01/01/2026
नए साल की शुरुआत में सहरसा ने दो संकेत एक साथ दे दिए हैं।
एक तरफ़ राजनीति की ऊँट ने करवट बदली है,
तो दूसरी तरफ़ नए साल के शुरू होते ही
सहरसा का प्रसिद्ध रक्तकाली चौसठ योगिनी मेला भी सज-धज गया है।
सवाल यह है—
यह मेला सहरसा को नए साल में क्या देकर जाएगा?
आज मेले में
फुहर गीत बजते हैं,
भीड़ उमड़ती है,
रील बनाने के लिए
अटपटे, फटे कपड़े पहनकर
नाचते लड़के दिखते हैं।
मगर सोचने वाली बात यह है कि
क्या मेला सिर्फ़ प्लास्टिक के सामान खरीदने की मंडी,
दस-पंद्रह लोहे के झूले और एक जलपरी को देखते रह जाना चाहिए?
मेला किसी शहर की पहचान होता है।
वह जगह होनी चाहिए जहाँ सहरसा के स्थानीय प्रतिभा की
कला, लोकगीत, नृत्य, शिल्प और संस्कृति
दिखाई दे।
नए साल में सहरसा की राजनीति भी मेला भी
तभी चलेगा जब स्थानीय चेहरा उसे ज़मीन पर उतारेगा।
निष्कर्ष साफ़ है—
न नए साल में राजनीति पुरानी करवट पर रहेगी,
न ही मेला यूँ ही चलता रह सकता है।
स्थानीय जीती हुई पार्टी हो
या किसी भी संस्था, दल के कार्यकर्ता, विचारक और संयोजक—
सबको इस दिशा में सोचना होगा
कि मेला सिर्फ़ भीड़ नहीं,
बल्कि सहरसा की कला-संस्कृति दिखाने का ज़रिया बने।
क्योंकि जिस शहर का मेला मज़बूत होता है,
उस शहर की पहचान भी मज़बूत होती है—
और शायद
राजनीति की ऊँट भी उसी करवट बैठती है।
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