E-Amzn WELCOME TO AMAZING WORLD OF SHOPPING
The things you like, the cost you bear totally depends on the q Please refer our website.

तो तैयार हो जाइए… क्योंकि कहानी अभी शुरू ही हुई है… और अब जो होगा, वो पहले से भी ज्यादा खतरनाक है…---अनंत अंधकार: कुमार ...
05/29/2026

तो तैयार हो जाइए… क्योंकि कहानी अभी शुरू ही हुई है… और अब जो होगा, वो पहले से भी ज्यादा खतरनाक है…

---

अनंत अंधकार: कुमार अशोक (भाग 2)

रात… फिर वही समय…

3:07

अशोक की आँख खुली—लेकिन इस बार कुछ अलग था।

उसने साँस ली…
लेकिन हवा में सड़ांध थी… जैसे कोई चीज़ बहुत समय से सड़ रही हो।

उसने उठने की कोशिश की…

पर उसका शरीर हिल नहीं रहा था।

जैसे कोई उसे नीचे दबाकर बैठा हो।

---

जो दिखता नहीं… वो सबसे खतरनाक होता है

अचानक…

उसके कान के पास एक आवाज़ आई—

“इस बार… तुम जल्दी लौट आए…”

अशोक की आँखें फटी की फटी रह गईं।

उसने बगल में देखने की कोशिश की…

लेकिन कुछ दिखाई नहीं दिया…

फिर भी…

वहाँ कोई था।

धीरे-धीरे…

उसके सीने पर दबाव बढ़ने लगा…

जैसे कोई अदृश्य चीज़ उस पर बैठकर उसे घूर रही हो।

“तुम हर बार भूल जाते हो…”
“और हम हर बार तुम्हें याद दिलाते हैं…”

---

आईना जो सच दिखाता है

अचानक दबाव खत्म हो गया।

अशोक हाँफते हुए उठा…

और सीधा बाथरूम की तरफ भागा।

उसने आईने में खुद को देखा…

लेकिन…

आईने में जो था…

वो वो नहीं था।

आईने में खड़ा अशोक मुस्कुरा रहा था…

लेकिन असली अशोक रो रहा था।

आईने वाला अशोक बोला—

“कितनी बार मरोगे?”

“कितनी बार भागोगे?”

“ये घर… ये अंधेरा… ये सब तुम ही हो…”

अशोक चिल्लाया—
“चुप हो जाओ!!!”

और उसने आईना तोड़ दिया।

---

लेकिन आईना टूटा नहीं… खुल गया

जैसे ही शीशा टूटा—

अंदर से हाथ बाहर आया…

काला… जला हुआ… टेढ़ा…

और उसने अशोक की कलाई पकड़ ली।

अशोक चीखा—

“छोड़ो मुझे!!!”

लेकिन हाथ की पकड़ और मजबूत हो गई।

धीरे-धीरे…

आईने के अंदर से एक चेहरा बाहर आया…

बिल्कुल उसी जैसा…

पर आँखें काली…

और मुँह इतना बड़ा कि इंसान का हो ही नहीं सकता।

“तुम बाहर क्यों रहना चाहते हो…”
“जब असली जगह अंदर है…”

---

वो जगह… जहाँ से कोई नहीं लौटता

अचानक…

पूरा कमरा बदल गया।

अब वो फिर उसी गलियारे में था…

लेकिन इस बार…

दीवारों पर सिर्फ फोटो नहीं थे…

बल्कि…

लोग जिंदा थे।

दीवारों में फंसे हुए…

चीखते हुए…

मदद माँगते हुए…

“हमें बाहर निकालो…”
“हम भी अशोक थे…”
“हम भी भागना चाहते थे…”

अशोक पीछे हट गया…

“ये क्या है… ये कौन हैं…”

तभी पीछे से आवाज़ आई—

“ये सब तुम ही हो…”

---

अंत का सच… जो अंत नहीं है

वो मुड़ा…

और इस बार…

उसके सामने खड़ा था—

एक बूढ़ा अशोक…

सफेद बाल… झुकी कमर… आँखों में अंधेरा…

“मैं… तुम्हारा आखिरी रूप हूँ…”

“मैं वो हूँ… जो कभी बाहर नहीं निकल पाया…”

अशोक काँपते हुए बोला—

“तो मैं कैसे बचूँ?!”

बूढ़ा अशोक धीरे-धीरे मुस्कुराया—

“बचने का कोई तरीका नहीं है…”

“क्योंकि ये घर… ये अंधेरा… ये चक्र…”

“तुमने खुद बनाया है…”

---

और फिर…

अचानक…

सब कुछ काला हो गया…

सन्नाटा…

फिर…

धीरे-धीरे…

एक आवाज़…

“ठक… ठक… ठक…”

---

अब ध्यान से पढ़ो…

अगर तुम्हें अभी…
इस वक्त…

ऐसा लगा कि तुम्हारे पीछे कोई खड़ा है…

या तुम्हारा नाम धीरे से किसी ने पुकारा है…

तो मुड़ना मत…

क्योंकि…

हो सकता है…

कुमार अशोक अब अकेला नहीं है।

---

(कहानी अभी भी खत्म नहीं हुई…
क्योंकि अगली बार… शायद दरवाज़ा तुम्हारे सामने खुलेगा…)

रात के ठीक 3:07 बजे…जब दुनिया की नींद सबसे गहरी होती है… और आत्माएँ सबसे ज्यादा जागती हैं…कुमार अशोक की आँख अचानक खुली।क...
05/22/2026

रात के ठीक 3:07 बजे…जब दुनिया की नींद सबसे गहरी होती है… और आत्माएँ सबसे ज्यादा जागती हैं…
कुमार अशोक की आँख अचानक खुली।कमरा बिल्कुल शांत था…लेकिन उस सन्नाटे में भी एक अजीब सी आवाज़ थी—“ठक… ठक… ठक…”जैसे कोई लकड़ी पर धीरे-धीरे दस्तक दे रहा हो।अशोक ने घड़ी की तरफ देखा—3:07हर रात… वही समय… वही आवाज़…“ये सपना नहीं है…” उसने खुद से कहा।
पहली दरारअशोक ने कमरे का दरवाज़ा खोला…गलियारा अंधेरे में डूबा था।
दीवार पर टंगी घड़ी उल्टी दिशा में घूम रही थी।टिक… टिक… टिक…लेकिन उल्टा…अचानक…ठक… ठक… ठक…इस बार आवाज़ नीचे से आ रही थी।जमीन के अंदर से।अशोक झुका… फर्श को छुआ…
ठंडी… बर्फ जैसी ठंडी…और तभी—फर्श के नीचे से एक फुसफुसाहट आई:“तुम देर से आए हो… कुमार अशोक…”उसका दिल जोर से धड़कने लगा।“कौन है?” उसने चिल्लाया।कोई जवाब नहीं…बस एक धीमी हँसी—“हीहीही…”दूसरा सचअगले दिन…अशोक ने पूरे घर की जांच की।पुराना मकान था…दादी की विरासत…लेकिन एक कमरा हमेशा बंद रहता था।ताले पर जंग लगी थी…जैसे सालों से किसी ने उसे छुआ ही न हो।अशोक ने ताला तोड़ा…दरवाज़ा खुलते ही एक बदबूदार हवा का झोंका आया।अंदर…

दीवारों पर सिर्फ एक ही नाम लिखा था—

“ASHOK… ASHOK… ASHOK…”

सैकड़ों बार…

हजारों बार…

और हर बार लिखावट अलग…

जैसे अलग-अलग लोगों ने लिखा हो।अचानक पीछे से आवाज़ आई—“तुम्हें याद नहीं?”अशोक ने मुड़कर देखा…कोई नहीं था।तीसरा दरवाज़ाउस रात फिर 3:07 बजे…इस बार आवाज़ सिर्फ फर्श से नहीं…दीवारों… छत… और उसके अंदर से भी आ रही थी।“ठक… ठक… ठक…”अशोक ने चीखते हुए कहा—“कौन हो तुम?!”अचानक…
कमरे के बीच में एक दरवाज़ा प्रकट हुआ…
जहाँ पहले कुछ नहीं था।पुराना… काला… आधा टूटा हुआ दरवाज़ा…धीरे-धीरे खुद खुलने लगा…
क्रीईईईक…अंदर… सिर्फ अंधेरा…लेकिन उस अंधेरे में कुछ हिल रहा था…कुछ… जो इंसान नहीं था…
---अंदर का सचअशोक ने हिम्मत करके अंदर कदम रखा…
और तभी…

दरवाज़ा पीछे से बंद हो गया।

अब वो एक लंबे गलियारे में था…

दीवारों पर टंगे थे—

उसके ही फोटो।

लेकिन हर फोटो में वो मर चुका था।

कहीं खून में लथपथ…
कहीं फांसी पर…
कहीं बिना आँखों के…

अचानक…

एक फोटो हिलने लगा…

और उसमें से वही अशोक बाहर निकल आया…

मुस्कुराते हुए…

“तुम फिर आ गए…”

“हर बार की तरह…”असली अशोक पीछे हट गया—“ये क्या है?!”वो दूसरा अशोक बोला—“ये तुम्हारा घर नहीं है…ये तुम्हारा चक्र है…”
--अंत जो कभी नहीं आतातभी…फर्श फिर खुल गया…नीचे एक गहरा अंधेरा गड्ढा…उसमें से हजारों आवाज़ें—
“आ जाओ… कुमार अशोक…”“तुम पहले भी गिर चुके हो…”“हर बार गिरते हो…”
अशोक भागने लगा…लेकिन गलियारा खत्म ही नहीं हो रहा था…दरवाज़े बढ़ते जा रहे थे…हर दरवाज़े के पीछे—एक नई मौत…एक नया डर…एक नया “अशोक”…और हर बार…
जब वो मरता—वो फिर से जागता…रात 3:07 बजे…---और अब…अगर तुम ये कहानी पढ़ रहे हो…
तो ध्यान से सुनो…आज रात…ठीक 3:07 बजे…अगर तुम्हें भी कहीं से आवाज़ आए—“ठक… ठक… ठक…”तो दरवाज़ा मत खोलना…क्योंकि…हो सकता है…अगला कुमार अशोक… तुम ही हो।

05/08/2026

Try once...follow forever ♾️ # E-Amzn

Address

New Delhi, IL
110005

Telephone

+919910022137

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when E-Amzn posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to E-Amzn:

Share