05/06/2018
जनसंघी हुआ मुगलसराय स्टेशन,नया नाम पडा पंडीत दीनदयाल जंक्शन
फिर रेल मंत्री और मंत्रालय बदल दें बख्तियारपुर जंक्शन का भी नाम
नालंदा विश्वविद्यालय को जलाने वाला था शासक बख्तियार खिलजी
उसी मुग़ल शासक के नाम पर मेन लाइन में है बख्तियारपुर जंक्शन
विनायक विजेता-
मंगलवार से ऐतिहासिक और कई मायनों में महत्वपूर्ण मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलकर पं. दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन कर दिया गया। रेल मंत्रालय ने इससे संबंधित अधिसुचना भी जारी कर दी है। इसके साथ ही देश में प्रथम इस जंक्शन को जनसंघी जंक्शन होने का सौभागय भी प्राप्त हो गया। 1951 में अखिल भारतीय जनसंघ से जुडे बडे नेता पंडीत दीनदयाल उपाध्याय की 11 फरवरी 1968 को रेल यात्राा के दौरान मंगलसराय स्टेशन के पास ही चलती ट्रेन में हत्या कर दी गई थी। मुगलसराय जंक्शन का नामकरण और इसका शुभारंभ उस वक्त भारत में पैर पसार रही ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1862 में तब किया था जब यह विलायती कंपनी हावडा और दिल्ली को रेल मार्ग से जोड रही थी। उस वक्त भारत में अंतिम मुगल शासक का दौर चल रहा था। अंग्रेजों ने मुगलों और उसके शासकों को खुश करने के लिए ही देश के कई स्टेशनों का नाम मुगलों और मुसलमान विदेशी शासकों के नाम पर रखा। गौरतलब है कि भारत को पराधीन बनाने वाले ईस्ट इंडिया कंपनी ने ही सर्वप्रथम 16 अप्रैल 1853 को मुंबई और ठाणे के बीच 34 किलोमीटर की दूरी की पहली रेल सेवा शुरु की थी इसके पूर्व भारत में रेल सेवा नहीं थी तो जाहिर है कि उस वक्त जितने स्टेशनों का नामकरण हुआ उसका नाम अंग्रेजा ने ही रखा। इसी तरह का एक स्टेशन मुगलसराय-मोकामा वाया पटना के बीच का बख्तियारपुर जंक्शन है। इस जंक्शन से होकर ही ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व वाले स्थान नालंदा और राजगृह जाने का रेल मार्ग है। तुर्की शासक बख्तियार खिलजी ने 1199 में भारत पर आक्रमण कर कई प्रदेशो पर कब्जा कर लिया। इसी क्रम में तुर्की शासक बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय में आग लगवा दी थी। कहा जाता है कि विश्व विद्यालय में इतनी पुस्तकें थी की पूरे तीन महीने तक यहां के पुस्तकालय में आग धधकती रही। उसने अनेक धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार डाले। खिलजी ने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था।
इतिहासकार विश्व प्रसिद्ध नालंदा विश्व विद्यालय को जलाने के पीछे जो वजह बताते हैं उसके अनुसार एक समय बख्तियार खिलजी बहुत ज्यादा बीमार पड़ गया। उसके हकीमों ने इसका काफी उपचार किया पर कोई फायदा नहीं हुआ। तब उसे नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्रजी से उपचार कराने की सलाह दी गई। उसने आचार्य राहुल को बुलवा लिया तथा इलाज से पहले शर्त लगा दी की वह किसी हिंदुस्तानी दवाई का सेवन नहीं करेगा। उसके बाद भी उसने कहा कि अगर वह ठीक नहीं हुआ तो आचार्य की हत्या करवा देगा। बख्तियार खिलजी ने 1199 में आग नालंदा विश्व विद्यालय में आग लगवा दी थी। उसका पूरा नाम इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी था। बिहार का वह मुगल शासक था। अगले दिन आचार्य उसके पास कुरान लेकर गए और कहा कि कुरान की पृष्ठ संख्या इतने से इतने तक पढिए ठीक हो जाएंगे। उसने पढ़ा और ठीक हो गया। उसको खुशी नहीं हुई उसको बहुत गुस्सा आया कि उसके हकीमों से इन भारतीय वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है। बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने के बदले उसने 1199 में नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दी। वहां इतनी पुस्तकेंं थीं कि आग लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकेंं जलती रहीं। उसने हजारों धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार डाले। खिलजी के ठीक होने के जो वजह बताई जाती है वह यह है कि वैद्यराज राहुल श्रीभद्र ने कुरान के कुछ पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप लगा दिया था। वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज चाट गया और ठीक हो गया। उसने इस एहसान का बदला नालंदा को जलाकर दिया। अब सवाल यह उठता है कि जब मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलकर कर पंडीत दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन किया जा सकता है तो विश्व के सबसे प्राचीन और बडे विश्वविद्यालय को जलाकर राख कर देने वाले एक मुगलशासक के नाम पर बने बख्तियारपुर जंक्शन का नाम गौतम बुद्ध या भगवान महावीर जंक्शन कयों नहीं किया जा सकता।