Twitter voice of india

Twitter voice of india मुझे गर्व है कि में हिन्दुस्तानी हूं

13/12/2020

*मै एक बार अपनी कार से कोटा से जयपुर की और जा रहा था । रास्ते में देखा एक ट्रक के पीछे लिखा एक संदेश देखा जिसने झकझोर कर रख दिया !!*

*"हाॅर्न धीरे बजाओ मेरा मुस्लिम समाज गहरी नींद सो रहा है"...!!!*

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*मेरी जिज्ञासा हुई इस ट्रक चालक से दो बात करने की। मै उसके पीछे ही चलता रहा यह सोच कर कि कहीँ तो रुकेगा फ्रेश होने के लिए ।*

*रास्ते में टोंक के आस पास एक ढाबे पर वो चाय पीने के लिये रुका।*

*मेरा इरादा तो उससे मिलने का था ही । मैं भी उसी ढाबे पर रुक गया ।*

*उसके आस पास ही एक चारपाई पर मैं भी बैठ गया । मैने उससे पहला सवाल यही किया कि भाई ड्राइवर साहब आपने ट्रक के पीछे एक बहुत ही गहरे मतलब का संदेश लिखाया हुआ है यह प्रेरणा आपको कैसे मिली ।*

*उसने जवाब दिया बाबू जी वक्त बड़ी चीज है यह अच्छे अच्छो को प्रेरणा देता है बस कमी यह है हमे भर पेट रोटी क्या मिलने लगी हमने अब और प्रेरणा लेना बन्द कर दिया, लेते ही नही। अच्छा हुआ आपने उसे पढा और मेरे से यह सवाल किया ।*

*मै पूरे भारत में सड़को पर घूमता हूँ। हजारो लोग इस संदेश को पढते होंगे । अगर उन में से 20% लोग भी मेरा संदेश समझ गए मेरा मकसद हल हो गया ।*

*उस से रहा नही गया उस ने जेब से एक परचा निकाला और उसी संदेश पर किसी कवि की एक क्रान्तिकारी कविता सुना डाली जो नीचे लिखी जा रही है ।*

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*'ब्राह्मणो के जुल्म सितम से...*

*फूट फूटकर 'रोया' है...!!*

*'धीरे' हाॅर्न बजा रे पगले. मेरा मुस्लिम समाज सोया है...!!*
*कई जाने जाने के बाद चैन' मिला है... 'पूरी' नींद से सोने दे...!!*

*जगह मिले वहाँ 'साइड' ले ले...हो शोषण तो होने दे...!!*

*किसे जगाने की चिंता में... तू इतना जो 'खोया' है...!!*

*'धीरे' हाॅर्न बजा रे पगले मेरा मुस्लिम समाज सोया है....!!!*
*आरक्षण के सब 'नियम' पड़े हैं... कब से 'बंद' किताबों में...!!*

*'जिम्मेदार' समाज वाले...सारे लगे गुलामी में...!!*

*तू भी कर दे झूटे वादे क्यों 'ईमान' में खोया है..??*

*धीरे हाॅर्न बजा रे पगले... मेरा 'मुस्लिम सोया है...!!!*
*गुलामी की इन सड़कों पर... सभी क़दम मिला चलते हैं...!!*

*आवाज़ उठाने वाले मर के चलते बनते हैं मेरे समाज की लचर विधि से... 'भला' मनुवादी का होया है...!!*

*धीरे हाॅर्न बजा रे पगले.... मेरा 'मुस्लिम समाज सोया है....!!!*
*मेरा समाज तो है 'शेर जैसा... यह सोये तब तक सोने दे...!!*

*'गुलामी की इन सड़कों पर... नित शोषण ' होने दे...!!*

*समाज जगाने की हठ में तू.... क्यूँ दुख में रोया है...!!*

*धीरे हाॅर्न बजा रे पगले.. मुस्लिम समाज सोया है....!!!*
*अगर समाज यह 'जाग' गया तो.. ब्राह्मण 'सीधा' हो जाएगा....!!*

*आर.एस एस. वाले 'चुप' हो जाएँगे.... और हर मनुवादी रोयेगा...!!*

*अज्ञानता से 'शर्मसार' हो .... संविधान भी रोया है..!!*

*धीरे हाॅर्न बजा रे पगले... मेरा मुस्लिम समाज सोया है...!!!*
*मुस्लिम समाज हमारा सोया है....!!!*

*उसने यह कविता सुनाई इस बीच कब हमारे पास चाय आई और कब हमने पीकर खत्म भी कर दी पता भी नही चला ।*

_*चाय पीकर हम एक दुसरे से जुदा हो गये लेकिन उस ट्रक चालक का अपने मुस्लिम समाज के प्रति इतनी गहरी चिन्ता से भरा हाव भाव मेरे दिल में उतर गया ।*_

_*मैं उससे सिर्फ इतना ही कह पाया दोस्त आज से आप अपने आपको अकेला मत समझो आज से मैं भी आपके इस प्रचार का एक अहम हिस्सा हूँ ।*_

*विशेष आग्रह:*
*दूसरी कॉम की तरह आप भी जागो* 👏👏👏👏👏👏👏

09/12/2020

*तबलीगी जमात की अहमियत को समझे*

*तबलीगी जमात का तआरुफ (Introduction)*

तबलीगी जमात दुनिया की सब से मुनज़्ज़म जमात है जिसके साथ213मुल्को के150 मिलियन (150,000,000) यानी 15 करोड़, लोग वाबस्ता है।

*इस जमात की*
..कोई ज़ाति वेब साइट नहीं है ..कोई सरकारी इमदाद नहीं है ..कोई इलेक्ट्रॉनिक/प्रिंट मीडिया नहीं ..सहाबा की तर्ज़ पर काम करती है ..सुन्नत पर अमल करती है,..ज़ुबान पर अल्लाह का ज़िक्र,..आँखों में शब् बेदारी के आसार,..पेशानी पर सजदों के निशान,..एक हाथ में ज़रूरी सामान,..दूसरे हाथ में तस्बीह बे शुमार

तबलीगी जमाअते अपने मख़्सूस अंदाज़ में देहात देहात शहर शहर मुल्क मुल्क अपने कदमो को गुर्द आलूद करते हुए इस्लाम की तबलीग़ में मसरूफ है

*तबलीगी जमात का मकसद*

तबलीगी जमात कोई फिरका या मसलक नहीं है

एक ऐसी तहरीक है जिस को सिर्फ इस लिए अमल में लाया गया ताकी मुस्लिम अवाम अपने ईमान की सलामती के साथ दुनिया से जाए।

एक ऐसी तहरीक जिस ने पूरी उम्मते मुहम्मदिया की दीनी बक़ा की फ़िक्र की।

जिस तहरीक के तहत मुसलमानों में बे दीनी के माहौल को ख़त्म करने का अज़्म लिया गया।

जिसके ज़रिये ये फ़िक्र आम की गई के , उम्मत किस तरह जहन्नम के सख्त अज़ाब से बच कर जन्नत में जाने वाली बन जाए।

लिहाज़ा तबलीगी जमात का मक़सद आख़िरत की कामयाबी का हासिल करना है कि,

हमारी असल ज़िन्दगी यानी आख़िरत संवर जाए हम और हमारे तमाम मुसलमान भाई जन्नत में जाने वाले बन जाए

ये तहरीक जहाँ अच्छाई का हुक्म करने और बुराई से रोकने का कामअन्जाम दे रही है वही दुनिया को अमन और सलामती का पैगाम भी पहुंचा रही है।

*तबलीगी जमात की मक़बूलियत*

आज तबलीगी जमाअत सारी दुनिया में मक़बूलियत पा चुकी है और ईस की अलामत ये है की हनफी,शाफई,मालिकी,हंबली इन चारों मस्लक को मानने वाले इस काम मे लगे है

ये मक़बूलियत खुदा की तरफ से है अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने इस तहरीक की मेहनत और खुलूसे फ़िक्र को कुबूलियत से नवाज़ कर सारी दुनिया में इस की मक़बूलियत को आम कर दिया है

गुज़िश्ता सैकड़ो सदियों में शायद ही किसी तहरीक को इतनी जल्द इतनी बड़ी कामयाबी मिली हो जो तबलीगी जमाअत को सिर्फ आधी सदी में हासिल हुई है

*इस तहरीक की कामयाबी की वजूहात*

1 इस तहरीक का ताल्लुक मसलके अहले सुन्नत वल जमात से होना

2 अपनी ज़ात की इस्लाह और इमान की हिफ़ाज़त की मुकम्मल फ़िक्र करना

3 पूरी दुनिया के मुसलमानो की दीनी फ़िक्र को लेकर चलना

4 अपनी जान,माल और अपने वक़्त को बिना किसी दुनियावी नफ़े के सिर्फ अल्लाह के लिए दीन के काम में खर्च करना

5 फ़राइज़ व वाजिबात के साथ साथ सुन्नते नबवी और इत्तेबाए सहाबा की बे हद पाबन्दी करना

6 ईमान,नमाज़,इल्म व ज़िक्र,इकरामे मुस्लिम,इख़्लासे निय्यत और दावत व तबलीग़ की मेहनत को हर आम व ख़ास तक पहुचाना

7 उलमा की रहनुमाई में रह कर काम करना और उनका हद दर्जे तक एहतेराम करना

8 तबलीगी सफ़र में मसाजिद को मुकम्मल आदाब के साथ अपनी क़याम गाह बनाना

9 हर काम आपसी मशवरे से तय करना

10 अपना एक अमीर बना कर उसकी मान कर चलना

ये अहम उमूर है जिन के सबब तबलीगी जमात को तक़वीयत और कुबूलियत हासिल है

*तबलीगी जमात की मुखालिफ़त*

आज कल तबलीगी जमाअत की मुखालिफत भी की जाने लगी है बात साफ़ है जब पेड़ पर फल आने लगते है तो पत्थर भी फेंके जाते है लेकिन अफ़सोस है उन लोगो पर जो अलल एलान इस की मुखलिफत करते है। शायद वो इस तहरीक के आलमी नताइज से ना वाकिफ है। अगर इस तहरीक से ताल्लुक रखने वाले कुछ लोग कम इल्मी की वजह से गलतियां करते है या बे उसूली से काम ले रहे है तो इस का मतलब ये तो नहीं के सिरे से इस तहरीक को ही बदनाम करना शुरू करदे।

हमारे इस मुखालीफती इक़दाम से जहाँ दूसरे बातिल फिरके हमारे मसलक का मज़ाक उड़ाते है और हमें आपसी इंतेशार का शिकार बताते है वही वो लोग भी बद ज़हन होते है जिनकी दिनी इस्लाह तबलीगी जमात की वजह से हुई है
..जिनको मस्जिद का पता ही इस तहरीक की मेहनत से मिला है
..जिनकी नमाज़ वगैरा इसी तबलीगी जमात में जा कर दुरुस्त हुई है

इस बात को समझये की अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने इस तबलीगी जमात की तहरीक के लिए अहले सुन्नत वल जमात का इंतेखाब किया और बे इंतेहा कुबूलियत से नवाज़ा ये हमारे लिए खुश किस्मती और फख्र की बात है

आज हिन्द व पाक और बैरूनी मुल्को में बातिल फिरको के ना पनपने और दब कर रह जाने की बड़ी वजह तबलीगी जमात का ज़ोर और इसका असर है

*तबलीगी काम से दुष्मनी रखने वालों का अंजाम*

अल्लाह मुझे माफ करे,अगर कीसी को तबलीग का काम पसंद नहीं है तो कोई बात नही,लेकीन *ईस काम से दुष्मनी और नफरत न करे* मैने कई लोगोंको ऐसा करने पर तबाह और बर्बाद होते देखा है ऐसा खौफनाक अंजाम देखा है के बदन पर रोंगटे खडे होते है अल्लाह हम सब की हिफाज़त फरमायें
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त इस तहरीक की और इस से मुनसलिक काम करने वालो की हिफ़ाज़त फरमाये
आमीन

⭐DAWAT O TABLIGH⭐
Ummat ki zimmedari
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03/12/2020

"बेच कर तलवारे खरीद लिए मुसल्ले हमने।
बेटियां लुटती रही और हम सजदे करते रहे।"

जब भी आलिम बयान देते है। मुसलमानो पर हो रहे ज़ुल्म के बारे में पूछो तो एक ही जवाब देते है। ये सब हमारे आमाल की सजा है।नमाज़ पढ़ो और रोज़े रखो। पर कभी ये नहीं बताते के इस

*ज़ुल्म के खिलाफ लड़ने के लिए इस्लाम ने क्या तरीक़ा बताया है*।

जब हम नमाज़ के बाद रोज़ी में
*बरकत की दुआ करते है*
तो क्या आसमान से नोटों की बारिश शुरू हो जाती है ? नहीं हमे *दुआ के बाद दुकान, ऑफिस, नौकरी या कारखाने जाकर रोज़ी में बरकत के लिए मेहनत करनी पड़ती है*।

तब जाकर हमे रोज़ी मिलती है। इसी तरह ज़ुल्म के खात्मे के लिए दोनों काम ज़रूरी है नमाज़, रोज़ा और ज़ालिम का मुकाबला

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) ने फरमाया "उंट को बांधो और अल्लाह पर तवक्कल करो।"उंट को खुला छोड़कर अल्लाह पर तवक्कल करने को नहीं कहा

*नमाज़ ज़रूर पढ़ना है लेकिन ज़ालिम के खिलाफ कोशिश भी जरूरी है क्यों के नमाज़ तो जंग में भी पढ़नी है।*

*अगर मूसल्ले पर ही सारे मसले हल हो जाते तो अल्लाह के रसूल और सहाबा कभी मैदाने जंग में ना उतरते*। अल्लाह ने कुरान में फरमाया है "जो कौम खुद की हालत ना बदलना चाहे अल्लाह भी उस कौम की हालत नहीं बदलता"
हज़रत अली का एक कौल है
" *जो कौम ज़ुल्म के खिलाफ आवाज नहीं उठाती वो कौम सिर्फ लाशे उठाती है*" हम मुसलमानो को ये आयात और कौल का मतलब अब अच्छे से समझ ने की जरूरत है।
👍

21/11/2020

*मुस्लिम बच्चियों घर से क्यों भागती है।?*
मुस्लिम महिलाएँ घर से भागकर गैर मुस्लिम लड़कों से शादीयां कर रही हैं और हम मुसलमान गफलत में पड़े हुवे हैं !

चेन्नई- 5,180
कोयंबटूर 1,224
तिरुचि- 1,470
मदुरै- 2,430
सलेम- 740
हैदराबाद- 3500
गुजरात-2500
महाराष्ट-6000
ओर बी स्टेट जहा 500से जयादा

कुल 20,000 से अधिक मुस्लिम लड़कियों ने पिछले 3 वर्षों में गैर मुस्लिम पुरुषों से शादी की है !
यह सिलसिला दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है !
इसके चंद सबब ये है।

1- अपने बच्चे की गैर इस्लामी तरीके से परवरिश करना,
2-उनको हमारी तहज़ीब शर्म व हया न सीखना।
3-इस्लाम की दिन तालीम बिल्कुल न देना।
सिर्फ दुनियावी तालिम देना जिस से दूसरे अन्य धर्मों की मालूमात पेट है और उनको अच्छा समझने लगते है !
2- अपने बच्चे को बहुत लाड़ प्यार देना हर खाहिश पूरी करना !

3- उन्हें बहुत महंगे महंगे मोबाइल बीगैर शर्त देना।
4- उन्हें बिगैर निगरानी के दूर शहरों के कॉलेजों में भेजना या उन्हें को एजूकेशन जहां लड़का लड़की एक साथ पढ़ते है ऐसे कॉलेजों में भेजना !

5- बेटी की शादी में बिला वजह देरी करना !

6- बेटी की दोस्त की मालूमात न करना के वह कहां जा रही है किस से मिल रही है ।

7-अपनी जवान बेटी पर बहुत अधिक विश्वास कि वे ऐसा नहीं करेंगी !
याद रखें जिन्होंने किया वो भी अपने माता-पिता के भरोसे मंद बच्चे थे।

8-कहीं आने जाने पर कोई रोक टोक न होना ओर ये कहना के हम नए ज़माने के लोग है हमने अपनी लड़की को खुली आज़ादी दी हे वह अपने फैसले खुद कर सकती है।ओर फिर एक दिन वो आता है के किसी के साथ भागने का फैसला भी वोह खुद करती है।

9-फिल्में ड्रामे टीवी,शो, ऑनलाइन, फेसबुक,चेटिंग मैसेंजर ने भी हमारी नस्लों को ने हायाई में दकेल दिया है।

इस तरह दिन के दुश्मनों का काम आसान हो जाता है और हमारी बहनें उनके जाल में फंस जाती है।
सब होशियार रहें।

*इसका सिर्फ एक ही इलाज़ है अपनी लड़की का निकाह जल्दी 18 और 19 साल मे हर हाल मे
कर देना चाहिए .
निकाह को आसान बनाएं*

https://twitter.com/sherasiya01234/status/1327502158619578368?s=09
15/11/2020

https://twitter.com/sherasiya01234/status/1327502158619578368?s=09

“अपनी ओलाद को #शेर की मिसाल देने की बजाए #भेड़िए की मिसाल दे.. ▪️क्यूकी भेड़िए अपने मां बाप जब बूढ़े हो जाते है तो वो उ....

10/11/2020

इलेक्शन कमीशन के मुताबिक अभी 12 बजे तक तीन राउण्ड की गिनती हुई है जबकि नतीजा 30 राउण्ड के बाद आयेगा इन्तज़ार करिये ये ऊपर नीचे का खेल चलता रहेगा #सब्र_कीजिए_सब्र_का_फल_मीठा_होता_है।
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07/11/2020

01/11/2020

कोई महिला सड़क पर शोर्ट कपड़ों में घूमती है, ये उसकी आज़ादी है... उसे हिजाब पहनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता... लेकिन सभी को शोर्ट कपड़ों में घूमने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता...।

ऐसे ही कोई महिला हिजाब का इस्तेमाल करे तो ये उसकी मर्ज़ी है, उसे हिजाब उतारने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता...।

फ्रांस का सेक्युलरिज़्म अलग तरह का है, वहाँ शोर्ट कपड़ों में घूमने की आज़ादी है, हिजाब पर पाबंदी है...।

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30/10/2020

जब मुगलों ने पूरे भारत को एक किया तो इस देश का नाम कोई इस्लामिक नहीं बल्कि "हिन्दुस्तान" रखा , हाँलाकि इस्लामिक नाम भी रख सकते थे !
कौन विरोध करता ?

जिनको इलाहाबाद और फैजाबाद चुभता है वह समझ लें कि मुगलों के ही दौर में "रामपुर" बना रहा तो "सीतापुर" भी बना रहा!

अयोध्या तो बसा ही मुगलों के दौर में !

आज के वातावरण में मुगलों को सोचता हूँ और मुस्लिम शासकों को सोचता हूँ तो लगता है कि उन्होंने मुर्खता की!

होशियार तो ग्वालियर का सिंधिया घराना था!
होशियार तो मैसूर का वाडियार घराना था!
होशियार तो जयपुर का राजशाही घराना था!
होशियार तो जोधपुर का भी राजघराना था!
टीपू सुल्तान हो या बहादुरशाह ज़फर शायद यह सब बेवकूफ लोग थे, जो अपने मुल्क़ के लिए चिथड़े चिथड़े हो गए, किसी को देश की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई और आज इन सबके वंशज भीख माँग रहे हैं!*

अँग्रेजों से मिल जाते तो वह भी अपने महल बचा लेते और अपनी रियासतें बचा लेते!*
वाडियार, जयपुर, जोधपुर, और सिंधिया राजघराने की तरह उनके भी वंशज आज ऐश करते!*
उनकी औलादें भी आज मंत्री और मुख्यमंत्री बनते!

यह आज का दौर है यहाँ "भारत माता की जय" और "वंदेमातरम" कहने से ही इंसान देशभक्त हो जाता है, चाहें उसका इतिहास देश से गद्दारी का ही क्युँ ना हो!

बहादुर शाह ज़फर ने जब 1857 के गदर में अँग्रैजों के खिलाफ़ पूरे देश का नेतृत्व किया और उनको पूरे देश के राजा रजवाड़ों तथा बादशाहों ने अपना नेता माना!
भीषण लड़ाई के बाद अंग्रेजों की छल कपट नीति से बहादुरशाह ज़फर पराजित हुए और गिरफ्तार कर लिए गये!

ब्रिटिश कैद में जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के कटे हुए सिर लेकर आए!
उन्होंने अंग्रेजों को जवाब दिया कि "हिंदुस्तान के बेटे अपने देश के लिए सिर कुर्बान करके अपने बाप के पास इसी अंदाज में आया करते हैं"!

शायद बेवकूफ़ थे बहादुरशाह ज़फर, जिन्होंने अपने मुल्क़ के लिए खुद को और अपने जवान बेटों को कुरबान कर दिया, और आज उसका नतीजा कि उनकी औलादें भीख माँग कर गुज़ारा कर रहे हैं!

अपने मुल्क़ हिन्दुस्तान की ज़मीन में दफन होने की उनकी चाह भी पूरी ना हो सकी और रंगून के कैदखाने में ही अपनी आखिरी सांस ली, और फिर वर्मा की मिट्टी में दफन कर दिए गये!

अंग्रेजों ने उनकी कब्र की निशानी भी ना छोड़ी और मिट्टी बराबर करके फसल उगा दी, बाद में एक खुदाई में उनका वहीं से कंकाल मिला और फिर शिनाख्त के बाद उनकी क़ब्र बनाई गयी!

सोचिए कि आज "बहादुरशाह ज़फर" को कौन याद करता है ?
क्या मिला उनको देश के लिए अपने खानदान की कुर्बानी से ?
7 नवंबर 1862 को उनकी मौत हुई थी!
लेकिन क्या किसी ने कभी उनको श्रृद्धान्जली भी दी ?
क्या किसी ने उनको याद भी किया
क्या देश उनकी याद मनाता है?
नहीं.... किसी ने भी उनको श्रृद्धान्जली नहीं दी और उनको याद भी नहीं किया!
जानते हो क्यों याद नहीं करते?
क्योंकि वह मुस्लमान थे!

ऐसा इतिहास अगर देश के लिए बलिदान किसी संघी ने दिया होता तो अब तक सैकड़ों शहरों और रेलवे स्टेशनों का नाम उसके नाम पर हो गया होता!
लेकिन क्या उनके नाम पर कुछ हुआ ?
नहीं ना....

इसीलिए तो कह रहा हूँ कि उस समय अंग्रेजों से मिल जाना था !
अगर "बहादुरशाह ज़फर" ऐसा करते तो ना उन्हें क़ैद मिलती ना ही कैदखाने में मौत मिलती!
और ना ही यह ग़म लिखते जो उन्होंने रंगून के क़ैदखाने में लिखा था!
वह यह है!
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लगता नहीं है जी मेरा,
उजड़े दयार में!
किस की बनी है,
आलम-ए-नापायदार में!
बुलबुल को बागबां से,
न सय्याद से गिला!
किस्मत में क़ैद लिखी थी,
फसल-ए-बहार में!
कह दो इन हसरतों से,
कहीं और जा बसें!
इतनी जगह कहाँ है,
दिल-ए-दाग़दार में!
एक शाख़ गुल पे बैठ के,
बुलबुल है शादमान!
कांटे बिछा दिए हैं,
दिल-ए-लाल-ए-ज़ार में!
उम्र-ए-दराज़ माँग के,
लाये थे चार दिन!
दो आरज़ू में कट गये,
दो इन्तेज़ार में!
दिन ज़िन्दगी के ख़त्म हुए,
शाम हो गई!
फैला के पांव सोएंगे,
कुंज-ए-मज़ार में!
कितना है बदनसीब "ज़फर",
दफ़्न के लिए!
दो गज़ ज़मीन भी न मिली,
कू-ए-यार में"

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Rajkot
360001

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