27/05/2026
मुनाफा उनका, महंगाई जनता की — आखिर कब मिलेगी राहत?
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देश में पेट्रोल और डीजल केवल ईंधन नहीं, बल्कि आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी की धड़कन बन चुके हैं। खेतों में ट्रैक्टर से लेकर शहरों में बाइक, बस, ट्रक और उद्योगों तक हर व्यवस्था तेल पर निर्भर है। यही कारण है कि जब पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ती हैं, तो उसका असर केवल वाहन मालिकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सब्जियों, राशन, परिवहन, निर्माण सामग्री और लगभग हर जरूरी वस्तु की कीमतों पर दिखाई देता है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब देश की सरकारी तेल कंपनियां हजारों करोड़ रुपये का रिकॉर्ड मुनाफा कमा रही हैं, तब आम जनता को राहत क्यों नहीं मिलती?
हाल के वर्षों में इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियों ने लगातार भारी मुनाफा दर्ज किया है। उपलब्ध सार्वजनिक आंकड़ों के अनुसार इंडियन ऑयल ने 2024-25 में लगभग 45 हजार करोड़ रुपये से अधिक का लाभ कमाया। भारत पेट्रोलियम ने लगभग 28 हजार करोड़ रुपये और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने करीब 15 हजार करोड़ रुपये का लाभ दर्ज किया। केवल जनवरी से मार्च 2026 की तिमाही में भी इन कंपनियों का संयुक्त मुनाफा हजारों करोड़ में रहा।
इतने बड़े लाभ के बावजूद आम नागरिक को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वैसी राहत नहीं दिखती जिसकी उम्मीद की जाती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम कम होने पर भी घरेलू कीमतें धीरे-धीरे घटती हैं, लेकिन जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में थोड़ी तेजी आती है, कंपनियां और सरकारें “वैश्विक परिस्थितियों” का हवाला देकर कीमतें बढ़ाने लगती हैं। यही असंतुलन लोगों के भीतर नाराजगी पैदा करता है।
सरकार का पक्ष भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। केंद्र सरकार का तर्क है कि तेल पर लगने वाले टैक्स से देश के इंफ्रास्ट्रक्चर, सड़क, रेलवे, गरीब कल्याण योजनाओं और विकास कार्यों के लिए बड़ी राशि मिलती है। सरकार यह भी कहती है कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार बेहद अस्थिर है और कीमतों को स्थिर बनाए रखने के लिए कई बार कंपनियों को घाटा भी सहना पड़ता है।
सरकार समर्थकों का यह भी कहना है कि कोरोना काल और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसी परिस्थितियों में भारत ने कई विकसित देशों की तुलना में बेहतर ढंग से ईंधन आपूर्ति बनाए रखी। साथ ही उज्ज्वला योजना, सड़क निर्माण और लॉजिस्टिक नेटवर्क विस्तार जैसे कार्यों के लिए भी राजस्व की जरूरत होती है।
लेकिन विपक्ष और आम जनता के सवाल भी कम गंभीर नहीं हैं। आलोचकों का कहना है कि जब कंपनियां रिकॉर्ड लाभ में हैं, तब जनता पर इतना टैक्स बोझ क्यों? पेट्रोल और डीजल पर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए टैक्स कई बार मूल ईंधन कीमत से भी अधिक हो जाते हैं। जनता पूछती है कि अगर कंपनियां लगातार लाभ में हैं तो फिर कीमतों में स्थायी राहत क्यों नहीं दी जाती?
एक बड़ा आरोप यह भी है कि तेल कंपनियां अक्सर “नुकसान” का मुद्दा केवल तब उठाती हैं जब कीमत बढ़ानी होती है। लेकिन जब रिकॉर्ड लाभ होता है, तब आम लोगों के हित में कीमत कम करने की चर्चा बहुत कम होती है। यही कारण है कि लोगों के बीच यह भावना मजबूत हो रही है कि मुनाफा निजी नहीं, बल्कि जनता के हित में भी इस्तेमाल होना चाहिए।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत जैसे विकासशील देश में ईंधन की कीमतों का सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। ट्रांसपोर्ट महंगा होगा तो फल-सब्जी से लेकर सीमेंट और दवा तक सब कुछ महंगा होगा। इसका सबसे ज्यादा असर मध्यम वर्ग और गरीब तबके पर पड़ता है।
तेल कंपनियों की कार्यप्रणाली को लेकर पारदर्शिता की मांग भी बढ़ रही है। लोग जानना चाहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, रिफाइनिंग लागत, टैक्स और कंपनियों के वास्तविक मुनाफे का गणित क्या है। यदि कंपनियां सार्वजनिक क्षेत्र की हैं, तो जनता को भी यह जानने का अधिकार है कि आखिर मूल्य निर्धारण किस आधार पर किया जाता है।
आज जरूरत केवल सरकार या कंपनियों की आलोचना करने की नहीं, बल्कि संतुलित और जवाबदेह व्यवस्था बनाने की है। सरकार को चाहिए कि जब कंपनियां असाधारण लाभ में हों, तब टैक्स राहत या कीमत नियंत्रण के जरिए जनता को सीधा फायदा मिले। वहीं तेल कंपनियों को भी यह समझना होगा कि उनका सामाजिक दायित्व केवल लाभ कमाना नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और जनता के हितों के प्रति जवाबदेह रहना भी है।
भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन विकास तभी सार्थक माना जाएगा जब उसका लाभ आम नागरिक तक पहुंचे। अगर जनता लगातार महंगाई का बोझ उठाती रहे और कंपनियां केवल मुनाफे के आंकड़े दिखाती रहें, तो यह असंतुलन लंबे समय तक भरोसे को कमजोर कर सकता है।
अब समय आ गया है कि ईंधन मूल्य निर्धारण पर खुली बहस हो, पारदर्शिता बढ़े और जनता को यह भरोसा मिले कि देश की आर्थिक नीतियां केवल आंकड़ों के लिए नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए हैं।
सवाल केवल तेल का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें मुनाफा ऊपर जाता है और बोझ हमेशा जनता के हिस्से आता है।
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