RTI Activist Sandeep Sharma Sirsa

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RTI Activist Sandeep Sharma Sirsa, RTI अधिनियम 2005 कानून के तहत RTI लगवाने के लिए या इस कानून तहत किसी भी तरह कानूनी जानकारी के लिए इस मोबाइल नंबर पर 7015710500 संपर्क कर सकते हैं

08/07/2026
भ्रष्टाचार जांच एजेंसियां RTI से बाहर नहीं – सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसलासुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्ट...
08/07/2026

भ्रष्टाचार जांच एजेंसियां RTI से बाहर नहीं – सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियों को केवल सरकारी अधिसूचना के आधार पर RTI (सूचना का अधिकार) से बाहर नहीं रखा जा सकता।

मध्य प्रदेश की स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट (SPE) ने खुद को "खुफिया एवं सुरक्षा संगठन" बताकर सूचना देने से इनकार किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SPE का मुख्य कार्य भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों की जांच करना है, न कि खुफिया या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कार्य। इसलिए इसे RTI से छूट नहीं मिल सकती।

कोर्ट ने राज्य सरकार की अधिसूचना को अवैध घोषित करते हुए सूचना उपलब्ध कराने का आदेश बरकरार रखा।

संदेश स्पष्ट है—
लोकतंत्र में पारदर्शिता सर्वोपरि है। भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियां भी कानून से ऊपर नहीं हैं। सरकारें किसी एजेंसी को मनमाने ढंग से RTI के दायरे से बाहर नहीं कर सकतीं।

यह फैसला पारदर्शिता, जवाबदेही और सूचना के अधिकार को और अधिक मजबूत करता है।

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया भ्रष्टाचार एजेंसी आरटीआई के दायरे से बाहर नहीं उन्हें भी आरटीआई के तहत कानून नियम अन...
08/07/2026

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया भ्रष्टाचार एजेंसी आरटीआई के दायरे से बाहर नहीं उन्हें भी आरटीआई के तहत कानून नियम अनुसार जानकारी देनी होगी सुप्रीम कोर्ट का 2026 का बड़ा फैसला भ्रष्टाचार एजेंसी अभी आईटीआई के दायरे में

क्या लोकतंत्र का 'स्वर्ण काल' वास्तव में प्रेस का गला घोंटने की शुरुआत थी? 🚩​1950 में संविधान लागू हुआ, लेकिन मज़ाक देखिए...
08/07/2026

क्या लोकतंत्र का 'स्वर्ण काल' वास्तव में प्रेस का गला घोंटने की शुरुआत थी? 🚩

​1950 में संविधान लागू हुआ, लेकिन मज़ाक देखिए—मात्र 15 महीने के भीतर 1951 में नेहरू सरकार ने पहला संविधान संशोधन लाकर प्रेस की आज़ादी पर 'प्रशासनिक शिकंजा' कस दिया। 'लोक व्यवस्था' और 'सुरक्षा' के नाम पर जो बेड़ियां डाली गईं, उन्होंने ब्रिटिश काल के राजद्रोह कानून (124A) और ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट को नई ज़िंदगी दे दी।

​'निर्भीक इंडिया' का स्पष्ट मत है कि यह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का सबसे पहला और गहरा विश्वासघात था। सत्ता चाहे किसी की भी हो, उसे तीखे सवाल और आलोचना कभी बर्दाश्त नहीं होती। जिस प्रेस को लोकतंत्र का पहरेदार होना था, उसे आज नौकरशाही और पुलिस प्रशासन का बंधुआ बना दिया गया है।

​अगर आज अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बंदिशों का रोना रो रहे हो, तो याद रखना—इस दमन की नींव उसी दौर में रखी गई थी जिसे लोग 'स्वर्ण काल' कहते हैं। सच कड़वा है, लेकिन इसे जानना और स्वीकार करना आज़ाद भारत के हर नागरिक का फर्ज है।

Rahul Gandhi और Indian National Congress की ही गलती है जिससे प्रेस को कमजोर बनाया गया जिसका फायदा Bharatiya Janata Party (BJP) की सरकार उठा रही है Supreme Court Of India को पता है कि 1946 से 1949 ke बीच ऐतिहासिक संवैधानिक गलती की गई है लेकिन चुप्पी है
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"लोगों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है, विरोध करने पर केस दर्ज किए जा रहे हैं"बॉम्बे हाई कोर्ट जज जस्टिस माधव जाम...
06/07/2026

"लोगों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है, विरोध करने पर केस दर्ज किए जा रहे हैं"

बॉम्बे हाई कोर्ट जज जस्टिस माधव जामदार

 #सुप्रीम_कोर्ट का अहम फैसला: भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियां RTI के दायरे से बाहर नहीं!हाल ही में भारत के सर्वोच...
06/07/2026

#सुप्रीम_कोर्ट का अहम फैसला: भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियां RTI के दायरे से बाहर नहीं!
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 15 जून 2026 को स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट (SPE) बनाम कामता प्रसाद मिश्रा और अन्य (क्रिमिनल अपील नंबर 3743/2024) मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया है। यह फैसला सूचना के अधिकार (RTI) और प्रशासनिक पारदर्शिता की दिशा में एक बड़ा कदम है।
क्या था पूरा मामला?
कटनी में टाउन इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत कामता प्रसाद मिश्रा पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत एक ट्रैप केस दर्ज किया गया था।
उन्होंने RTI अधिनियम, 2005 की धारा 6(1) के तहत अपने खिलाफ अभियोजन (prosecution) की स्वीकृति दिए जाने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी मांगी थी।
मध्य प्रदेश की स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट (SPE) ने जानकारी देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) की 25 अगस्त 2011 की अधिसूचना के अनुसार उन्हें RTI की धारा 24(4) के तहत "खुफिया और सुरक्षा संगठन" के रूप में इस अधिनियम से छूट प्राप्त है।
SPE ने यह भी तर्क दिया कि RTI अधिनियम की धारा 8(1)(h) के तहत इस जानकारी के खुलासे से जांच प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण:
न्यायालय के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि क्या SPE को RTI अधिनियम की धारा 24(4) के तहत "खुफिया और सुरक्षा (Intelligence and Security) संगठन" माना जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए पाया कि SPE का क्षेत्राधिकार सीमित है और इसका मुख्य कार्य भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम तथा भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 409, 420 और अध्याय XVIII के तहत दर्ज भ्रष्टाचार व आर्थिक अपराधों की जांच करना है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चूंकि SPE का कार्य 'खुफिया' और 'सुरक्षा' से संबंधित नहीं है, इसलिए यह RTI अधिनियम की धारा 24(4) के तहत छूट पाने का हकदार नहीं है।
🎯 अंतिम निर्णय (Final Verdict):
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार की 25 अगस्त 2011 की उस अधिसूचना को अवैध (bad in law) मानते हुए रद्द कर दिया, जो SPE को RTI के दायरे से पूरी तरह बाहर रखती थी।
कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें कामता प्रसाद मिश्रा को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल SPE पर लागू होगा, राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो पर इसका प्रभाव अभी जांचा नहीं गया है।
इस प्रकार, न्यायालय ने SPE की क्रिमिनल अपील को खारिज कर दिया।
निष्कर्ष:
यह आदेश स्पष्ट करता है कि राज्य सरकारें भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियों को मनमाने ढंग से 'खुफिया और सुरक्षा संगठन' का दर्जा देकर सूचना के अधिकार (RTI) से नहीं बचा सकती हैं।

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