06/13/2026
भारत में **'चाटुकार पत्रकारिता' (Sycophantic Journalism)** या जिसे आम बोलचाल में अक्सर **'गोदी मीडिया'** भी कह दिया जाता है, समकालीन भारतीय लोकतंत्र और समाज के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, जिसका मुख्य काम सत्ता से सवाल करना, जनता की आवाज़ को सरकार तक पहुँचाना और निष्पक्षता से सच को सामने रखना है। लेकिन जब यही चौथा स्तंभ सत्ता के आगे नतमस्तक हो जाए और उसकी कमियों को छिपाकर केवल तारीफों के पुल बांधने लगे, तो उसे ही 'चाटुकार पत्रकारिता' कहा जाता है।
भारतीय मीडिया के एक बड़े हिस्से में आज यह प्रवृत्ति साफ देखी जा सकती है। इसके पीछे कई मुख्य कारण और इसके गंभीर परिणाम हैं, जिन्हें समझना बेहद जरूरी है:
# # # चाटुकारिता के मुख्य कारण
* **आर्थिक निर्भरता और कॉर्पोरेट दबाव:** आधुनिक मीडिया घरानों को चलाने के लिए भारी-भरकम फंड की जरूरत होती है। कमाई का सबसे बड़ा जरिया सरकारी और बड़े कॉर्पोरेट विज्ञापन होते हैं। जब मीडिया पूरी तरह से सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर हो जाता है, तो वह सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत खो देता है।
* **टीआरपी (TRP) की होड़ और सनसनीखेज:** आज के दौर में गंभीर और खोजी पत्रकारिता की जगह शोर-शराबे वाले टीवी डिबेट्स ने ले ली है। वास्तविक मुद्दों (जैसे बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा) को छोड़कर ऐसे मुद्दों को उछाला जाता है जिससे समाज में ध्रुवीकरण बढ़े और टीआरपी मिले।
* **सत्ता का डर और चापलूसी की संस्कृति:** पत्रकारों और मीडिया मालिकों में यह डर रहता है कि अगर उन्होंने सरकार की नीतियों की आलोचना की, तो उन्हें निशाना बनाया जा सकता है या उनके चैनलों पर पाबंदियां लग सकती हैं। इसके विपरीत, सत्ता की तारीफ करने वाले पत्रकारों को विशेष सुविधाएं, इंटरव्यू और पुरस्कार मिलते हैं।
# # # समाज और लोकतंत्र पर इसका प्रभाव
जब पत्रकारिता अपना मूल चरित्र खो देती है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान देश की जनता को होता है। चाटुकार पत्रकारिता के कारण वास्तविक जन-सरोकार के मुद्दे मुख्यधारा की चर्चा से गायब हो जाते हैं।
> **लोकतंत्र की कमजोरी:** एक मजबूत लोकतंत्र के लिए विपक्ष और मीडिया का मजबूत होना जरूरी है। जब मीडिया खुद सरकार का प्रवक्ता (Spokesperson) बन जाए, तो सरकार की जवाबदेही खत्म होने लगती है।
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इसके अलावा, इस तरह की पत्रकारिता समाज में नफरत और विभाजन को बढ़ावा देती है। दिन-रात टीवी स्क्रीन्स पर होने वाली सांप्रदायिक और आक्रामक बहसें नागरिकों के बीच आपसी सौहार्द को बिगाड़ती हैं। जनता का ध्यान भटकाने के लिए काल्पनिक दुश्मन खड़े किए जाते हैं और असली समस्याओं पर पर्दा डाल दिया जाता है।
# # # निष्कर्ष और आगे की राह
भारत में पत्रकारिता का एक गौरवशाली इतिहास रहा है, जहाँ गणेश शंकर विद्यार्थी और कुलदीप नैयर जैसे पत्रकारों ने सत्ता के सामने कभी घुटने नहीं टेके। आज के दौर में भी कुछ स्वतंत्र पत्रकार, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और वैकल्पिक मीडिया संस्थान निष्पक्ष पत्रकारिता की मशाल को थामे हुए हैं, लेकिन मुख्यधारा के मीडिया (Mainstream Media) में गिरावट चिंताजनक है।
इस स्थिति को बदलने के लिए मीडिया के आर्थिक मॉडल में सुधार की जरूरत है, ताकि वे विज्ञापनों के लिए पूरी तरह सरकार या कॉर्पोरेट्स के गुलाम न रहें। साथ ही, दर्शकों के तौर पर जनता को भी जागरूक होना होगा। जब तक दर्शक सनसनीखेज और चाटुकार खबरों को देखना बंद नहीं करेंगे, तब तक मीडिया का यह स्वरूप नहीं बदलेगा। पत्रकारिता का धर्म सत्ता की आरती उतारना नहीं, बल्कि जनता के हक के लिए सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछना है।