10/10/2025
ब्रह्मपुर विधानसभा: भाजपा के 'भीष्म पितामह' कैलाशपति मिश्र की पुत्रवधू दिलमणि मिश्रा के साथ फिर सियासी साजिश?
बक्सर — ब्रह्मपुर विधानसभा क्षेत्र एक बार फिर से टिकट वितरण को लेकर सियासी हलचलों का केंद्र बन गया है। चर्चा का मुख्य विषय यह है कि भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शुमार और ‘भीष्म पितामह’ की उपाधि से सम्मानित स्व. कैलाशपति मिश्र की पुत्रवधू व पूर्व विधायक दिलमणि मिश्रा को एक बार फिर दरकिनार करने की तैयारी है। यह मुद्दा अब भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच गंभीर असंतोष का कारण बनता जा रहा है।
2010 में जब दिलमणि मिश्रा को पहली बार भाजपा ने टिकट दिया, तो उन्होंने भारी मतों से जीत दर्ज कर यह साबित कर दिया कि ब्रह्मपुर भाजपा का मजबूत गढ़ है। लेकिन 2015 में पार्टी ने उनका टिकट काट दिया, और परिणामस्वरूप भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी दिलमणि मिश्रा ने न केवल संगठन से नाता बनाए रखा, बल्कि सामाजिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाते हुए जनता से जुड़ाव भी बरकरार रखा। उनकी इसी सक्रियता और लोकप्रियता को देखते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें बिहार राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष नियुक्त किया।
2020 के विधानसभा चुनाव में भी ब्रह्मपुर सीट एनडीए के हाथ से फिसल गई। अब जबकि 2025 के चुनाव करीब हैं, दिलमणि मिश्रा पुनः मैदान में उतरने को तैयार हैं और ज़मीनी स्तर पर अपनी दावेदारी मजबूत कर रही हैं। लेकिन इसी बीच खबरें आ रही हैं कि यह सीट एनडीए गठबंधन के तहत चिराग पासवान की पार्टी (लोक जनशक्ति पार्टी-रामविलास) को देने पर विचार किया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, हुलास पांडे एलजेपी से इस सीट पर प्रमुख दावेदार माने जा रहे हैं।
भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं में इस संभावना को लेकर गहरा आक्रोश है। उनका मानना है कि यदि एक बार फिर दिलमणि मिश्रा को टिकट से वंचित किया गया, तो न सिर्फ ब्रह्मपुर, बल्कि आस-पास के क्षेत्रों में भी पार्टी को संगठनात्मक नुकसान झेलना पड़ सकता है। कार्यकर्ता इसे केवल एक उम्मीदवार की उपेक्षा नहीं, बल्कि पार्टी की परंपरागत निष्ठा और समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी मान रहे हैं।
स्व. कैलाशपति मिश्र जैसे आदर्शवादी नेता के परिवार के प्रति पार्टी का यह रुख, कार्यकर्ताओं को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या भाजपा अपने मूल्यों और समर्पित कार्यकर्ताओं के सम्मान की रक्षा कर पा रही है?
यदि ब्रह्मपुर जैसी ऐतिहासिक और परंपरागत सीट पर बार-बार संगठन से जुड़ी और जनप्रिय नेता की उपेक्षा होती रही, तो यह न केवल पार्टी के जनाधार पर चोट होगी, बल्कि संगठनात्मक एकता और भरोसे पर भी प्रश्नचिह्न लग जाएगा।