20/12/2023
14. गोलोक गमन:
आपने अपने संपूर्ण जीवन में ऐसा कभी कुछ नहीं कहा था कि आप कुछ करेंगे लेकिन अपने अंतिम समय में आपने अपने जनों से कहा कि, “भइया, अब जो भी नेमी/ प्रेमी हों उनको बुलाओ, हम भंडारा करना चाहते हैं। सबको बुलाया तो सब लोग आ गये। कलकत्ता के भी पुराने सब सेवक आ गये। उस समय जब वृंदावन घोर जंगल था, आपने बृज चौरासी कोस का भंडारा किया। साधु, ब्राह्मण, बृजवासी सबको बुलाया और उस ज़माने में एक एक रूपया दक्षिणा दी तथा 10-10 गज का अचला दिया। बृज चौरासी कोस में जहां देखो वहाँ पंगत लगी हुई थी। पंगत में पूरी, लडुआ, साग था। पूरे ब्रज में हल्ला हो गया।
जब कोई भी बाक़ी नहीं रहा, सभी का झरा भंडारा हो गया तब आपने यमुना जी में स्नान किया। आपने जटाओं में से निकालकर शालिग्राम जी को अपने शिष्य (श्री लक्ष्मण दास जी) को दिया और कहा यही मेरी पूंजी है, मेरी निधि है/मेरी संपत्ति है। इनकी सेवा करना और मैं अब समाधि मेँ जा रहा हूँ। निंब वृक्ष के नीचे ( वो निंब वृक्ष अभी १०-१२ वर्ष पहले तक था) स्वयं ही खोदवा करके रज में आप विराजमान हो गए, ऊपर से आपको ढक दिया गया। आज भी आपकी समाधि है। इस प्रकार आपने संबत 1869 में जीवित समाधि ली।
वे 150 वर्ष की आयु तक धरती पर विराजमान थे। विलक्षण बात ये है कि कार्तिक पूर्णिमा को ही उनका जन्म हुआ और कार्तिक पूर्णिमा को ही गोलोक सिधारे।
ऐसा अनुपम जीवन श्री पहाड़ी बाबा ने जिया।