17/07/2026
**"अंतिम वादा"**
"जिस दिन अर्थी उठी... चार दोस्तों में से तीन ही पहुँचे।"
कॉलेज के चार पक्के दोस्त थे—**आर्यन, ईशान, समीर और कबीर।**
कॉलेज के आखिरी दिन, हॉस्टल की छत पर चारों ने एक वादा किया था—
*"जिसकी भी मौत पहले होगी... बाकी तीन उसकी अर्थी को कंधा देंगे।"*
तब सब ठहाके मारकर हँसे थे, किसी ने सोचा भी नहीं था कि ये मज़ाक एक दिन इतना कड़वा सच बन जाएगा।
समय का पहिया घूमा। ज़िंदगी ने सबको अपनी-अपनी दौड़ में लगा दिया।
कोई विदेश की ऊँची इमारतों में खो गया, कोई कॉर्पोरेट की चकाचौंध में, कोई सरकारी फाइलों के बोझ तले दब गया, और **कबीर** अपने शहर में ही रहकर परिवार की छोटी सी विरासत सहेजने लगा।
शुरू-शुरू में रोज़ वीडियो कॉल होते थे। फिर महीने में एक बार। फिर धीरे-धीरे वो बातें सिर्फ़ WhatsApp ग्रुप में एक-दूसरे के स्टेटस पर "❤️" या "Fire Emoji" भेजने तक सिमट गईं। दोस्ती अब 'लाइफ' से 'लाइक' में बदल गई थी।
एक रात, सन्नाटे को चीरते हुए उस पुराने ग्रुप में एक मैसेज आया—
**"दोस्तों... कबीर अब नहीं रहा।"**
मैसेज किसी अनजान नंबर से था। सन्नाटा ऐसा कि तीनों दोस्तों के फोन हाथ से छूट गए। समीर ने काँपते हाथों से कॉल किया। दूसरी तरफ एक भारी आवाज़ आई—
"भैया... कबीर भाई की अंतिम यात्रा सुबह दस बजे है। आप लोग आ सकें तो देख लीजिए..."
अगली सुबह, श्मशान घाट पर तीन दोस्त खड़े थे। सफेद चादर में लिपटा कबीर सामने था। वो चेहरा आज भी वही था, बस वो शरारती चमक हमेशा के लिए बुझ चुकी थी। कबीर के बूढ़े पिता एक पुराना, धूल लगा लकड़ी का डिब्बा लेकर आए। काँपते हुए बोले—
"ये... ये तुम लोगों के लिए रख गया था।"
डिब्बे में चार लिफ़ाफ़े थे। हर दोस्त के नाम एक। सबने अपने हाथ से अपना नाम का लिफ़ाफ़ा उठाया और काँपते हाथों से खोला।
उसमें लिखा था—
*"अगर तुम ये पढ़ रहे हो, तो मैंने अपना वादा निभाया है। अब तुम्हारी बारी है। लेकिन मेरी अर्थी को कंधा देने से पहले... अपने फोन की गैलरी खोलना। पिछले तीन सालों में हमारी एक भी ऐसी फोटो ढूँढना, जिसमें हम चारों एक साथ हों।"*
तीनों ने मोबाइल निकाले। गैलरी भरी हुई थी—ऑफिस की मीटिंग्स, क्लाइंट्स की तस्वीरें, नई गाड़ियों की चमक, और बच्चों की स्कूल पिकनिक। **लेकिन कबीर के साथ ली गई आख़िरी फोटो पाँच साल पुरानी थी।**
आगे लिखा था—
*"तुमने मुझे कभी भुलाया नहीं, बस हर बार 'अगली बार मिलेंगे' कहकर टाल दिया। मैं भी यही कहता रहा—'कोई बात नहीं, काम ज़रूरी है।' हम सब ज़िंदगियों की दौड़ में इतने तेज़ भाग रहे थे कि भूल ही गए कि दौड़ना किसके लिए था।"*
आर्यन, ईशान और समीर के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। पत्र में आखिरी लाइन लिखी थी—
*"मेरी चिता जलाने से पहले, एक सेल्फी ले लेना। वही चार लोगों वाली... जिसमें इस बार मैं जवाब नहीं दे पाऊँगा। इसे कहीं पोस्ट मत करना, बस जब भी काम तुम्हें अपनों से दूर ले जाने लगे, उस फोटो को देख लेना। तुम्हें समझ आ जाएगा कि हम क्या खो रहे हैं।"*
श्मशान में पहली बार... तीन सफल दोस्त एक अर्थी के पास खड़े होकर फूट-फूट कर रो रहे थे। उन्होंने आखिरी बार कबीर के साथ वो सेल्फी ली। उस फोटो में कोई मुस्कुरा नहीं रहा था, लेकिन उसमें ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच कैद हो गया था।
**छह महीने बाद:**
तीनों दोस्तों ने एक रस्म बना ली। हर महीने एक दिन—सिर्फ़ और सिर्फ़ दोस्ती के नाम। फोन साइलेंट, ऑफिस बंद, और कोई दुनियादारी नहीं।
क्योंकि उन्हें समझ आ गया था—**मौत दोस्ती नहीं तोड़ती, हमारा "यार, अगले महीने मिलते हैं" वाला बहाना दोस्ती को धीरे-धीरे मार देता है।**
**संदेश:**
इंसान इसलिए नहीं रोता कि उसका दोस्त चला गया... वह इसलिए रोता है क्योंकि उसे याद आता है कि जिससे मिलने के लिए उसके पास पूरी ज़िंदगी थी, उसके लिए उसने कभी एक दिन भी नहीं निकाला। क्योंकि मौत का समय तय नहीं होता, लेकिन पछतावा पूरी उम्र साथ रहता है।
**अभी वक़्त है... फोन उठाइए और अपने उन दोस्तों को मैसेज कीजिए, जिन्हें आपने बहुत समय से 'टाल' रखा है।**
Regards
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