27/06/2026
भालेरी की करोड़ों की गाँधी आश्रम भूमि: इतिहास, संघर्ष और अस्तित्व की लड़ाई
भालेरी (तारानगर)।
गाँवों की पहचान केवल उनके मकानों और बाजारों से नहीं होती, बल्कि उन धरोहरों से होती है जो पीढ़ियों की स्मृतियों और इतिहास को अपने भीतर समेटे रहती हैं। भालेरी बस स्टैंड के बीचों-बीच स्थित गाँधी आश्रम (खादी भंडार) की भूमि ऐसी ही एक धरोहर है, जो आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।
राजस्व अभिलेखों के अनुसार खसरा संख्या 409/404 में लगभग 0.5058 हेक्टेयर (करीब 5058 वर्गमीटर) भूमि गाँधी आश्रम के नाम दर्ज है। वर्तमान बाजार मूल्य के हिसाब से यह भूमि भालेरी की सबसे मूल्यवान सार्वजनिक संपत्तियों में से एक मानी जा सकती है।
जब गाँधी आश्रम था ग्रामीण अर्थव्यवस्था का केंद्र
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि स्वतंत्रता सेनानी स्व. बनवारीलाल बेदी की प्रेरणा और महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपने को साकार करने के उद्देश्य से इस संस्था की स्थापना हुई थी। उस समय प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री ने इसका शुभारंभ किया था।
बचपन की यादों में बसता गाँधी आश्रम
भालेरी के बुजुर्ग और स्थानीय लोग बताते हैं कि आज जहां बेतरतीब खाली भूखंड दिखाई देता है, वहां कभी खुला परिसर हुआ करता था। बस स्टैंड के प्याऊ से लेकर साहवा रोड तक फैली इस भूमि के बीच से एक आम रास्ता निकलता था।
परिसर में चुने से बने तीन भवन थे, साहवा रोड की तरफ बाउंड्रीवाल थी और एक विशाल जांट (वृक्ष) लोगों के आकर्षण का केंद्र था। बच्चे वहां खेलते थे, राहगीर विश्राम करते थे और कई सामाजिक गतिविधियाँ होती थीं।
1990 से 2002 के बीच यहाँ बाहर से आने वाले लोगों के ठहरने की व्यवस्था भी होती थी। कभी सरकारी चारे की बिक्री की टाल लगी, तो कभी कृषि उत्पादों का अस्थायी भंडारण हुआ। यह स्थान गांव की सामाजिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र था।
फिर शुरू हुआ पतन
समय बदला और जमीनों के दाम बढ़ने लगे। धीरे-धीरे गाँधी आश्रम की गतिविधियाँ समाप्त होती गईं। भवन जर्जर हो गए, बाउंड्रीवाल गायब हो गई और संस्था का नाम केवल कागजों तक सीमित रह गया।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि वर्षों की उपेक्षा और प्रशासनिक उदासीनता के कारण यह बेशकीमती भूमि धीरे-धीरे अतिक्रमण और विवादों के घेरे में आती चली गई। आज स्थिति यह है कि नई पीढ़ी के अधिकांश युवाओं को यह तक पता नहीं कि बस स्टैंड पर गाँधी आश्रम नाम की कोई भूमि भी मौजूद है।
जब जमीन के कागजात भी बने चर्चा का विषय
गाँधी आश्रम की जमीन को लेकर विवाद और चर्चाएँ नई नहीं हैं। वर्षों पहले एक चर्चित घटना में सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष बेदी से सुजानगढ़ मैं कथित रूप से पिस्तौल दिखाकर लूटपाट की गई थी। समाचारों के अनुसार उनके बैग में गाँधी आश्रम भूमि से संबंधित दस्तावेज भी मौजूद थे।
उस समय यह घटना पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी थी और लोगों ने इसे गाँधी आश्रम की जमीन से जुड़े विवादों से भी जोड़कर देखा था।
रिकॉर्ड आज भी मौजूद हैं
उपलब्ध जमाबंदी रिकॉर्ड बताते हैं कि भूमि का राजस्व रिकॉर्ड आज भी मौजूद है। यही कारण है कि ग्रामीणों की मांग है कि—
* भूमि का पुनः सीमांकन कराया जाए।
* पुराने रिकॉर्ड और परिसंपत्तियों की जांच हो।
* यदि अतिक्रमण है तो उसे हटाया जाए।
* गाँधी आश्रम की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए।
* इस भूमि का उपयोग जनहित और ग्राम विकास के कार्यों में किया जाए।
क्या फिर लौटेगा गाँधी आश्रम?
भालेरी के लोग मानते हैं कि यदि प्रशासन गंभीरता से पहल करे तो यह भूमि पुनः गांव की पहचान बन सकती है। यहाँ पुस्तकालय, कौशल विकास केंद्र, सामुदायिक भवन, खादी केंद्र या कोई अन्य सार्वजनिक सुविधा विकसित की जा सकती है।
गाँधी आश्रम की कहानी केवल जमीन की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब गांव आत्मनिर्भरता, रोजगार और सामाजिक सहयोग की मिसाल हुआ करते थे।
भालेरी की गाँधी आश्रम भूमि और प्याऊ केवल जमीन के टुकड़े नहीं, बल्कि हमारे गांव का इतिहास हैं। सवाल यह है कि क्या यह इतिहास फिर से जीवित होगा या केवल कागजों में दर्ज रह जाएगा?