03/03/2025
मैं एक अजनबी-सा आया और जाऊंगा भी अजनबी होकर
आज से तकरीबन 300 साल पहले आज के दिन ही, 3 मार्च 1707 ई. की सर्दियों में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब आलमगीर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। उनकी वफ़ात के बाद उन्हें अहमदनगर से खुल्दाबाद ले जाया गया और उनकी वसीयत के मुताबिक उन्हें दफ़न किया गया। खुले आसमान के नीचे मौजूद उनकी सादा सी कब्र उनकी सादगी को बयां करती है और उनके पुरखों की दुनियावी विरासत के बरक्स एक बड़ा फर्क रचती है।
औरंगजेब के पास दौलत बेशुमार थी लेकिन फिर भी उनकी ख्वाहिश थी की उन्हें हुमायूँ और शाहजहाँ के लिए बने आलीशान मकबरे के बाजए एक आम सी कब्र में दफ़न किया जाये।
औरंगजेब के दौरे हुकूमत में मुग़ल सल्तनत अपने उरूज पर थी। वो अपने समय के सबसे दौलतमंद और ताक़तवर शख़्स थे। उनके समय में मुग़ल सल्तनत की सीमा काबुल से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैली हुयी थी, जबकि दक्षिण में दक्कन के आखिरी छोर तक फैली हुयी थी। उन्होंने अपनी सल्तनत में शरीयत आधारित कानून फ़तवा-ए-आलमगीरी लागू किया। और एक इंसाफ़पसन्द बादशाह के तौर पर अपनी पहचान बनाई। इसके अलावा उन्होंने शहंशाह अकबर के जरिये हिन्दुओं पर से हटाया हुआ जजिया कर दोबारा लागू कर दिया। जिससे उन्हें कुछ हिन्दू राजाओं से नाराजगी भी झेलनी पड़ी। लेकिन दूसरी ओर उन्होंने अपने पूर्ववर्ती बादशाहों की तुलना में मुगल नौकरशाही में काफी ज्यादा हिंदुओं को नियुक्त किया, जो की कुल नौकरशाही का 30 फीसदी से ज्यादा था जबकि औरंगजेब से पहले ये तादाद केवल 22 फीसदी थी।
औरंगजेब को दक्कन में मुगल सल्तनत के विस्तार के लिए भी जाना जाता है। उन्होंने दक्षिण में 4 मिलियन वर्ग किलोमीटर तक साम्राज्य विस्तार किया और 1690 में 450 मिलियन डॉलर के वार्षिक राजस्व के साथ 15 करोड़ से अधिक की आबादी पर शासन किया। उनके शासनकाल के दौरान, हिंदुस्तान चीन के किंग राजवंश को पीछे छोड़ दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। जिसकी कीमत 90 बिलियन डॉलर से अधिक थी, जो सन 1700 में दुनिया की जीडीपी का लगभग एक चौथाई (25%) था।
औरंगजेब ने अपने दौर-ए-हुकूमत में, 30 से अधिक जंगे लड़ीं, जिनमें से 11 जंगों की कमान औरंगजेब ने खुद संभाली।
दुनिया की सबसे अमीर सल्तनत पर हुकूमत करते हुए भी औरंगजेब एक आम जिंदगी जीते थे। वो खाने-पीने से लेकर पहनावे और जिंदगी की तमाम दूसरी सुविधाओं में संयम बरतते थे। सल्तनत के भारी कामों में व्यस्त रहते हुए भी वे अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कुरान की किताबत (नकल) करके और टोपियाँ सीकर पैसे कमाने का कुछ समय निकाल लेते थे।