29/10/2025
“टाइगर टैक्स क्रांति लिमिटेड”
मैं हूँ डॉ. संदीप सौरभ,
पीएचडी — क्रांति विज्ञान में, जेएनयू से।
वहाँ हमने नारे सीखे थे —
“इंकलाब ज़िंदाबाद!”
“जनता माँगे हिसाब!”
और “सत्ता जनता की होगी!”
फिर जनता ने मुझे सत्ता दे दी।
अब हिसाब मेरा है, जनता बाहर!
जेएनयू में मैंने सीखा था —
“जनता की लड़ाई, जनता के साथ।”
पालीगंज पहुँचा तो समझ आया —
“जनता की लड़ाई, जनता के पैसे के साथ।”
अब मैं रोज़ सुबह उठता हूँ,
क्रांति की जगह कमीशन कैलकुलेटर खोलता हूँ।
जहाँ पहले “मजदूर एकता” का झंडा लहराता था,
अब वहाँ टेंडर का फॉर्म झूलता है।
वो कहते हैं न —
“क्रांति भूख मिटाती है।”
सही कहा उन्होंने,
मेरी भूख मिटा दी उसने — स्थायी तौर पर।
जनता आज भी मेरे पास आती है,
कहती है — “साहब, सड़क टूटी है।”
मैं कहता हूँ — “भाई, ये विकास का ट्रायल वर्ज़न है।”
वो कहती है — “पानी नहीं आता।”
मैं कहता हूँ — “वो चुनावी मौसम में बरसेगा।”
और जब कभी अंतरात्मा हिलती है,
तो मैं उसे कुर्सी के गद्दे से दबा देता हूँ।
क्योंकि सत्ता में बैठते ही
‘जनता’ एक शब्द नहीं,
एक मेमो बन जाती है —
जिसे सचिव फाइल के नीचे रख देता है।
क्रांति अब ठेके पर चलती है,
और जनता?
वो अब सिर्फ पोस्टर में मुस्कुराती है।