20/07/2026
बब्लू की साइकिल
शायद सन 1932 की बात है। बैठे-बैठे ध्यान आया कि चलो, साइकिल चलाना सीख लें। इसकी शुरुआत यूँ हुई कि हमारे लड़के ने बिना बताए यह विद्या सीख ली और हमारे सामने साइकिल पर सवार होकर निकलने लगा। सोचा, ' क्यों हमी जमानेभर में फिसड्डी रह गए हैं। सारी दुनिया चलाती है, जरा-जरा से लड़के चलाते हैं, मूर्ख और गवाँर चलाते हैं, क्या हमी नहीं चला सकेंगे? आखिर इसमें मुश्किल क्या है? कूदकर चढ़ गए और लगे ताबड़तोड़ पाँव मारने। और जब देखा कि कोई राह में खड़ा है, तब टन-टन करके घंटी बजा दी । अगर न हटा तो क्रोधपूर्ण आँखों से घूरते हुए चले गए। बस, यही तो सारा रहस्य है इस लोहे की सवारी का।' कुछ ही दिनों में सीख लेंगे। हमने निस्चय कर लिया कि चाहे जो हो जाए, परवाह नहीं।
दूसरे दिन हमने फ़टे- पुराने कपड़े तलाश किए और उन्हें ले जाकर दर्जी के सामने पटक दिया कि इनकी जरा मरम्मत कर दो।
दर्जी ने अचरज भरी दृष्टि से देखा और कहा, "इन कपड़ो में अब जान ही कहाँ है जो मरम्मत करूँ। आखिर मैं इन्हें ढूढ़- ढूढंकर कर लाया हूँ, ऐसे ही तो न उठा लाया। इन्हे सीकर ठीक- ठाक कर दो|"
बब्लू के पापा बोले, पहले मैथ में अच्छे नंबर आएंगे तभी साइकिल आएगी, अब बबलू अपने मैथ के पेपर से नम्बर गिनने लगा, एक, दो, तीन, चार, पांच और अब बबलू को साइकिल नजर न आ रही है उधर वो अपने दोस्त के यहाँ से साइकिल के लिए बोल दिया है।
हमने हाँफते-हाँफते कहा, "उस्ताद, हम शहर के पास नहीं सीखेंगे, गांव में जो खेल का मैदान है, वहाँ सीखेंगे। वहाँ एक तो भूमि नरम है, चोट कम लगती है। दूसरे , वहाँ कोई देखता भी नहीं है।"
अब रात को आराम की नींद कहाँ? जब आँखे खुली तो दिन निकल आया था। जल्दी से जाकर हमने पुराने कपड़े पहन लिए, जम्बक का डिब्बा हाथ में लिया और दोस्त को भेजकर साइकिल मंगवा ली।
इस तरह से साइकिल ने हमारी परीक्षा लेनी शुरु कर दी। फिर जो कुछ जी में आया तो उसका हैंडल पकड़ कर जरा चलने लगे। लेकिन दो ही कदम चले होंगे कि ऐसा मालूम हुआ कि जैसे साइकिल हमारे सीने में चड़ी आ रही है । हमने साइकिल छोड़ दी और भगोड़े सिपाही बनकर मुड़ गये। पर दुसरे ही क्षण साइकिल अपने पूरे जोर से हमारे पाँव में गिर पड़ी। लेकिन हमारा साहस तो देखिए हम जख्मी हो गए लेकिन अब भी मैदान में डटे रहे। कई बार गिरे , घुटने तुड़वाए, कपड़े फड़वाए और क्या मजाल हिम्मत टूट जाए! आखिर आठ-नौ दिन में साइकिल चलाना तो सीख गए थे लेकिन अभी उसमें चढ़ना नहीं आता था। अगर कोई परोपकारी पुरुष सहारा देकर चढ़ा देता तो फिर उल्टे-सीधे पैडल मारकर चला ले जाते । हमारे ख़ुशी का कोई सीमा न थी। सोचते थे, मार लिया मैदान!
अब हम साइकिल चला रहे थे और मन ही मन फूले नही समा रहे थे। लेकिन हाल यह था कि कोई आदमी दो सौ गज के फासले पर होता तो हम गला फाड़-फाड़कर चिल्लाना शुरु कर देते, "साहब जरा बाई तरफ हट जाए।" कभी कोई गाड़ी दिखाई देती हमारे प्राण सूख जाते। जब गाड़ी निकल जाती तो हमारी जान मे जान आती ।
अचानक सामने से शर्मा जी आते दिखाई दिए, तो हमने शर्मा जी को अंतिम चेतावनी दे दिया कि शर्मा जी, बाईं तरफ हो जाओ वरना साइकिल तुम्हारे ऊपर ही चढ़ा देगे। इतने में सामने से एक ताँगा आता हुआ नज़र आया। हमने टाँगे वाले को दूर से ही डाँट दिया, "बाईं तरफ भाई। अभी हम नए चलाने वाले हैं।"
ताँगा बाईं तरफ हो गया। अब हम अपने रास्ते चले जा रहे थे और इस तरह से बब्लू ने साइकिल चलाना सीख गया।
लेखक:- हेमंत सिंह