सहरसा का राजनीतिक दंगल

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ये कतार भी कितनी तेज है
अपने हिस्से का पानी पीके लबरेज़ है,

दोपहिया चौकरी से जब सीचे खेत है
फसल खिल गयी तो सबकी कचिया भी तेज है,

ढकिया और कुदाल दोनो का एक पेट है
सबके ढाचे को एक सांचे मे भरने की लेट है।।

04/08/2026

बांकीपुर उपचुनाव में पीके की जीत के मायने:

१. कल भाजपा की हार में फिर एक बार लोकतंत्र की जीत हुई, यह साफ़ संदेश की राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा साथ ही कोई भी किला अभेद नहीं होता!!!

२. आपके पास भले ही एक ऐसी सीट थी जो ५ बार से आपके नेता जीत रहे थे, कतई मतलब नहीं की आप वहाँ से किसी ऐसे बच्चे को चुनाव लड़वा दें जो नाकाबिल हो!

३. बिहार को फिर से बधाई की हमने एक काबिल इंसान को विधानसभा में भेजा।

४. बीजेपी का घमंड टूटना जरूरी था, आप जानता और जनमत के साथ हमेशा खिलवाड़ नहीं कर सकते!

५. हम आशा करेंगे की पीके, आरजेडी और कांग्रेस के साथ सुर ना मिलाएँ और जानता ने आपको जो प्यार दिया उसको एक हथियार की तरह इस्तेमाल करके अगले चुनाव में बिहार को एक ऐसा विकल्प देंगे की बिहार आपको और भी मजबूती दे।

६. भले ही जन सुराज का खाता नहीं खुला था लेकिन बिहार ने आपको फिर से मौक़ा दिया है इसको हाथ से जाने ना दें ।

सहरसा का राजनीतिक दंगल अपने आप में ख़ास है।दंगल के लिए सिर्फ़ अखाड़ा नहीं, मिट्टी भी चाहिए—और वह मिट्टी ऐसी हो कि सही सा...
12/07/2026

सहरसा का राजनीतिक दंगल अपने आप में ख़ास है।
दंगल के लिए सिर्फ़ अखाड़ा नहीं, मिट्टी भी चाहिए—और वह मिट्टी ऐसी हो कि सही साँचे में ढल जाए तो अमृत पिलाने वाली सुराही बन जाए, लेकिन अगर वही मिट्टी साँचे से इंकार कर दे, तो फूटा हुआ घड़ा बनकर न खुद काम आए, न किसी की प्यास बुझा पाए।
राजनीति भी कुछ ऐसी ही है—चरित्र, विचार और अनुशासन का साँचा मिले तो समाज का निर्माण करती है; और साँचा टूट जाए, तो केवल शोर, स्वार्थ और बिखराव छोड़ जाती है।

कहते हैं, एक राज्य था—जहाँ बरसात सिर्फ़ बादलों से नहीं, व्यवस्थाओं की कमज़ोरियों से भी होती थी।ज्यों ही सावन दस्तक देता,...
12/07/2026

कहते हैं, एक राज्य था—जहाँ बरसात सिर्फ़ बादलों से नहीं, व्यवस्थाओं की कमज़ोरियों से भी होती थी।
ज्यों ही सावन दस्तक देता, नगर की सड़कें अपना अस्तित्व भूलकर तालाबों में बदल जातीं। राहगीर मुसाफ़िर नहीं, नाविक नज़र आने लगते। शहर के बीचों-बीच एक महायज्ञ चल रहा था—रेल ओवरब्रिज (ROB) का निर्माण। उद्देश्य था भविष्य को आसान बनाना, मगर वर्तमान ने मानो अपनी साँसें रोक ली थीं।
मुख्य सड़कें धूल, कीचड़, गड्ढों और जाम के हवाले थीं। हर मोड़ पर धैर्य की परीक्षा होती, हर सफ़र मंज़िल से पहले संघर्ष बन जाता।
फिर भी उस राज्य के लोग अजीब थे—शिकायत करते, मुस्कुराते, कीचड़ पार करते और अगले दिन फिर उसी रास्ते निकल पड़ते। शायद उन्हें भरोसा था कि हर अधूरा पुल एक दिन पूरा होगा, और हर जलजमाव के बाद कोई न कोई राह ज़रूर निकलेगी।
फ़िलहाल, उस राज्य की सबसे बड़ी नदी किसी नक्शे में नहीं, उसकी सड़कों पर बह रही थी।

आपका ये कर्ज हम कैसे चुका पाएँगे मैडम - सहरसा नरक निगम की महान जनता 🙏🏻
11/07/2026

आपका ये कर्ज हम कैसे चुका पाएँगे मैडम
- सहरसा नरक निगम की महान जनता 🙏🏻

16/06/2026

Democracy often begins with inspiring promises and the hope of a brighter future. Yet too frequently the outcome is disappointing: at both national and regional levels, parties chase power, and once in office they prioritize their own interests over the needs of the people. We rely on fascinating promises and expect an amazing future, but they’re all the same—greedy for power, and once they get a chance, they start digging us.

15/06/2026

यह लड़ाई जात-धर्म, अच्छे-बुड़े से कहीं ज़्यादा करोड़ों के कोचिंग बिजनेस में अपने वर्चस्व की है! और वर्चस्व की लड़ाई जब भी हुई है और आगे जब भी होगी तो परिणाम लाल ही होगा!

इन दोनों ही संस्थानों के संचालक बहुत काबिल हैं इसमें कोई दोराय नहीं है, इनके अब तक के दिए हुए रिजल्ट्स इस बात का सुबूत हैं।जिनके ना जाने कितने ही स्टूडेंट्स आज बिहार का लॉ एंड ऑर्डर संभालते हैं, वो दोनों कैसे ये बच्चों की तरह मैं महान तो मैं महान की लड़ाई में कूद सकते हैं?

बिहार पे बाहर के लोगों का भरोसा बन ही रहा था की किसी की नज़र लग गई। दु:ख बस इस बात का है की इस खोखली वर्चस्व की लड़ाई में फिर से हमारे बिहार के बच्चे हार गए। सस्ती और सटीक तैयारी की उम्मीद में आए ये बच्चे अपने सपनों को पंख लगाने ही वाले थे की एक लड़ाई ने इनके पंख कुतर दिए। हम बस यही प्रार्थना कर सकते हैं की ये जो भी हुआ और हो रहा है वो अब ख़त्म हो और हमारा बिहार फिर से अपनी योग्यताओं को साबित करे!

बंगाली बाजार के दुकान वालो के सामान बाहर रखने के कारण बचा हुआ रास्ता आवाजाही के लिए बाधित हो रहा है, महिलाएं कीचर मे साम...
05/01/2026

बंगाली बाजार के दुकान वालो के सामान बाहर रखने के कारण बचा हुआ रास्ता आवाजाही के लिए बाधित हो रहा है, महिलाएं कीचर मे सामान और बच्चे को ले जाने को विवश है, दुकानदार को फूटपाथ को भी इस तरह अतिक्रमण करके रखना जायज है, यातायात बाधित करके अपनी दुकान सजाना सही है, ट्रैफिक पोलिस, नगर निगम इस कुव्यवस्था पर संज्ञान ले

नए साल की शुरुआत में सहरसा ने दो संकेत एक साथ दे दिए हैं।एक तरफ़ राजनीति की ऊँट ने करवट बदली है,तो दूसरी तरफ़ नए साल के ...
01/01/2026

नए साल की शुरुआत में सहरसा ने दो संकेत एक साथ दे दिए हैं।
एक तरफ़ राजनीति की ऊँट ने करवट बदली है,
तो दूसरी तरफ़ नए साल के शुरू होते ही
सहरसा का प्रसिद्ध रक्तकाली चौसठ योगिनी मेला भी सज-धज गया है।
सवाल यह है—
यह मेला सहरसा को नए साल में क्या देकर जाएगा?
आज मेले में
फुहर गीत बजते हैं,
भीड़ उमड़ती है,
रील बनाने के लिए
अटपटे, फटे कपड़े पहनकर
नाचते लड़के दिखते हैं।
मगर सोचने वाली बात यह है कि
क्या मेला सिर्फ़ प्लास्टिक के सामान खरीदने की मंडी,
दस-पंद्रह लोहे के झूले और एक जलपरी को देखते रह जाना चाहिए?
मेला किसी शहर की पहचान होता है।
वह जगह होनी चाहिए जहाँ सहरसा के स्थानीय प्रतिभा की
कला, लोकगीत, नृत्य, शिल्प और संस्कृति
दिखाई दे।
नए साल में सहरसा की राजनीति भी मेला भी
तभी चलेगा जब स्थानीय चेहरा उसे ज़मीन पर उतारेगा।
निष्कर्ष साफ़ है—
न नए साल में राजनीति पुरानी करवट पर रहेगी,
न ही मेला यूँ ही चलता रह सकता है।
स्थानीय जीती हुई पार्टी हो
या किसी भी संस्था, दल के कार्यकर्ता, विचारक और संयोजक—
सबको इस दिशा में सोचना होगा
कि मेला सिर्फ़ भीड़ नहीं,
बल्कि सहरसा की कला-संस्कृति दिखाने का ज़रिया बने।
क्योंकि जिस शहर का मेला मज़बूत होता है,
उस शहर की पहचान भी मज़बूत होती है—
और शायद
राजनीति की ऊँट भी उसी करवट बैठती है।
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