुरूज ! ीस...!
�� ( बज्जिका विमर्श ) ��
हमरा सब के हीनता के भाव से उबरे के पsरत । बज्जिका लिखे आ बोलेबाला के लोग हीन दृष्टि से देखइअ। दोसरा तs दोसरा , अप्पन बज्जिका बोलेबाला लोग भी मजाक उरबइअ।
अप्पन घर में बज्जिका के अइसन अपमान ! एगो प्रबुद्ध रचनाकार के मुँह से सुनली : " बज्जिका में किताब छपवा के ठेंगा मिलत ? सुनू ! गोइठा में घीऊ न स

ोखाऊ। सीधे-सीधे राष्ट्रभाषा में लिखू। अपने बन्हिया लिखइले । अच्छा स्कोप रहत हिंदी में। ...सुनू ! अगर जादे लोकभाषा में लिखे के कीड़ा दिमाग में हए , तs मैथिली में लिखू। तनियक मेहनत करब आs परिणाम बन्हिया आएत। "

हम हिंदी , अंग्रेजी , फ्रेंच ,मैथिली , भोजपुरी चाहे बुंदेलखंडी में हाथ-पैर मारू तs बहुत बन्हिया , बाकी अप्पन मातृभाषा बज्जिका में लिखू तs बीस गो बखेरा ! ई कूपमंडूक सोच से हमरा सब के बाहर निकले के पsरत। दोसर बात कि कुछ भाईलोग सन्देह प्रकट कयलन कि अपने तs झाजी ही , तs बज्जिका के लेखक कइसे हो गेली ? ई बज्जिका-प्रेम अचानक कहाँ से उमर पsरल ? हमरा उनका अप्पन खनदान के इतिहास - भूगोल फरिया कs बताबे के परइअ। बताबे के परइअ कि बज्जिकांचल में आई से १५० साल पहिले हम्मर पूर्वज अयलन । .. ई सवाल कोई ग्रियर्सन से न कयलक कि बिहार के हर लोकभाषा आ लोकजीवन के तू काहे अध्ययन कयल ? संकुचित सोच बज्जिका के संकुचित दायरा में सीमित कर के रक्खत। बज्जिका के बकरी के बच्चा के तरह दउरी से मून कs रक्खे के जरूरत न हए। एकरा झाँपू मत ,बाहर निकालू। हम भोजपुरी में भी गीत लिखली , कोई सवाल न कयलक। बज्जिका में लिखब तs सवाल काहे करब ? हम्मर जे क्वालिटी हए , ऊ कोनो भाषा में सामने आएत । कुछ अइसने संकीर्णता के कारण मैथिली कुछ जिला तक सिमट कs रह गेल हs। ई हम्मर टिप्पणी न हए , मैथिली के पैघ चिंतक के मंच से सार्वजनिक चेतावनी के वचन हए।

एगो आउर निवेदन कि नयका पीढ़ी के बज्जिका बोल-बचन आ लेखन से जोरू। एकरा लेल अपडेटेड लेखन के जरूरत हए। नयका पाठक के रुचि के हिसाब से आई के चुनौती से भिड़न्त करे के पsरत।
" कहियो के बात न करू , आजकल के बात करू
कहाँ रुक गेल इन्किलाब , तहकीकात करू। "

जइसे रामजी के लेल सेतुबंध रामेश्वरम बनल रs , तs रामजी गिलहरी के भी प्रशंसा कयलन रs। बज्जिका के बिकास के लेल छोटगर प्रयास के भी सराहना करे के चाही। उत्साह न बढ़बई तs अभियान फ्लॉप कर जाएत। जइसे तुलसी के छोट आ बर पत्ता समान रूप से भगवान शालिग्राम के स्वीकार होइछई ओइसहीं सब लेखन के स्वीकार करू। सबसे अंतिम फैसला तs जनता-जनार्दन कsरत। ओकरा लेल जनता के पास जाए के जरूरत हए। जन-समस्या आ जनांदोलन से जुरे के पsरत। नाखून कटवा कs शहीद बने से काम न चsलत ।

बज्जिका के काम में बहुत्ते विद्वान आ प्रतिभाशाली लोग लगल हतन। हमरा बज्जिका के नया सूर्योदय दिखाई पsर रहल हs। बज्जिका अप्पन समस्त बेरी तोरत। एक दिन पीपर के नयका ललछौंह पत्ता अइसन मोन के हरसित कsरत।बज्जिका एक दिन सृजन के सागर में अप्पन देसी रङ घोरत। हर बज्जिका भाषी गर्व के साथ बज्जिका बोलत। बज्जिका के जननाद से राज-सिंहासन भी डोलत।
" सुन ले रे अन्हरिया ! भेलऊ फरीछ
उगतन सुरूज , जय जगदीस !

19/04/2026

जनगणना आ बज्जिका
(दू गो मुक्तक)

लोग बज्जिका के नासमझी में कह देतन हिन्दी हय।
ज्ञान भूमि ई बज्जिकांचल, कण-कण में आनन्दी हय।
मोहग्रस्त भाई-बहिनी के बतलाबे - समझाबे के,
बागमती हय बज्जि गङ्गा, नारायणी कालिन्दी हय।।

हमरा सब के गाँओ में हर घर अङना में बज्जिका।
अर्चन-वन्दन हर सपना अभ्यर्थना में बज्जिका।
गर्व करे के चाही सब के अप्पन मातृभाषा पर,
आऊ एमरी लिखवाबे के जनगणना में बज्जिका।।
-- जय राम सिंह
🙏🙏🙏🌹

18/04/2026

ग़ज़ल

तोरा जइसन कोई कहाँ खोजू?
कइसे खोजू? कोई कहाँ खोजू?

देखे-परखे के एगो सीमा हय
ओसे आगे कोई कहाँ खोजू?

घर के मलबा से घर बने कइसे
घर हो अज्जर कोई कहाँ खोजू?

हमरा ऊपर हय पाँव दुनिया के
कइसे उठ के कोई कहाँ खोजू?

मिलके बिछुड़ेवला हज़ारों हय
जे न बिछुड़े कोई कहाँ खोजू?

गलती से आदमी से हो गलती
माफ कर दे कोई कहाँ खोजू?
© जय राम सिंह (18.04.2026)

15/03/2026

जनगणना में बज्जिका
(लेख - जय राम सिंह)

अब जबकि तय हो गेल हय कि बज्जिका के गिनती कराबे के लेल कोड संख्या 76 के सहारा लेबे के हय। आ ओकरा बाद OTHERS में 'बज्जिका' या 'BAJJIKA' लिखाबे के हय, तs ई बात के प्रचार-प्रसार बहुत्ते ज़रूरी हय। कुछ काम आसानी से हो सकइअ :-

(1) जागरूक लोग अप्पन-अप्पन गाँव/टोला/शहर के प्राइमरी/मिडिल/हाईस्कूल में जा के बज्जिकांचल के रहबइआ शिक्षक लोग से सकरवा लथ कि ई जिम्मेदारी उठएतन । यदि शिक्षक लोग सकार लेतन तs ई काम बहुत आगे बढ़ जाएत।

अप्रैल महिन्ना में अप्पन दस दिन के प्रवास के दौरान अप्पन गाँव आ आसपास के दस गो स्कूल/कॉलेज में जाके शिक्षक लोग आ छात्र लोग से मिल के ई बात पहुँचाबे के हम्मर निश्चय हय।

(2) स्थानीय गायक लोग आ अन्य कलापार्टी के लोग के कहल जाए कि अप्पन-अप्पन कार्यक्रम में बज्जिका जागरण गीत के प्रमुखता दथ। बज्जिका जागरण गीत के रिकॉर्ड कs के यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स आदि पर धड़ाधड़ पोस्ट कएल जाए। जेतना जादे लोग देखत ओतना जादे जागृति आएत।

(3) बज्जिकांचल में अवस्थित प्रिंटिंग प्रेस वाला लोग सs में से यदि कुच्छो ई बात के समझ जाएत तs स्थानीय बस/ट्रक/टेम्पो आदि पर साटे के लेल पम्फलेट छाप के दे सकइअ। यदि ई काम हो गेल तs जनजागृति खूब हो जाएत।

(4) बज्जिका के नामी-गिरामी कवि लोग जइसे अखौरी साहेब, ज्वाला बाबू, शारदा बाबू, विद्या जी, रणजीत बाबू, मणिभूषण बाबू, हेमा जी आदि लोग के लिखल नारा जगह-जगह प्रदर्शित कएल जाए।
कुछ नारा द्रष्टव्य हय :-

(क) श्री अखौरी चन्द्रशेखर
अबकी चुकब तs दस साल भुकबs!
भइआ हो जगइजा, बज्जिका लिखइजा !!

(ख) - श्री विगन रौनियार
बज्जिका माय के अँचरा
शीतल शांत मनोरम हए
दुनिया में सबसे न्यारा
एक्कर रूप अनूपम हए

(ग) डॉ. विद्या चौधरी
बज्जिका माय के सिखाएल भाषा हय।

(घ) श्री ईश्वर करुण
बोलs बज्जिका, खोलs बज्जिका
जे जे बोले ओक्कर जिनगी तर जाए
जे न बोले ओक्कर भाषा मर जाए।

(ङ) हरिनारायण सिंह हरि
बज्जिभूमि के मीठ बज्जिका भाषा हय
माई के ई आशा हय परिभाषा हय

(च) श्री कौशल किशोर शर्मा
सेवा में समर्पित सब दिन
जेकरा ला पर'किरती हय
सबसे सुन्नर सबसे निम्मन बज्जिकांचल के धरती हय

(छ) श्री रत्नानंद झा 'छोटन'
बज्जिका अप्पन माटी के सुगंध हए।
एकरा जोगाऊ, सजाऊ आ जन-जन तक पहुंचाऊ।।

(ज) श्री मणिभूषण प्रसाद सिंह अकेला
अप्पन डफली अप्पन राग के
बेसुर भाओ भुलाएल जाओ
बेमार परल बज्जिका मइआ के
रोग-बलाए भगाएल जाओ
अप्पन सेवा भाओ से हुनकर
बिगरल दशा सुधारल जाओ ।

एही तरह से आउरो बहुत तरीका हो सकइअ जेसे एमरी के जनगणना में बज्जिका के संदर्भ में वांछित परिणाम आ सकइअ।

(5) बज्जिकांचल के सिनेमाघर, मल्टीप्लेक्स आदि के कहल जाए कि फिल्म के इंटरवल के दौरान बज्जिका-जागरण से संबंधित स्लाइड /वीडियो /गीत आदि चलाएल जाए। नौजवान लोग के ई काम से जोड़े के ई कारगर तरीका होएत। वैशाली के तs डीएम साहिबा श्रीमती वर्षा सिंह स्वयं बज्जिकाप्रेमी हतन। ई सुयोग के लाभ उठाएल जा सकइअ। देखादेखी बज्जिकांचल के अन्य जिलाधिकारी लोग के भी आँख खुल जाएत।

जय बज्जिका 🙏🙏🙏🌹

सब बज्जिकाभाषी लोग से आग्रह हय कि ई पत्र में देल गेल संदेश के पढ़ के आगामी जनगणना में अप्पन मातृभाषा बज्जिका के प्रविष्ट...
11/03/2026

सब बज्जिकाभाषी लोग से आग्रह हय कि ई पत्र में देल गेल संदेश के पढ़ के आगामी जनगणना में अप्पन मातृभाषा बज्जिका के प्रविष्टि कराएल जाए। जय बज्जिका 🙏🙏🙏🌹

10/02/2026

नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल 2025 में जय राम सिंह के संबोधन सुनल जाए। ई वीडियो क्लिप आयोजन समिति के इंस्टाग्राम पेज से साभार लेल गेल हय। साथ में मंचासीन हतन प्रसिद्ध मगही साहित्यकार श्री उमेश्वर प्रसाद उमेश (बीच में) आउर डॉ. एम जे वारसी, डीन, भाषा विज्ञान संकाय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय। जय बज्जिका 🙏🙏🙏🌹

साहित्यिक महाकुंभ के यात्रा(यात्रा-वृत्तांत - जय राम सिंह)अविभाजित बिहार के भौगोलिक मानचित्र अद्भुत रहे । प्रकृतिप्रदत्त...
13/01/2026

साहित्यिक महाकुंभ के यात्रा
(यात्रा-वृत्तांत - जय राम सिंह)

अविभाजित बिहार के भौगोलिक मानचित्र अद्भुत रहे । प्रकृतिप्रदत्त कोई रचना या संरचना अइसन नs रहे जे बिहार में नs होए । पूरा उत्तरी बिहार मैदानी इलाका, गङ्गा माई आ हुनकर बहिनपा नदी सs के कृपा से लहलहाइत रहे । दक्खिनी बिहार में छोटानागपुर के पठार रहे । घनघोर से घनघोर जङ्गल, जलप्रपात, घाटी, वन्यजीव, तरह-तरह के अनमोल खनिज के अनगिनत खदान सs के बीच से सोन, दामोदर, स्वर्णरेखा जइसन नदी के हरहराइत-बहइत देखनाई अपने-आप में अलौकिक अनुभव होइत रहे । उत्तरी बिहार में जहाँ मानव-सभ्यता विकसित होइत रहे, हुअईँ दक्खिनी बिहार में प्राकृतिक सभ्यता परवान चढ़इत रहे ।

उत्तरी आ दक्खिनी बिहार के मिलाबे के काम मागधी क्षेत्र करइत रहे । अइसे समझल जाए कि मगध में मानव-सभ्यता आ प्राकृतिक सभ्यता के सङ्गम होइत रहे । सङ्गम केकरो होए, नदी-नदी के होए, पहाड़-पठार के होए, मानव-मानव के होए अथवा मानव-प्रकृति के होए, हमेशा कल्याणकारी आ सिरजनकारी होइअ । एही कारण हय कि ई क्षेत्र के हवा लगते सिद्धार्थ नाम के कोई आदमी बुद्धत्व प्राप्त कs के 'गौतम बुद्ध' बन जाइछन आ वर्द्धमान नाम के आदमी बुद्धत्व प्राप्त कs के 'महावीर' बन जाइछन ।

वृंदावन में यमुना नदी के किछार पर एगो जामुन के विशाल पेड़ रहे । ऊ पेड़ भगवान श्रीकृष्ण के बचपन में हुनकर खूब सेवा कएलक । भगवान ऊ पेड़ के छँहिरा में खूब खेलथ आ मन करे तs पक्कल-पक्कल मीठ-मीठ जामुन खाथ । जामुन के पेड़ द्वारा भगवान के अद्भुत सेवा से ब्रह्माजी प्रसन्न हो गेलन । पेड़ के सामने प्रकट होके कहलन कि तूँ भगवान के जेतना सेवा कएलs ओसे हम बहुत खुश हती, वर माङs । जामुन के पेड़ कथी वर माङत ? हाथ जोड़ लेलक आ ब्रह्मोजी के खूब पक्कल-पक्कल मिठगर जामुन खियएलक । ब्रह्माजी आउर प्रसन्न हो गेलन । जाइत-जाइत अपना ओरी से ऊ पेड़ के एगो वरदान दे देलन । वरदान रहे कि जे कोई ऊ पेड़ के छँहिरा में आएत, ऊ कवि हो जाएत, जब तक छँहिरा में रहत तब तक ओक्कर कवित्व शक्ति जाग्रत रहत ।

एक दिन एगो नाविक अप्पन नाव खेबइत-खेबइत ऊ जामुन के पेड़ के छँहिरा में पहुँच गेल । वरदान के प्रभाव के कारण अचानक ऊ नाविक में कवित्व शक्ति जाग्रत हो गेल । ओकरा मुँह से संस्कृत में कविता निकले लागलः-

जम्बूफलानि पक्वानि पतंति ते यमुनाजले
तानि मत्स्यानि न खादंति ......................

एतना कहइते-कहइते नाविक लग्गी मार देलक आ नाव सहित जामुन के पेड़ के छँहिरा से बाहर आ गेल । छँहिरा से बाहर अबइते ओक्कर कवित्व शक्ति बिला गेल । अब ऊ करौटिन उपाय कs के रह गेल लेकिन ‘खादंति’ के आगे कुच्छो नs कह पएलक आ ओक्कर कविता अधूरे रह गेल । खींझ के ऊ कहे लागल कि “तानि मत्स्यानि न खादंति.. आगे डुबुर डुबुर डुबुर...” जइसे पानी में लग्गी मारे से बुलबुल्ला फूट के बोलइअ ओइसे ।

कहे के मतलब हय कि मगध ज्ञान के भूमि हय । एहे मगध में अवस्थित हय एगो ऐतिहासिक नगरी जेक्कर नाम हय राजगीर । एक्कर पुरनका नाम राजगृह हय काहे कि कभी ई मगध साम्राज्य के राजधानी कहल जाइत रहे । राजगीर सनातन धर्म, बौद्ध धर्म आ जैन धर्म, तीनों के लेल तीर्थ हय । पटना से लगभग 125 किमी दक्खिन-पूर्व में अनेक पहाड़ी आउर सघन जङ्गल के बीच बसल राजगीर नs केवल एगो प्रसिद्ध धार्मिक तीर्थस्थल हय, बल्कि एक सुन्दर हेल्थ रेसॉर्ट आ क्रीड़ा-नगरी के रूप में भी लोकप्रिय हय । चारों तरफ सुरम्य पहाड़ी से घिरल राजगीर आजकल बिहार के सबसे लोकप्रिय पर्यटन-स्थल मानल जाइअ । सरकारो हियाँ के विकास पर पूरा ध्यान दे रहल हय । पर्यटक लोग के आकर्षण आ सुविधा के लेल बहुत काम कएल गेल हय । राजगीर जनाई अब पहिले से जादे आसान हय । अब ट्रेन से या सड़क से, कौनो तरह से आसानी से राजगीर जाएल जा सकइअ । ठहरे के लेल महँङा-सस्ता, हर तरह के होटल आ गेस्ट-हाउस उपलब्ध हय ।

इहे राजगीर में दिनांक 21.12.2025 से ले के दिनांक 25.12.2025 तक नालंदा साहित्य महोत्सव मनाएल गेल । ई महोत्सव के निदेशक रहथ आईएएस अधिकारी श्री गङ्गा कुमार जी । गङ्गा कुमार जी स्वयं भारतीय साहित्य आ संस्कृति के प्रबल ध्वजवाहक मानल जाइछन । हुनकर अदम्य मेहनत से देश भर के 92 नामी-गिरामी विभूति लोग के पदार्पण पाँच दिवसीय नालंदा साहित्य महोत्सव में भेल । प्रमुख वक्ता के रूप में पद्म-विभूषण सोनल मानसिंह, पद्मश्री शोभना नारायण, डॉ. शशि थरूर, डॉ. सिद्धार्थ सिंह, डॉ. अमिताभ कान्त आदि रहथ । नालंदा साहित्य महोत्सव में बिहार के क्षेत्रीय भाषा जइसे बज्जिका, मैथिली, अंगिका, मगही आ भोजपुरी पर आधारित सत्र के भी व्यवस्था कएल गेल रहे ।

एक दिन हमरा बज्जिका के जुझारू सेवक शोधार्थी श्री अभय कुमार के फोन आएल कि नालंदा साहित्य महोत्सव में वक्ता के रूप में भागीदारी के लेल हमरो नामांकित कएल गेल हय । अभय जी एहो बतएलन कि बज्जिका से दू गो वक्ता रहतन । आदरणीया डॉ. विद्या चौधरी जी के नाम सुन के मन गद्गद हो गेल । महोत्सव के दिन जइसे-जइसे नजदीक आएल, तब पता चलल कि गङ्गा कुमार जी केतना बारीकी से ई महोत्सव के ताना-बाना बिनले रहथ । भारतीय मनीषा में उपलब्ध एक से बढ़के एक विद्वान अतिथि वक्ता लोग के सकार लेनाई बड़का काम रहे । ऊ लोग के आबे-जाए के व्यवस्था, राजगीर में ठहरे के व्यवस्था, खान-पान के व्यवस्था से ले के कार्यक्रम स्थल के बारीक से बारीक चीज पर नज़र रखइत अद्भुत व्यवस्था कएल गेल रहे । हर व्यवस्था के लेल योग्य लोग के टीम बनाएल गेल रहे जेक्कर सीधे निगरानी स्वयं गङ्गा कुमार जी करइत रहथ । जे वक्ता बिहार के बाहर से आबे के रहथ, हुनकर स्वागत पटना एयरपोर्टे पर प्रोटोकॉल के टीम करे लेल तइयार रहे । फेर राजगीर तक ले जाए के लेल हर वक्ता के लेल उचित गाड़ी के व्यवस्था लॉजिस्टिक टीम के हाथ में रहे । होटल में अतिथि लोग के देखभाल के लेल हॉस्पिटैलिटी के टीम तइयार रहे । कार्यक्रम स्थल के लेल राजगीर में स्थित राजगीर कन्वेंशन सेंटर के चयन कएल गेल रहे । हमरा समझ से एतना भव्य, सुनियोजित, सर्वसुविधासंपन्न कन्वेंशन सेंटर पूरा बिहार में एकलौता इहे हय । कन्वेंशन सेंटर पर स्वागत, यातायात, भोजन-जलपान, प्रदर्शनी, सुरक्षा आदि से लेके इवेंट-मैनेजमेंट तक हर व्यवस्था बारीकी से कएल गेल रहे ।

हमरा मुंबई से जाए के रहे । समय से हवाई जहाज के टिकट भेज देल गेल रहे । अप्पन पेशेगत आ पारिवारिक व्यस्तता के कारण होटल में रुके के समय हमरा पास नs रहे, अन्यता ओकरो व्यवस्था कs देल गेल रहे । आदरणीया विद्या चौधरी जी आ हम्मर सत्र एक्के दिन अर्थात् 22.12.2025 के दिन रहे । विद्या जी के सत्र लंच से पहिले आ हम्मर सत्र लंच के बाद रहे । पटना से सबेरे आठ बजे आयोजन-समिति द्वारा देल गेल गाड़ी से राजगीर के यात्रा प्रारंभ भेल ।

मैट्रिक परीक्षा पास कएला के बाद एक बेर हम राजगीर गेल रही । मन में ऊ समय के छवि ताजा होए लागल । आशंका रहे कि राजगीर पहुँचे में कम से कम चार घंटा तs लागबे करत । एही खातिर जब ड्राइवर कहलक कि डेढ़ घंटा लागत, तs हमरा विश्वास नs भेल । लेकिन ड़्राइवर के पास आज के अनुभव रहे आ हमरा पास पैंतीस साल पहिले के । पटना के गोला रोड से निकल के जब गाड़ी मरीन ड़्राइव पर सरपट भागे लागल, तs हमरा अप्पन राज्य बिहार के ढ़ाँचागत विकास पर गर्व होए लागल । लगभग बीस मिनट में मरीन ड्राइव पार कs गेली । आगे कच्ची दरगाह-बिदुपुर पुल के एप्रोच रोड से होइत बख्तियारपुर के हाईवे पर गाड़ी दउरे लागल । अगला आधा घंटा में बख्तियारपुर आ गेल । दिसंबर के महिन्ना आ रोड के किनारे गरम—गरम चाय बनइत देख के चाय पिए के लेल जिउ ललचाए लागल । चायोपरांत यात्रा फेर से शुरु भेल । राँची जाएवाला हाईवे के तs शक्ल-सूरत सब बदल गेल रहे । लाजवाब फोर लेन रोड देख के बुझाए लागल कि बिहार के लोग वर्तमान राज्य-प्रशासन के काहे एतना पसंद करइछन । ड्राइवर ठीके कहइत रहे । डेढ़-दू घंटा में गाड़ी राजगीर कन्वेंशन सेंटर के अहाता में घुस गेल रहे । तत्काल अतिथि-वक्ता वाला पास मिल गेल । ओही समय डॉ. शशि थरूर जी के सत्र चलइत रहे । उत्सुकतावश हुनकर सत्र सुने के लेल चल गेली । हुनका साक्षात सुनला के बाद महसूस भेल कि काहे थरूर साहेब एतना प्रसिद्ध हतन । थरूर साहेब के सत्र के बाद आदरणीया विद्या जी के सत्र शुरु भेल । दर्शक-दीर्घा में बज्जिका के अदम्य योद्धा आदरणीय रामनरेश शर्मा सर के साथ हमहूँ रही । सत्र खूब बन्हिया चलल । विद्या जी बज्जिका के समर्थन में एक से बढ़के एक तथ्यात्मक तर्क देके पूरा हॉल के प्रशंसा बटोर लेलन । सत्र के समाप्ति के बाद बज्जिका पत्रिका पहरुआ के प्रति भी श्रोतावृंद में बाँटल गेल । बज्जिका पत्रिका देख के हुआँ उपस्थित लोग खूब गद्गद भेलन । पता चलल कि आयोजक लोग ऊ क्षेत्र के स्कूल-कॉलेज के छात्र लोग के ई साहित्य महोत्सव में बोलएले रहे । ई बहुत्ते सुखद बात लागल । काहे कि इंटरनेट आ एआई के ज़माना में अगिला पीढ़ी के साहित्य से जोड़नाई बहुत्ते ज़रूरी हय । बज्जिकांचल में रहेवाला कए गो छात्र-छात्रा लोग के देख के मन जुड़ा गेल । ओमें से कए गो छात्र तs अप्पन बज्जिका में लिखल कुछ लेख-कविता वगैरह भी देखएलक ।

भोजन के अवकाश के बाद सत्र के सिलसिला फेर से शुरु भेल । पहिले सत्र हम्मर रहे । हम्मर सत्र में सह-वक्ता के भूमिका में रहथ मगही के जानल-मानल विद्वान श्री उमेश्वर प्रसाद उमेश जी । प्रश्नकर्ता के भूमिका में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भाषा-विज्ञान संकाय के डीन डॉ. एम जे वारसी साहेब रहथ । सत्र के विषय रहे The Lost Love : Challenges and opportunities to preserve Bajjika, Magahi & Angika in Modern Bihar. Besides, strategies to revive these lesser-known regional languages. प्रारंभिक परिचय के बाद वारसी साहेब सवाल पूछे के सिलसिला शुरु कएलन । हम निश्चय कs लेले रही कि बज्जिके में बोलम । मगही भूमि पर बज्जिका में बात करनाई रोमांचित करेवाला अनुभव रहे । बज्जिका के असर के अंदाजा ई बात से लगाएल जा सकइअ कि पैंतालीस मिनट के पूरा सत्र ताली से गड़गड़ाइत रहल ।

बाद के सत्र में भारतीय सिनेमा के सबसे मजगूत स्तंभ में से एक श्री आदूर गोपालकृष्णन के सत्र रहे । हुनकर दर्शन मिलनाई आ हुनका सुननाई अपने-आप में एगो अनुभव रहे । ई सत्र के बाद भोजपुरी के नामचीन गीतकार श्री मनोज भावुक जी, प्रसिद्ध सिने अभिनेता संजय मिश्रा जी आ भोजपुरी के प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक श्री विनोद शर्मा जी के सत्र रहे । ऑडिटोरियम में जब पद्म-विभूषण आ पद्मश्री से सम्मानित लोग बइठल रहथ, तब की श्रोता आ की वक्ता, सब के ऊर्जस्विता अल्लग स्तर के हो गेल । हम्मर वापसी के फ्लाइट ओहे रात में नौ बजे के रहे । कुहरा के डर अप्पन जगह बनल रहे । समय से निकलनाई ज़रूरी रहे, अन्यथा फ्लाइट छूट जाए के जोखिम रहे । मन करे कि आउरो रुकल जाए, लेकिन मन मारके चले के पड़ल । हुआँ रुक नs पइली जेक्कर बहुत्ते निराशा हय ।

नालंदा साहित्य महोत्सव के समाचार देश के राष्ट्रीय समाचार चैनल आ समाचार-पत्र सs में प्रमुखता से कवर कएल गेल । बिहार के सरजमीं पर अइसन ऐतिहासिक सारस्वत आयोजन के लेल आयोजक लोग के केतना मेहनत करे के पड़ल होइत ? संभव हय कि ई साहित्य महोत्सव से भारत में साहित्यिक आ सांस्कृतिक जागरण के महाशंख साहित्य के ई महाकुंभ में फुँका गेल होए ।
© जय राम सिंह (02.01.2026)

25/12/2025

नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल 2025 में बज्जिका के प्रख्यात साहित्यकार आ सुविख्यात पुरातत्वविद आदरणीया डॉ. विद्या चौधरी जी के उद्बोधन सुनल जाए। मागधी हृदयस्थल के मंच पर जब बज्जिका गूँजइअ तब खाली बज्जिके गूँजइअ। जय बज्जिका 🙏🙏🙏🌹

ई पोस्ट बज्जिका के तथाकथित तद्भवीकरण के चैम्पियन लोग के लेल हय जे अनावश्यक रूप से बज्जिका के तोड़े-मरोड़े के पाप कर रहल ...
24/12/2025

ई पोस्ट बज्जिका के तथाकथित तद्भवीकरण के चैम्पियन लोग के लेल हय जे अनावश्यक रूप से बज्जिका के तोड़े-मरोड़े के पाप कर रहल हतन। फोटो देखल जाए। फोटो में भोजपुरी के प्रसिद्ध पत्रिका 'भोजपुरी जंक्शन' के संपादकीय हय। संपादक हतन आई के समय में भोजपुरी के सुपर-डुपर हिट गीतकार आ लेखक श्री मनोज भावुक जी। भोजपुरियो इलाका के गाँव-टोला में लोग बोलचाल में चार गो अक्षर 'ण', 'ड़', 'श' आ 'ष' के उच्चारण लगभग नहिंए करइछन। लेकिन भोजपुरी के लिखित साहित्य के लिखेवाला जागरूक लोग भोजपुरी के टाँग नs तोड़sइछन। आगम-लोप सिद्धांत आ महा-महेश्वर सिद्धांत भोजपुरियो पर ओतने लागू होइअ जेतना बज्जिका पर। ई दुन्नों सिद्धांत हमहूँ पढ़ले हती, कोई भी पढ़ सकइअ। ई दुन्नों के अर्थगर्भ यदि पूर्वाग्रहयुक्त होके निकालल जाएत तs अर्थ के बदले अनर्थे निकलत।

काश! बज्जिका के लिखनिहारो लोग ई बात समझ जाथ!
जय बज्जिका 🙏🙏🙏🌹

23/12/2025

दू गो छोट-छोट वीडियो क्लिप देखल जाए ।

स्थान - राजगीर कन्वेंशन सेंटर, राजगीर, जिला - नालंदा (बिहार)। नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल 2025 के सुसज्जित मंच आउर भरल-पूरल ऑडिटोरियम।

ईश्वर के कृपा से ई सारस्वत आयोजन में अप्पन मातृभाषा 'बज्जिका' के प्रतिनिधित्व करे के सौभाग्य मिलल । हमरा साथे मंचासीन महानुभाववृंद में प्रख्यात मगही विद्वान श्री उमेश्वर प्रसाद 'उमेश' आउर प्रश्नकर्ता के रूप में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान संकाय के डीन डॉ. एमएम वारसी जी हतन । श्रोतावृंद में नामचीन हस्ती लोग के साथे-साथ विद्यालय-महाविद्यालय के नौजवान छात्र लोग हतन।

हमरा बोले के लेल विषय मिलल रहे - THE LOST LOVE : Challenges and Opportunities to preserve Bajjika, Magahi & Angika in Modern Bihar. Besides, strategies to revive these lesser-known regional languages.

Milton से उधार लेल गेल The Lost Love के अवधारणा के हम प्रारंभे में खारिज कs देली ई कह के कि If it is love, it is never lost. Love is immortal. It remains forever irrespective of our individual incarnations.

अगला मुद्दा रहे - Challenges and Opportunities. ई मुद्दा पर अप्पन मातृभाषा 'बज्जिका' में हम्मर उद्बोधन के कुछ अंश देखल जाए जे बहुत्ते आसान बज्जिका में हय जेकरा बज्जिकेतरो लोग आसानी से समझ जएतन ।

ई ईश्वर के कृपा नs तs आउर कथी हय जब वक्ता के हर बात पर एतना बड़का आ भरल-पूरल ऑडिटोरियम ताली के गड़गड़ाहट से बार-बार आकाश तक के गुंजरित करइत रहे। साँच कहू तs मातृभाषा भी माइए होइअ आ जब माई के ममता के हाथ वक्ता के शीश पर होए तs उत्साह कए गुणा बढ़ जाइअ । सुनल जाए, आनंद लेल जाए आ अप्पन - अप्पन टिप्पणी से अवगत कराएल जाए ।

24/10/2025

मास्टर : असालतन मास्टर
(कहानी – जय राम सिंह)

हाईस्कूल में एगो मास्टर साहेब रहथ । पूरा जिला में हुनकर ज्ञान आ शिक्षणकला के डंका बजइत रहे । समय से स्कूल अनाई, खूब मन लगा के पढ़ानाई, खाली समय में कोई खाली क्लास देख के अपने-आप घुस जनाई... आदि आदि हुनकर व्यक्तित्व के विशेषता रहे । कभियो ट्यूशन नs पढ़एलन, लेकिन स्कूल के समय के बादो हुनका डेरा पर चेला-चटिया के जमघट लागल रहइत रहे । खाली चेले-चटिया नs, कोई भी हुनका से कुच्छो पूछ सकइत रहे । मास्टर साहेब के कहनाम रहे कि केकरो जिज्ञासा के समाधान करनाई बौद्धिक पूजा के एगो रूप होइअ । भक् खादी के इस्तरी कएल कुर्ता आ धोती, इहे हुनकर पोशाक रहे । जूनियर मास्टर सs, कौनो फटफटिया से आबे, कौनो रिक्शा-टमटम से आबे, प्रिंसिपल साहेब तs कार रखले रहथ । लेकिन ई मास्टर साहेब अपना जिनगी में साइकिल के कभी नs छोड़लन । ओइसे तs ऊ साइंस टीचर रहथ, लेकिन सुभाव से कवि-मिजाज आ तनि-मनि गाइयो-बजा लेइत रहथ । हँसी-मज़ाक में तs हुनकर कोई जोड़ नs रहे । मास्टर साहेब जिनगी में आदर्श, नैतिकता, ईमानदारी आदि के बड़का पक्षधर रहथ । ताउम्र ईमानदारी से पढ़लन आ पढ़एलन । हुनकर पढ़ाएल चेला-चटिया सs दिल से हुनकर आदर करे । मास्टर साहेब के कए गो चेला-चटिया ऊँच-ऊँच पद पर पहुँच गेल रहे । कोई डॉक्टर, इंजीनियर, सफल व्यवसायी बन गेल रहे तs कोई विदेश चल गेल रहे । आजुक ज़माना में हाईस्कूल शिक्षक के एतना आदर मिलनाई दुर्लभ बात हय ।

मास्टर साहेब उमिर के साठ बरिस पूरा कएलन आ सेवा से रिटायर हो गेलन । अप्पन बाल-बच्चा के शादी-बियाह रिटायर होए से पहिलsहीं कs के निश्चिंत हो गेल रहथ । बेटी-दामाद बैंगलोर में आ बेटा-पुतोह हैदराबाद में सेटल हो गेल रहsएन । मास्टर साहेब स्वाभिमानी रहथ । हुनकर मान्यता रहे कि जब तक शरीर चले, अप्पन बाल-बच्चा पर आश्रित नs होए के चाही । हिनकर ई बात से बेटा-बेटी, दुन्नों क्षुब्ध रहइत रहे । लेकिन कोई फिकिर नs, मास्टर साहेब अप्पन मौज में मस्त रहइत रहथ । दुन्नों बेकती शहर के एगो फ्लैट में अप्पन सेवानिवृत्त जिनगी कटsइत रहथ । एही बीच राज्य में कौनो चुनाव घोषित हो गेल । चुनाव के की हय, देश में चुनाव बरमहल होइत रहइअ, कभी लोकसभा के, कभी विधानसभा के, कभी पंचायत के तs कभी कुच्छो के । साँच कहल जाए तs देश में चुनाव अब बरमसिया हय, एतना बरमसिया जेतना नs कोई फल हय आ नs कोई फूल । मास्टर साहेब अप्पन वोटर कार्ड के शहर में ट्रांसफर नs करएले रहथ । जागरूक नागरिक के कर्तव्य के तकाजा रहे कि वोट देल जाए ।

एक दिन दुन्नों बेकती गाँव चल देलन । अप्पन अपार्टमेंट से निच्चा उतरला पर मास्टर साहेब कुछ सोच में पड़ गेलन – “बिहार में चोरी-पॉकिटमारी आदि तs चलते हय, कभियो खतम नs होएवाला हय । यदि कोई चोर हम्मर फ्लैट में चोरी के लेल घुस जाएत तs ओकरा कथी हाथ लगतई ? कुच्छो नs मिलला पर पित्त के मारे ऊ एन्ने-ओन्ने तोड़फोड़ कs देत ।“

अप्पन फ्लैट के तोड़फोड़ से बचाबे के लेल एगो तरकीब सूझलएन । अप्पन कनियाँ के निचहीं छोड़ के वापिस फ्लैट में गेलन । पाँच-पाँच सौ के दू गो करारी नोट निकाललन आ एगो कागज पर कुछ लाइन लिख देलन । नोट आ कागज के टेबुल पर रख के ऊपर से एगो पेपरवेट रख देलन । कागज में लिखल रहे – “प्रिय अनजान चोर भाई, हम अपने से परिचित नs हती । लेकिन हमरा एतना मालूम हय कि केतना मेहनत से आ जोखिम के साथ ताला तोड़ के अपने फ्लैट में आएल होएम । दुर्भाग्य से ई फ्लैट में दुइए गो लोग रहइअ – एगो हम आ दोसर हम्मर बुढ़िया कनियाँ । हम हाईस्कूल के मास्टरी से रिटायर हती आ अप्पन पेंशन पर जी रहल हती । हमरा बहुत्ते दुख हय कि अपने के हम्मर फ्लैट में मेहनत के हिसाब से कुच्छो नs मिलल । हम दुन्नों प्राणी के तरफ से ई दू गो नोट तुच्छ भेंट के तौर पर स्वीकार कएल जाए । हम्मर शुभकामना हय कि भविष्य में अप्पन काम में अपने के खूब सफलता मिले । अपने के जानकारी के लेल सूचना हय कि इहे अपार्टमेंट में एगारहवाँ मंजिल पर एगो स्मगलर रहइअ, दसवाँ पर एगो भ्रष्ट मंत्री के आ ओकरे बगल में एगो राजनीतिक दलाल के फ्लैट हय । नौमा पर आएम तs एगो घूसखोर जज के फ्लैट मिलत, ओकरे बगल में ओक्कर दलाल वकीलो के फ्लैट हय । अठमा मंजिल पर चार गो फ्लैट हय - चारों एक से एक धुरंधर धाँधलीबाज । कुल मिला के पाँचम मंजिल से जइसे-जइसे ऊपर बढ़म, अपने के झोरा ओतने जादे भरत । अभी चुनाव के मौसम हय । जेतना कालाधन कभी कोई के देखे में नs आ सकल हय, ओसे जादे ई लोग के फ्लैट में मिल जाएत । हमरा उम्मेद हय कि ई सूचना अपने के काम आएत । ई लोग एतना पहुँचल भ्रष्ट हय कि अपने के बिजनेस के सफलतो से ई लोग के कुच्छो बिगड़ेवाला नs हय । विश्वास रक्खू, अपने के बिजनेस के बारे में ई लोग पुलिसो से कुच्छो नs बता सकइअ । बहुत-बहुत शुभकामना ।“

करेंसी नोट आ कागज पर लिखल नोट टेबुल पर रख के मास्टर साहेब फ्लैट में ताला लगा देलन । निच्चा अएला पर कनियाँ पुछलथिन – "कथी लेल गेल रही ?" मास्टर साहेब कुच्छो-कुच्छो बता के महटिया देलथिन । दुन्नों बेकती गाँव चल गेलन ।

चुनाव भेल, वोट पड़ल । मास्टरो साहेब दुन्नों बेकती वोट देलन । कुछ दिन आउर खेत-पथारी देख-दाख के लगभग एक महिन्ना के बाद मास्टर साहेब शहर लउट गेलन ।

फ्लैट के अंदर ओहे टेबुल पर एगो बैग रक्खल रहे । मास्टर साहेब बैग खोललन । बैग पाँच-पाँच सौ के नोट के गड्डी से भरल रहे । सबसे उप्पर एगो कागज पर लिखल नोट रहे । कागज के नोट में लिखल रहे –

“आदरणीय गुरुजी, सादर प्रणाम । सूचना आ मार्गदर्शन के लेल अपने के बहुत-बहुत धन्यवाद । अपने के आशीर्वाद से हम्मर बिजनेस खूब फल-फूल रहल हय । देओता के लेल अर्पित अगsओं के रूप में दस लाख के ई तुच्छ भेंट के स्वीकार कएल जाए । हमरा आशा हय कि अपने के आशीर्वाद भविष्य में भी मिलइत रहत ।
अपने के लाभार्थी चेला,
चोर”

मास्टर साहेब कागज के पढ़लन आ ठठा के हँस देलन । कनियाँ तुरंते पूछ देलथिन – कथी लेल हँस रहल हती ?

- “हमरा बुझाइअ जे हम्मर मास्टरी के काम अभियो खूब चल रहल हय – वंस अ टीचर, ऑलवेज अ टीचर !”

कनियाँ भड़क गेलथिन – “ई अँग्रेजी में गिटिर-पिटिर नs करू, हमरा अँग्रेजी नs अबइअ ।“ मास्टर साहेब मुस्कुरा के कहलथिन – “एक्कर मतलब हय कि जे एक बेर मास्टर बन गेल ऊ ताउम्र मास्टर रहइअ ।“ कनियाँ तइयो नs मानलsथिन – “ई बात तs सबके मालूम हय, एमें हँसे के कौन बात हय ? सही-सही बताऊ, कथी लेल हँसली ?”

- “नs, नs, कौनो बात नs हय, अइसsहीं गाँव के इयाद पड़ गेल तs हँसी छूट गेल ।“

लेकिन कनियाँ के विश्वास नs भेलएन । पुछइत-पुछइत मास्टर साहेब के लग चल अलथिन । बैग देखते चिकर पड़लथिन – “ई कथी हय ? एतना नोट ?” मास्टरनियो जी सिद्धांत के पक्का रहथिन । अप्पन रौद्र रूप में आ गेलथिन – “ई नाजायज रुपइया के जल्दी से जल्दी हम्मर घर से हटाऊ । हमरा से ई बर्दाश्त नs होएत । हम्मर घर पवित्र हय, एक्कर पवित्रता से कोई समझौता नs हो सकइअ ।“

कनियाँ के समझा-बुझा के मास्टर साहेब चुप करsएलन । एक महिन्ना से बंद फ्लैट में झाड़ू—बुहारू देइत-देइत साँझ हो गेल रहे । हाथ-गोर धो के चाय पिए लगलन । मास्टर साहेब के मन में धमगुज्जर मच्चल रहे कि ई नाजायज नोट के कथी कएल जाए । हुनका मालूम रहे कि पुलिस में जमा करे जएतन तs पुलिस हिनके फँसा देत । मास्टर साहेब के पक्का विश्वास रहे कि नाजायज धन संस्कारहीन होइअ । नाजायज धन के परिणाम हमेशा भयानक होइअ । मास्टर साहेब खुद से सवाल पूछथ आ खुद्दे ओक्कर जवाबो देइत रहथ – “मंदिर में ? नs, मंदिर में नाजायज पइसा नs देबे के चाही, मंदिर के पवित्रता पर असर पड़ जाएत । धरमशाला में ? नs, ओहो तs मंदिरे जइसन हय । केकरा देल जाए, कइसे जान छोड़ाएल जाए ?” मास्टर साहेब के माथा रॉकेट के गति से चलइत रहे । एगो पेंसिल निकाललन आ नोट के गड्डी के गिन के ओपर सही करे लगलन ।

चाय पी के मास्टर साहेब चुपचाप बैग उठएलन आ बाहर निकल गेलन । लगभग दू सौ मीटर के दूरी पर पुलिस-थाना रहे । बेरा डूब गेल रहे, अन्हार बढ़ल जाइत रहे । थाना के नजदीक पहुँच के बगल के नाला में ऊ बैग के फेंक देलन । जोर से ‘छपाक’ के आवाज भेल । थाना से कए लोग आवाज के तरफ दउरलन । एतने देर में मास्टर साहेब अन्हार में अलोप हो गेलन आ घरे लउट गेलन ।

अगिला दिन अखबार में मोट-मोट हेडलाइन छप्पल रहे – “कोतवाली पुलिस के छापेमारी में चुनाव में प्रयोग होएवाला कालाधन बरामद, एक लाख कैश जब्त !” मास्टर साहेब अखबार पढ़ के पहिले माथा पीटलन आ बाद में हँसे लगलन । कनियाँ फेर पूछ देलथिन – “अब कथी ला ठठा के हँस रहल हती ?” मास्टर साहेब सब बात कनियाँ के बता देलथिन ।

- “ई तs सरासर अन्याय हय, चोरी से भी जादे भयानक चोरी हय । कोई उचित जगह खोज के एक्कर शिकायत करू ।“ सजग आ जिम्मेदार भारतीय नारी के रूप में कनियाँ के आवाज में तागत रहे ।

मास्टर साहेब फेर से एगो कागज लेके कुछ लिखे लगलगन । कागज के मोड़ के लिफाफा में रखलन आ उठके कुर्ता-धोती पेन्हे लगलन । अपार्टमेंट से उतरके रिक्शा धs लेलन । आधा घंटा के बाद एगो ऑफिस के सामने रिक्शा रुकल । ऑफिस के रिसेप्शन में जाके कुच्छो कहतन रs, ओसे पहिलsहीं हुनकर नजर एगो बोर्ड पर पड़ गेल । ऊ बोर्ड पर ऊ ऑफिस के सब अधिकारी लोग के नाम लिखल रहे । ऑफिस-हेड के नाम देख के कुछ अचरज भेलsएन । रिसेप्शनिस्ट से ऑफिस-हेड के बारे में पूछे पर मास्टर साहेब के बुझाएल जे शायद ऊ नाम से परिचित हतन । एगो चिट पर अप्पन नाम लिख के देलथिन । रिसेप्शनिस्ट साहेब के फोन लगा देलक । साहेब आगंतुक के नाम, पता, देह-धुआ आदि के बारे में पूछताछ करे लागल । दू—तीन मिनट में सामने के लिफ्ट से एगो सूट-बूटधारी अधिकारी निकलल । मास्टर साहेब के देखते दउर के आएल आ गोर लाग के प्रणाम कएलक । असुविधा के लेल माफी मँङइत ऊ साहेब मास्टर साहेब के अप्पन चैम्बर में ले गेल ।

अगिला दिन के अखबार के हेडलाइन रहे – “सीबीआई द्वारा थाना-प्रभारी समेत कोतवाली पुलिस-थाना के सब अधिकारी-कर्मचारी गिरफ्तार, थाना से नौ लाख रुपइया कैश बरामद ।“ बरामद कैश के एक-एक गड़डी पर मास्टर साहेब द्वारा कएल गेल दस्तखत सीबीआई अधिकारी के देल गेल नोट पर कएल गेल दस्तखत से हू-ब-हू मिलइत रहे ।

मास्टर साहेब अखबार के हेडलाइन पढ़लन आ फेर से ठठा के हँस देलन – “वंस अ टीचर, ऑलवेज अ टीचर ।“ कनियाँ फेर से भड़क गेलथिन – “कए बेर कहली जे हमरा अँग्रेजी समझ में नs अबइअ ।“ मास्टर साहेब मुस्कुरा के कहे लगलsथिन – “अपने के ई मास्टर हमेशा मास्टर रहत, कभी रिटायर नs हो सकइअ ।“ एमरी कनियाँ लजा के मुस्कुरा देलथिन ।
(समाप्त)
© जय राम सिंह (24.10.2025)

14/10/2025

रसवंती (कहानी)
कथाकार - श्री उदय नारायण सिंह

मोहन हमर लड़िकारी के दोस रहे । जेहन नाम ओहने गुन । केकरो मोहित करे के लेल ओकर लिलार के चमक काफी रहे । ओकरा में सूरज के तेज आ चन्द्रमा के शीतलता ओनाहिते शोभायमान होइत रहे जेना बरफ पर सूरज के रोशनी चमकइअ । मोहन के गांव बागमती के पेटी में पड़े । जेई कारन बिना बागमती नदी पार कएले गांव से बाहर निकलनाई संभवे नऽ रहे । शिवनगर बागमती घाट पर लखन घटवार रहे । शिवनगर घाट के जिम्मा लखने घटवार के ताल्लुक रहे । लखन के घटवाही में गांव-जवार के सभे लोग साल में दू बेरी जेठ आ अगहन में साली देबे ।साली से ओकरा अतेक अनाज आ जाए कि ओकर परिवार आराम से साल गुजार लेबे। परिवार के नाम पर तऽ तीने जना रहे । लखन के मेहरारु खूबसूरती आ ओकर बेटी रसवंती ।

मोहन के गांव में हाई इस्कुल नऽ रहे ।मोहन के मधौल हाई इस्कूल में पढ़े जाए के पड़े।शिवनगर घाट पर बिना नाव से पार उतरले मधौल हाई इस्कूल में जाए के दोसर कोनो रस्ते नऽ रहे ।लखन शिवनगर घाट पर घटवारी के काम बड़ा मुस्तैदी से करे ।जाड़ा होए चाहे गरमी ऊ चारे बजे भोर में नाव पर आ के बइठ जाए आ जाबे तक राहगीर के आबे-जाए के पैरा निशवद नऽ हो जाए ताबे ले ऊ नाव पर जरूर बइठे ।कहिओ- कहिओ लखन के मन खराब हो जाइक तऽ ओकर मेहरारु खूबसूरती चाहे बेटी रसवंती घटवारी के कमान थाम लेबे।

बरसात के समय रहे ।महीना साओन रहे ।झपसी लागल रहे ।टीपिर-टीपिर पानी पड़इत रहे ।मोहन छत्ता लगओले मधौल हाई इस्कूल जाइत रहे ।जब शिवनगर घाट पर आएल तऽ देखलक कि आई नऽ तऽ लखन हए आ नऽ ओकर मेहरारु खूबसूरती? नाव पर एगो नौजुवती बइठल हए ।पहिले तऽ मोहन के लागल कि इहो कोनो राहगीरे हए ।मोहन घाट पर खड़ा हो के नाव के इंतज़ार करे लागल ।मोहन के ई देख के ताज्जुब भेलई कि ऊ जुवती नाव लेके अही पार आ रहल हए ।रसवंती नाव के किनारा लगा के धीरे से बोलल-" आई बाबू! हमरे घटवारी करे ला कहलथिन हऽ।बाबू के तबियत खराब हई आ माय दवाई ला सैदपुर बजार गेल हई ।रसवंती के साड़ी बरसा के पानी से पूरा भीज गेल रहे आ साड़ी रसवंती के देह से ओनाहिते सट गेल रहे जेना आम के लस्सा हाथ में सट जाइअ । रसवंती के जुआनी ओनाहिते लागे जेना पूर्निमा के रात में चन्द्रमा के शोभा लगइअ।

अब मोहन के मन रसवंती से बात करेला लुसफुसाये लागल ।ऊ रसवंती से बात करे लेल बहाना ढूंढे लागल ।मोहन धीरे से पूछलक-'तोहर नाम कथी हओ?' रसवंती मथा नीचा कएले बोलल-'रसवंती ।'मोहन!वाह!खूब निम्मन नाम हओ ? वाकई तोरा बोली से रस झरइत हए ।लखन तऽ तोहर नाम बड़ा निम्मन रखलको हऽ?रसवंती मोहन के बात सुनके लजा गेल आ बोलल-' आहां अपनो नाम तऽ कहू?आहां के नाम कथी हए?मोहन बोलल-'हमर नाम मोहन हए ।रसवंती मोहन के नाम सुनते मथा झुकएले बोलल-'आहां के नाम मोहन हए कि मोहना ? हमरा तऽ आहां मोहना बुझाइत हती ?' रसवंती के बात सुन के मोहन के देह में सुर-सुरी होए लागल।रसवंती नाव किनारा में कऽ के मोहन से बोलल-'ठीक से उतरु बाबू?'मोहन नाव से उतर गेल आ ताबे तक पीछे मुड़ के रसवंती के देखइत रहल जबे तक रसवंती नजर से ओझल नऽ हो गेल।

अब रसवंती सूखला -साओन, भरला-भादो नौ बजे सुबह में घटवारी करे लागल ।मोहन बिना नागा सभे दिन इस्कूल जाए आ सभे दिन रसवंती के बोली के रस लेबे लागल। रसवंतिओ के मोहन से बात करे में रस आबे लागल ।ई सिलसिला पूरे चार साल तक चलल ।

वसंत जुआन हो गेल रहे ।आम के पेड़ पर मंजर आ गेल रहे । महुआ! महुआ गेल रहे ।सरसो-तोरी फूला गेल रहे ।भौंरा फूलक रस चूसे लेल खेते-खेते घूमइत रहे ।कोइली के बोली मन में एगो अलग रस घोरइत रहे ।महीना रास-रंग आ मस्ती के फागुन रहे ।मोहन बी ए के परीच्छा देबे पटना जाइत रहे ।मोहन जब अपना बोरिया-बिस्तर के साथे शिवनगर घाट पर आएल तऽ रसवंती मोहन के देख कऽ बोलल-'कहीं के जतरा हई कि मोहन बाबू?' मोहन उदास आ खिन्न मन से बोलल-' परीच्छा देबे जा रहल हती ।अब एक महीना के बाद लौटब । तोहर बोली एक महीना तक नऽ सुन पाएब ।'रसवंती के करेजा धक से हो गेल । रसवंती के मुंह से एकाएक निकल गेल-'आहां के बिना देखले एक महीना तक हमहूं केना रहबई ।हमरा तऽ आहां मोह लेले हती?'मोहन बोलल-'गे रसवंती!जेहन तोहर हाल हओ ओहने हाल हमरो हए ?ई समाज बड़ा खराब हई ? हमरा तऽ तोहरे से विआह--------'? कथी कहली-' रसवंती बोलल? 'मोहन बोलल - 'परीच्छा दे के अबइत हती तऽ आगु के तोरा सभे बात बताएब?' रसवंती उदास मन से मोहन के नदी पार उतार देलक मगर ताबे तक मोहन के देखइत रहल जबे तक मोहन ओकरा नजर से ओझल नऽ हो गेल ।

एक महीना के बाद रंग-बिरंग के सपना सजौले मोहन जब शिवनगर घाट पर पहुंचल तऽ ओकर करेजा ई जान के धक से हो गेल कि रसवंती के विआह तऽ चार दिन पहिले हो गेल ।मोहन उदास मन आ भारी डेंग से अपना घरे पहुंचल ।ऐनी कुछ दिन तक ले रसवंती ससुरा में उदास आ खिन्न मन से रहे ।ओकर दुल्हा शंभु रसवंती के हंसावे के लेल बहुत उपाय करे मगर रसवंती के चेहरा पर हंसी नऽ आबे।शंभु ठोसगर किसान रहे ।ऊ पांच बीघा जमीन के जोतनिहार रहे ।दूरा पर एगो गायी,एगो भइसी आ एक जोड़ा बैलो रहे ।शंभु देखे -सुने मे खूब सुथर रहे ।मगर रसवंती के मन के डोरी तऽ केनहुं औरे बन्हाएल रहे ।रसवंती के ससुरा में कुछ दिन तक तऽ समय कटाओन लागे । मगर समय एगो ऐहन डाक्टर हए जे सभे घाव के भर देइअ।धीरे-धीरे रसवंती के घाव भर गेल आ ऊ शंभु के परिवार में हिल-मिल के खुशी-खुशी रहे लागल ।दू साल के बाद रसवंती के एगो बेटा भेल ।रसवंती ओकर नाम गनेश रखलक।गनेश तेज बुद्धि के लड़िका रहे ।गनेश में रसवंती के सुथरई ओनाहिते उतरल रहे जेना नदी-पोखरी में चंद्रमा के छाया उतर जाइअ ।गनेश!गनेशेजी लेखा कुशाग्र बुद्धि के रहे।कोनो पाठ झट-पट में याद कऽ लेबे ।पढ़-लिख के गनेश मास्टर हो गेल ।रसवंती के पारिवारिक गाड़ी बिना हिचकोला खैले सरपट दौड़इत रहे ।अही बीच एक दिन शंभु के पेट में अचानक जोर के दरद उठल ।जाबे डाक्टर आबे ताबे तऽ रसवंती के दुनिया अन्हार हो गेल ।रसवंती के उपर दुःख के पहाड़ टूट गेल ।रसवंती बेटा के मुंह देख के कोनो ढंग से अई दुःख के दिन कटलक ।दुःख से टूटल रसवंती गनेश के विआह बगल के गांव के खूब सुथर लड़की पारो से कऽ देलक ।गनेश आ पारो के रूप साक्षात कामदेव आ रति लेखा रहे ।दुनु एक- दोसर पर मुग्ध रहे ।दुनु के लेल दिन-रात के दूरी कम हो गेल रहे ।जेना कमल के फूल के भौंरा नऽ छोड़े के चाहइअ ओहिना गनेश पारो के संग सटल रहे ।भगवान कलथिन तऽ समय से पारो के एगो बेटा भेल ।पारो ओकर नाम प्रमोद रखलक । प्रमोद अपना आजी रसवंती लेखा सुथर आ मतारी लेखा चुहलगर रहे ।जखनी प्रमोद डेगा-डेगी देइत रहे तभिए गनेश टी बी के बीमारी से ग्रस्त हो गेल ।गनेश के टी बी के बीमारी के बहुते इलाज चलल पर पारो के सुहाग उजर गेल।इलाज रोग के होइअ मौत के कोनो इलाज नऽ हए ।एक बेर फेनु रसवंती पर दुःख के पहाड़ टूट पड़ल ।घर में जुआन पुतोह आ नाबालिक पोता के सिवा कोनो नऽ ।गमे-गमे घर के माली हालात खराब होए लागल ।जोन घर में कहिओ भगवान तर घीऊ के दीआ जरे आई ओई घर में अगरबत्तियो नऽ जर रहल हए ।रसवंती के घर पर केकर नजर-गोजर लाग गेलई कि आई ऊ हरियर परिवार एगदम ठूंठ हो गेल ।अंगना के धजा,तुलसी चउड़ा केना बिला गेल केकरो पता नऽ? जिनगी के इहे चक्र हए ।केकर नसीब कखनी पलट जाएत कोई नऽ कह सकइत हए ?भगवानो नऽ!रसवंती के कनइत-कनइत आंख फूल के गुलर के फूल हो गेल। चेहरा पर झुर्री आ गेल ।अब रसवंती फेनु बराबर उदास रहे लागल ।पुतोह के जुआनी देख के एक दिन रसवंती पारो से हिम्मत कऽ के कहलक-'सुनइत हती दुल्हिन ऐनी आ बऽ?'पारो रसवंती के पास आ के चुके'-मुके बइठ गेल ।रसवंती ओकरा मथा-केश पर हाथ फेरइत दुलार से बोलल-'जे कहबो से करबा?'पारो बोलल-'पहिले बोलथ नऽ'?रसवंती कहलक-'हे दुल्हिन!हमर इच्छा हए कि तो दोसर विआह कऽ ला?' पारो तऽ रसवंती के बात सुन के भक्क रह गेल ।ओकरा तऽ ठकमुर्गी मार देलक ।रसवंती ओकरा फेनु दुलारइत कहलक-'आग आ जुआनी दूनु एके होइत हई?तनिका घीऊ आ लकड़ी मिलल आ एगो फूंक पड़ल कि धधक गेल?बाद में कोनो ऊंच नीच होए अइसे अच्छा हए कि तो दोसर विआह कऽ ला?बात रहल प्रमोद के तऽ एकरा हम रखबई ।प्रमोद हमर जवाबदेही हए ।ओकर आजी आ मतारी दुनु हम ही हतिअई?तू निरधोक कोनो दोसर विआह कऽ ला ।मन होतो तऽ कहिओ-कहिओ प्रमोद के देखे चल अइहा ।'पारो किछिओ नऽ बोलल,चुप रहल आ रसवंती के सभे बात सुन के माथा झुकएले सास के गोर लगइत ओजबुन से चल गेल ।

एने मोहन एम ए कएला के बाद बी पी एस सी के परीच्छा पास कऽ के डिप्टी कलक्टर हो गेल ।गांव-जवार में मोहन के नाम के चरचा होए लागल ।रसवंतिओ के कान में मोहन के बड़का साहेब बन जाए के चरचा गेल तऽ एका-एक ओकर मन कमल फूल लेखा खिल गेल मगर तुनते मुरझा गेल ।जेना कमल के फूल पर पाला पड़ गेल होए ।मोहन अपन विआह संस्कारी,सुशील,श्री संपन्न आ पढ़ल-लिखल लड़की पूनम से कएलक ।पूनम के छवि पूनम के चान्द लेखा सोहनगर आ शीतल रहे ।पूनम के बाबू जी आ मोहन के बाबू जी लंगौटिया यार रहथ ।दुनु हाई इस्कूल तक साथे-साथे पढ़ले रहथ ।पूनमो एम ए कएले रहे ।पूनम के पढ़ाई लंगट सिंह कालेज से भेल रहे आ मोहन के पढ़ाई पटना से ।अई लेल दुनु के कहियो भेंट नऽ रहे ।मगर पूनम के बाबू जी से मोहन पहिले से परिचित रहे आ मोहन हुनका चाचा जी कहे आ मोहन हुनका बोल -बेबहार से बड़ा प्रभावित रहे।अई लेल मोहन खुशी-खुशी पूनम के अपन जीवन संगिनी बना लेलक ।दुनु के जीवन के गाड़ी गृहस्थी के रस्ता पर सर-पट दउड़े लागल ।नऽ कोनो उबड़-खाबड़ नऽ कोनो हिचकोला ।मोहन के जीवन में आनंदे-आनंद रहे ।केबड़ा फूल के महक जेना दूर तक जाइअ ओहिना पूनम आ मोहन के प्रेम के सुगंध के चरचा गांव-जवार में फइलल रहे। भगवान के आशीर्वाद से पूनम के एगो बेटा आ एगो बेटी के मतारी बने के सौभाग्य मिललई ।पूनम आ मोहन के घर बाल किलकारी आ चपलता से रौशन हो गेल ।दुनु भाई-बहिन के रूप आ बुद्धि दिव्यता से भरल रहे ।दुनु पढ़-लिख के डाक्टर बनल।बेटा प्रियव्रत आ बेटी सुप्रिया अमेरिका में डाक्टरी करे चल गेल ।दुनु ओतही के नागरिकतो ले लेलक ।अही बीच मोहन रिटायर हो गेल आ पति -पत्नी पटना में रहे लागल ।मोहन आ पूनम के जिनगी खूब ठीक-ठाक से गुजरइत रहे।मौज से जिनगी कटइत रहे ।अही बीच एक दिन पूनम के पेट में अचानक जोर से दरद उठल तऽ मोहन हुनका तुरत डाक्टर इहां ले गेल।डाक्टर दवाई देलक आ सभे ढंग के जांच कएलक ।जांच से पता चलल कि पूनम के पेट के अपेन्डिक्स फाट गेल हए ।जेइसे पूनम के पूरे शरीर में जहर के असर हो गेल रहे ।डाक्टर सभे उपाय अपना समझ से कएलक मगर ओकर सभे उपाय बेकार गेल। हंसनी हंस के छोड़ के सत्य लोक में चल गेल।

अब हंस के दुनिया अन्हार हो गेल ।मोहन के अब नऽ आगु बुझाए आ नऽ पाछु?अई कठिन घड़ी में मोहन निर्नय कयलक कि पटना ऐहन शहर में अकेले रहे से अच्छा हए कि अब गांव में जा के रहल जाए ।अई में मोहन के सोच रहे कि गांव में अभिओ चाय,बीड़ी,खइनी खिबइत रहब तऽ लोग सभे के जामबाड़ा बराबर दूरा पर लागल रहत आ हमर मन बहटियाएल रहत ।शहर में तऽ भर दिन घर में असगरे रहे के पड़त?गांव में दिन निम्मन से कट जाएत ।इहे सब बात सोच-समझ के गांव वला घर के रंग-रोगन करा के गांव में जा के रहे लागल।रोज दस-बीस आदमी के जामबाड़ा हुनका दूरा पर लागल रहे ।भर दिन हंसी-ठट्ठा चलइत रहे ।गप्प के गुलछरा उड़इत रहे ।अई सब से मोहन के समय निम्मन से कटइत रहे ।दिन-रात केना बित जाए मोहन के कुछ नऽ बुझाए ।एक दिन अपना जरूरी काम से मोहन मुजफ्फरपुर जाइत रहे ।सैदपुर में बस पड़ बइठे गेल ।ओही बस पर पहिले से रसवंती अपना पोता के गोदी में लेले बइठल रहे ।मोहन के देखते रसवंती पहचान गेल कि ई तऽ मोहन बाबू छथ।रसवंती अपन सीट छोड़ के उठ गेल आ हुनका से पूछलक-'हमरा पहचानइत हती अपने,हम के हती?' मोहन बाबू बोललन-'अरे रसवंती! तू केनी जा रहल हता?'रसवंती बोलल-'पहिले बइठू तब सभे बात बतियाएब?'मोहन रसवंती के बगल में बइठ गेल।रसवंती हुनका से आगु-पाछु के सभे बात बतियाए लागल ।अपन सभे नया- पुरान खिस्सा हुनका सामने दिल खोल के रख देलक।मोहन बाबू पूछलन-' ई लड़िका कोन हओ?'रसवंती बोलल ई हमर दुलरुआ पोता प्रमोद हए। ऐकरे बोखार होइत हई ।अई लेल मुजफ्फरपुर में राम स्वरूप डाक्टर से देखाबे ले जाइत हतिअई।'मोहन बोललन-' अब तू एकर चिंता छोड़ा ।एकर इलाज हम कराएब।अतने नऽ अब एकर पढ़ाई-लिखाई के सभे जिम्मा हमरा उपर ।अब तोरा जिनगी के सभे भार हमरा उपर ।तोरो समय बीतल हमरो समय बीतल ।हमहूं अकेले तू हूं अकेले ।अब तू हमरे इंहा रहा ।' रसवंती चुपचाप हुनकर बात पी गेल ।कुछ नऽ बोलल ।मोहन बाबू बोललन-' कि हम समझू कि तोरा हमर बात मंजूर हए?'रसवंती के आंख डबडबा गेल आ ऊ अपन माथा हिला देलक

रसवंती अब अपना दुलरुआ पोता के साथे मोहन के जौड़े मोहन के घर में रहे लागल ।मोहन रसवंती के पोता प्रमोद के अपने पोता समझे।अपने पोता लेखा ओकरा लाड़-दुलार सब देबे।ओकर दवा-दारू,पढ़ाई-लिखाई सब निम्मन ढंग से कराबे ।प्रमोद पढ़े-लिखे में खूब होशियार आ तेज रहे ।कोनो बात के एके-बेरी में समझ जाए । प्रमोद दिल्ली इनभरसिटी से फस्ट क्लास से बी ए कएलक आ मोहन के कहला से बी पी एस सी के परीच्छा में बइठल ।ऊ तऽ एके चांस में बी पी एस सी के परीच्छा निकाल लेलक।ओकरो चरचा गांव-जवार में ओनाहिते होए लागल जेना कहिओ मोहन के बी पी एस सी के परीच्छा निकाल लेला पर भेल रहे।प्रमोद अब डिप्टी कलक्टर हो गेल ।प्रमोद! मोहन के बाबा से बेसी भगवाने माने।प्रमोद अब मोहन के खूब खेयाल रखे ।हुनकर हर कहनाई पूरा करे आ प्रमोद के आजी रसवंती तऽ हर घड़ी मोहन के सेवा में लागले रहे ।मोहन के सेवा के सिवा रसवंती के कोनो कामे नऽ।ओकर जगनाई-उठनाई ,खनाई-पीनाई सभे मोहन के समर्पित रहे। मोहन जेइ में खुश ओही में रसवंती खुश ।

मोहन चीनी के पुरान मरीज रहे ।ऊ चीनी के दवाई सालों से खाइत रहे मगर एने आगे ओकर चीनी बहुत बढ़ गेल।बहुते डाक्टर से देखौलक बहुत रंग के दवाई खैलक वांकी चीनी घटे के नामे नऽ लेबे ।मोहन समझ गेल ई कोनो खतरा के घंटी हए।एक दिन मोहन रसवंती के अपना नजदीक बोलाके कहलक-' हे रसवंती सुनइत हता?रसवंती कहलक-'सुनइत हती कहूं नऽ?'मोहन रसवंती से कहलक-'तू आ प्रमोद मिलके हमर सेवा हमरा बेटा-बेटी से भी बेसी कएला ।हम तऽ बेटा-बेटी के सेवा जनबे नऽ कइली?जाबे प्रियव्रत के मतारी पूनम रहलन हुनका सेवा के हम करजदार हती?अब तऽ प्रमोदे हमर पोता बेटा दुनु हए ।हम मरब तऽ हमर आग प्रमोदे देत ।प्रियव्रत के कोन आयत चाहे नऽ आयत मगर खबर कऽ दिअहू ?ई सभे कागज तोरा नाम से हओ एकरा संभार के रखा '।अतना कहइत मोहन सोफा पर लुढ़क गेल ।रसवंती चीख-पुकार करे लागल ।आस-पड़ोस के गोतिय-देआद के जामबाड़ा होए लागल ।प्रियव्रत के फोन घुमाएल गेल ।प्रियव्रत कहलक-'आहां सब बाबू जी के दाह संस्कार करु ।हमरा तऽ इहां से आबे में दू-चार दिन समय लाग जाएत ।'गोतिया-देआद कानाफुसी करे लागल कि हिनकर आग के लेत?कोनो कुछ कहे कोनो कुछ।अई बात के झमझउड़ होइत देख,रसवंती मोहन बाबू के लिखल ओसियतनामा सभे लोग के सामने रख देलक ।लोग के ओसियतनामा पढ़ के ठकमुर्गी मार देलक ।ओसियतनामा में साफ -साफ लिखल रहे कि हमर मुखाग्नि हमर पोता प्रमोद देत। हम अपना सभे संपत्ति के आधा हिस्सा प्रमोद के आ आधा हिस्सा में प्रियव्रत आ सुप्रिया के आधा-आधा देइत हती । हमरा पेंशन के अधिकारी रसवंती होयत ।हमर जे सेवा रसवंती आ प्रमोद कएलक ओई के बदला में हम ओकरा-"पोस-पोता" मान के अपना संपत्ति के आधा हिस्सा दे रहल हती ।

प्रमोद के पटना फोन घुमाएल गेल ।प्रमोद आनन-फानन में पहुंच गेल ।मुखाग्नि के काम प्रमोद के हाथ से विधि पूर्वक पंडित के दिशा निर्देश में पूरा भेल ।द्वादशा से दू दिन पहले बेटा प्रियव्रत आ बेटी सुप्रिया अमेरिका से आ गेल।क्रिया-क्रम के काम देख कऽ प्रियव्रत आ सुप्रिया खूब खुश भेल आ कहलक -'हमरा बाबू जी के काम ऐहन होए के चाही जेहन काम आई तक ले जवार में केकरो नऽ भेल होए।खर्चा के लेल आहां सब फिक्कीर नऽ करु।' प्रमोदो कहलक -'चचा ठीक कहई छथ ऐहने भोज होए के चाही?'ओहन भोज के तइयारी भेल ।चौगामा के लोग के चुल्हियानेवार नेओतल गेल ।दू दिन कच्ची आ दू दिन पक्की के भोज भेल।सभे लोग इहे कहे कि आइ तक ऐहन भोजन जवार में कोनो नऽ कएले रहल हऽ?भोज तऽ थई-थाई हो गेल ।विहान भेले प्रियव्रत आ बेटी सुप्रिया के अमेरिका लौटे के रहे ।रसवंती ऊ सभे कागज-पत्तर जे मोहन ओकरा देले रहे,प्रियव्रत के हाथ में रख देलक ।प्रियव्रत आ सुप्रिया ओई कागज़ के उलटा-पुलटा के देखलक आ कहलक-'आहां हमरा बाबू जी के हमरा मतारी से बढ़ के सेवा कइली हऽ !अई लेल हम अपना मतारी से बटबारा नऽ करब ।बाबू जी जे आहां के देलन ऊ तऽ आहां के हइते हए ।हमरा आ सुप्रिया के जे देलथिन ऊ सभे हम भाई बहिन अहीं के दे रहल हती -'हमरा समझ से जमीन के हकदार ओकरे होए के चाही जेकरा अपना मतारी आ माटी से प्रेम होए ।'अतना कहइत प्रियव्रत आ सुप्रिया रसवंती के पैर छू के गोर लगइत चल देलक सात-समुन्दर पार ।

©साहित्य मार्तण्ड उदय नारायण सिंह
कृपा-कुंज बी एम पी 06 दुर्गास्थान मालीघाट मुजफ्फरपुर ( बिहार )

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