YogiRaj Shree NarsinghDas Pahaadi Baba

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https://youtu.be/LeXL9KwiZKg?si=-xy_cLC4LO1FvOleसिद्ध सम्राट परम तपस्वी योगीराज श्री स्वामी नरसिंह दास जी महाराज (प्रथम ...
24/10/2024

https://youtu.be/LeXL9KwiZKg?si=-xy_cLC4LO1FvOle

सिद्ध सम्राट परम तपस्वी योगीराज श्री स्वामी नरसिंह दास जी महाराज (प्रथम पहाड़ी बाबा) जी की चरितावलि (भाग २)🙏🏻🙏🏻👇👇

श्री राधे राधे !! विश्वसनीय और प्रामाणिक जानकारी के लिए, कृपया हमेशा केवल भक्ति आश्रम ( Bhakti Ashram ) और भक्ति रसार्णव ( Bhakti Rasarn...

https://youtu.be/tHuZD0p5itY?si=8l7K5xbVXXw9एमएक्सडब्ल्यूपीसिद्ध सम्राट परम तपस्वी योगीरीज श्री स्वामी नरसिंह दास जी महा...
24/10/2024

https://youtu.be/tHuZD0p5itY?si=8l7K5xbVXXw9एमएक्सडब्ल्यूपी

सिद्ध सम्राट परम तपस्वी योगीरीज श्री स्वामी नरसिंह दास जी महाराज (प्रथम पहाड़ी बाबा) जी की चरितावलि (भाग १)👇👇🙏🏻🙏🏻

श्री राधे राधे !! विश्वसनीय और प्रामाणिक जानकारी के लिए, कृपया हमेशा केवल भक्ति आश्रम ( Bhakti Ashram ) और भक्ति रसार्णव ( Bhakti Rasarn...

20/12/2023

14. गोलोक गमन:

आपने अपने संपूर्ण जीवन में ऐसा कभी कुछ नहीं कहा था कि आप कुछ करेंगे लेकिन अपने अंतिम समय में आपने अपने जनों से कहा कि, “भइया, अब जो भी नेमी/ प्रेमी हों उनको बुलाओ, हम भंडारा करना चाहते हैं। सबको बुलाया तो सब लोग आ गये। कलकत्ता के भी पुराने सब सेवक आ गये। उस समय जब वृंदावन घोर जंगल था, आपने बृज चौरासी कोस का भंडारा किया। साधु, ब्राह्मण, बृजवासी सबको बुलाया और उस ज़माने में एक एक रूपया दक्षिणा दी तथा 10-10 गज का अचला दिया। बृज चौरासी कोस में जहां देखो वहाँ पंगत लगी हुई थी। पंगत में पूरी, लडुआ, साग था। पूरे ब्रज में हल्ला हो गया।
जब कोई भी बाक़ी नहीं रहा, सभी का झरा भंडारा हो गया तब आपने यमुना जी में स्नान किया। आपने जटाओं में से निकालकर शालिग्राम जी को अपने शिष्य (श्री लक्ष्मण दास जी) को दिया और कहा यही मेरी पूंजी है, मेरी निधि है/मेरी संपत्ति है। इनकी सेवा करना और मैं अब समाधि मेँ जा रहा हूँ। निंब वृक्ष के नीचे ( वो निंब वृक्ष अभी १०-१२ वर्ष पहले तक था) स्वयं ही खोदवा करके रज में आप विराजमान हो गए, ऊपर से आपको ढक दिया गया। आज भी आपकी समाधि है। इस प्रकार आपने संबत 1869 में जीवित समाधि ली।

वे 150 वर्ष की आयु तक धरती पर विराजमान थे। विलक्षण बात ये है कि कार्तिक पूर्णिमा को ही उनका जन्म हुआ और कार्तिक पूर्णिमा को ही गोलोक सिधारे।

ऐसा अनुपम जीवन श्री पहाड़ी बाबा ने जिया।

20/12/2023

13. गऊ प्रेम:

आपका गाय के प्रति विशेष जुड़ाव था। गाय सदा आपके निकट रही। जीवन पर्यंत आपने भिक्षा के रूप में गाय का ही दूध लिया । जीवन इतना विलक्षण था कि अंग्रेज उस समय कोलकाता में शासक थे, वे भी उनके चरणों में आकर नतमस्तक होते थे। इतने प्रतापी महापुरुष थे।

20/12/2023

12. प्रबल वैराग्य:

आप अपने जीवन में बर्फ़ में भी रहे तो न कुछ बिछाया, न कुछ ओढ़ा। आप आपने हमेशा मूँज की ही लंगोटी और मूँज की आड़बंद धारण की। कंचन कामिनी का कभी स्पर्श नहीं किया।

जीवन पर्यंत आपने भिक्षा के रूप में गाय का ही दूध लिया । दूध ऐसे लेते थे कि गैया का दूध आपके कमंडल में दोह दिया जाये फिर वस्त्र से छान करके जटाओं में भगवान को रखते थे। जटाओं में शालिग्राम जी को विराजमान किये थे। वो शालग्राम अभी भी मलूक पीठ, वृंदावन में विराज रहे हैं। शालिग्राम जी को निकाल कर तुलसीदल डालकर भोग लगाते थे। वापिस जटा में उनको स्थापित कर लेते थे और फिर उसी दूध को लकड़ी या पत्तल के पात्र में भोग के रूप में पाते थे। बस यही उनका आहार था।
भूमि का स्पर्श होने के बाद फिर नहीं लेते थे। अपने संपूर्ण मनुष्य जीवन में मनुष्य निर्मित किसी स्थान में नहीं गए। किसी झोपड़ी में भी नहीं गए क्योंकि झोपड़ी मनुष्य द्वारा निर्मित होती है। या तो वृक्ष के नीचे रहे या पहाड़ पर/ पर्वत की कंदरा, गुफा में रहे। कभी किसी ने उनको पैर फैला कर लेटे हुए या सोते हुए नहीं देखा। सदा आसन पर ही बैठे देखा ऐसा उनका अद्भुत जीवन था।

20/12/2023

11. अग्नि से साक्षात प्रकट होकर दीक्षा दी:

बहुत चमत्कारी घटनायें हैं बाबा के जीवन में । १५० वर्ष की आयु जब पूर्ण हुई बाबा की, तो बसोबादी गाँव में एक भक्त विकल हो गया कि हम तो बाबा से दीक्षा लेने वाले थे, अब तो बाबा ने समाधि ले ली, अब क्या होगा। उसने बाबा की धूनी पर प्रतिज्ञा की कि अब बाबा की समाधि पर ही प्राण त्याग देंगे। वो भक्त सात दिन तक अनशन पर बैठ गया और बाबा सातवें दिन धूनी की अग्नि से ही प्रकट हो गए और प्रकट होकर के बाबा ने उसे दीक्षा दी। दीक्षा लेते ही वो सिद्ध हो गया। इसके बाद वो शिष्य चला गया और फिर घर पर कभी लौटकर वापस नहीं आया। बाबा के शिष्य भी ऐसे ही थे।

20/12/2023

10. आपके जीवन में बड़ी बड़ी चमत्कारिक घटनाएँ घटित हुईं। आपका जीवन इतना विलक्षण था कि जो अंग्रेज उस समय कलकत्ता में शासक थे, वे भी आपके चरणों में आकर नतमस्तक होते थे। आपके दर्शन से लोगों की इच्छायें पूर्ण हो जाती थीं। इतने प्रतापी महापुरुष थे आप।

20/12/2023

वहाँ से चलकर के बृज में आये तो कुछ लोगों ने अमरौली (जहां आपका जन्म हुआ था) में उनका एक सुंदर श्री सीताराम जी का मंदिर बनवाया। बाबा वहाँ तो पधारे नहीं। रुदायन गाँव, जहां राधा गोपाल मंदिर है, वहाँ रुदायन में बाबा कुछ काल विराजे और वहाँ से चल करके बाबा कुछ समय मथुरा में जो सत्यनारायण मंदिर है वहाँ विराजे लेकिन वो शहर के बीच में था, बाबा तो रमते नहीं थे ऐसी जगह में इसलिए फिर वे यमुना जी के तट पर खाकचौक स्थान पर (उस समय सब जंगल था) एक वृक्ष के नीचे विराजे। एक बार प्रयाग कुंभ से पैदल चल करके आप गंगा सागर गये हैं, एक छोटा सा गाँव है बसोबादी वहाँ बाबा की धूनी है। बाबा ने वहाँ धूनी चैतन्य किया था। (मलूक पीठाधीश्वर महाराज भी वहाँ दर्शन करके आये हैं।) बस इसके बाद बाबा कहीं गये नहीं, बाबा यहीं विराजे।

19/12/2023

आपके बंगाली शिष्य :

उस समय उनके कुछ बंगाली शिष्य भी हुये।उनमें एक बंगाली माता थीं। उसका नाम था मानौदा दासी। वे बड़ी विलक्षण, बहुत उच्च कोटि की नाम जापिका थीं। बाबा का तो कलकत्ता में पहली बार ही आगमन हुआ था, फिर दोबारा कभी गये नहीं। मानौदा दासी रोने लगीं कि बाबा आप तो बृज की ओर जा रहे हैं, अब पुनः दर्शन कब होगा? बाबा ने कहा कि हमारा ये आख़िरी दर्शन है, अब प्रत्यक्ष दर्शन तुम्हें दोबारा नहीं होगा। तुम्हें ज़्यादा विरह है तो लो मेरी सुमिरनी। तुम्हारे घर पर विराजमान रहेगी। हमारी परंपरा का कोई भी साधु आएगा वो इस सुमिरनी के नाते से तुम्हारे घर आके दर्शन देगा। बाबा ने ऐसा वचन दिया। आज भी उस ग़रीब बंगाली परिवार में बाबा की सुमिरनी और पादुका विराजमान है।(मलूक पीठाधीश्वर महाराज आज भी जब कभी कलकत्ता जाते हैं तो इस सुमिरनी का दर्शन करने जाते हैं।)

16/12/2023

अंग्रेज़ी सरकार ने आपसे क्षमा माँगी:

कुछ फ़ौज के अंग्रेज़ी अधिकारियों के बच्चे भी आने लग गये आपके दर्शन को। विलक्षण आकर्षण था बाबा के दर्शन में। तो अंग्रेजों ने आपको चेटकी/ तंत्र करने वाले समझा, और अंग्रेजों ने आपको वहाँ से गिरफ़्तार कर लिया। बाबा तो मौन रहते थे कि जैसी प्रभु की इच्छा। फ़ौज की गाड़ी में बैठा कर आपको आगरा ले आए और आगरा में आपको कारागार में पहुँचा दिया। बाबा वहाँ पहुँचे और कारागार में भी एक नीम के वृक्ष के नीचे आप बैठ गए। आप संकल्प सिद्ध पुरुष थे। वहीं आपने लकड़ी को इकट्ठी करके अपने संकल्प से ही अग्नि को प्रकट कर दिया और वहीं आप ध्यानस्थ हो गए। ध्यानस्थ होने के कारण पहले तो किसी का ध्यान नहीं गया लेकिन अग्नि खुले आकाश के नीचे जहां न दुबारा ईंधन डाला जा रहा है। ठंडी, गर्मी, बरसात का कोई प्रभाव नहीं, अग्नि चैतन्य है/अपने आप जल रही है। महीनों आप समाधि में बैठे रहे। अनुमान से लगभग ६-७ महीने। उनके लिये तो अखंड समाधि में बैठना कोई बड़ी बात नहीं थी। अंग्रेजों का शासन हिल गया कि ये तो कोई सिद्ध फ़क़ीर हैं, हमसे अपराध हो गया। तब अंग्रेज अधिकारी आया और उसने क्षमा माँगी। बाबा से कहा कि आप हमारा अपराध क्षमा करो, हमने आपको यहाँ से मुक्त किया, आप यहाँ से पधारिये। और उस अधिकारी ने कहा बाबा हमको भी कुछ आशीर्वाद दो। उसके कोई संतान नहीं थी। बाबा तो कुछ कहते नहीं थे। उसके संतान हुई तो उसने सोचा कि बाबा की कृपा से ही हुई। तब अंग्रेज आपको कलकत्ता ले गए। उस समय कलकत्ते में केंद्र था अंग्रेजों को तो वे आपको फ़ौज की गाड़ी में बैठा कर कलकत्ता ले गये। कलकत्ता में विक्टोरिया नाम की एक जगह में बाबा को ले गए और वहीं रखा। बाबा बने हुए मकान में नहीं जाते। या तो वे गुफा में या वृक्ष के नीचे रहते। इसलिए वे विक्टोरिया से कुछ समय में निकल के विचरने लगे।

14/12/2023

श्री स्वामी नरसिंह दास जी (प्रथम पहाड़ी बाबा) जी का पावन चरित्र क्रमशः आगे….

हिमालय में आपने सब तीर्थों की यात्रा की। दामोदर कुंड भी महाराज गये थे और वहाँ से स्वयं दामोदर कुंड से शालग्राम भगवान लेकर आए थे। (उनमें एक स्वरूप तो पूज्य मलूकपीठाधीशवर महाराज जी को उनके गुरुदेव ने प्रदान किया जो उनके साथ विराजमान हैं और एक स्वरूप में मलूक पीठ स्थान के मंदिर में विराजमान हैं।)
जो भी संत बद्रीनाथ केदारनाथ जाते थे, बाबा का दर्शन करते थे। बृजवासी संत आग्रह करते थे कि बाबा सब तो वहाँ पहुँच नहीं सकते, आप बृज में आओ। आपका शरीर बृजवासी है तब तो आपको बृज में आना ही चाहिए। तो श्री रामदास जी काठियाबाबा और अन्य संतों के आग्रह से आपने बृज आने का निश्चय किया और वहाँ से चल करके श्री प्रथम पहाड़ी बाबा महाराज जैसे ही हरिद्वार में सप्त सरोवर में आकर के विराजे, (उस समय अंग्रेजों का शासन था।) बाबा का प्रभाव इतना था कि उनके दर्शन के लिए तमाम भीड़ वहाँ इकट्ठी होने लगी।

13/12/2023

कैसे पड़ा पहाड़ी बाबा नाम:

आप गुरुदेव को प्रणाम करके विचरण करते-करते सीधे हिमालय पर पहुँचे। हिमालय में मान सरोवर पहुँचे (जो दुर्भाग्य से इस समय चीन में पहुँच गया है। पहले कैलाश मानसरोवर भारत में था, अब चीन के क़ब्ज़े में है। जिस काल में पहाड़ी बाबा विराजे उस समय तो सब भारत ही था।)

कैलाश में एक गुफा है, वशिष्ठ गुफा जिसमें आपने प्रवेश किया और ऐसे स्थल पर आप विराजे कि जहां कोई जीव जंतु भी नहीं है, वहाँ बर्फ़ ही बर्फ़ रहती है। उस गुफा में आप ५ वर्ष समाधिस्थ रहे और इसके बाद सिद्ध संतों के आग्रह पर आप थोड़े नीचे उतरे, केदारनाथ पहुँचे और केदारनाथ में हनुमान गुफा है। उस हनुमान गुफा में ( जहां इस समय संत श्री अभिराम दास जी का स्थान है।) पहाड़ी बाबा ६५ वर्ष विराजे। इस प्रकार आप ५ वर्ष मानसरोवर में और ६५ वर्ष केदारनाथ में रहे। ७० वर्ष आपके बर्फ़ ही बर्फ़ में व्यतीत हो गये, नीचे तो आप उतरे ही नहीं। इतने लंबे समय बर्फ़ में पहाड़ में रहने से आपका संत समाज में उपनाम पड़ गया “पहाड़ी बाबा”। नाम तो गुरुदेव का दिया हुआ श्री स्वामी नरसिंह दास जी महाराज था पर आपका नाम पहाड़ी बाबा पड़ गया।

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